Srishti Khanda Extracted Page 246
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-246
Sanskrit Original
स्वर्ग ते तु गमष्यंति सैकविंशतिभिः कुलैः । एवं शक्रस्य विष्णोश्च रुद्रस्य पावकस्य च॥२८४॥ ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च गायत्री वरमुत्तमम्। तस्मिन्वै पुष्करे दत्त्वा ब्रह्मणः पार्श्वगाऽ भवत् ॥२८५॥ चारणैस्तु तदाख्यातं लक्ष्म्या वै शापकारणम्। युवतीनां च सर्वासां शापान् ज्ञात्वा पृथक् पृथक् २८६॥ लक्ष््याश्चैव वरंप्रादाह्वायत्री ब्रह्मणः प्रिया । अकुत्सितान् सदा सर्वान् कुर्वन्ती धनशोभना ॥२८७॥ शोभिष्यसे न संदेहः सर्वेभ्यः प्रीतिदायिनी। ये त्वया वीक्षिताः पुत्रि सर्वे ते पुण्यभोजनाः॥२८८॥ परित्यक्तास्त्वया ये तु सर्वे ते दुःखभागिनः । तेषां जातिः कुलं शीलं धर्मश्चैव वरानने ॥२८९॥ सभायांते च शोभते दृश्यंते चैव पार्थिवैः । अर्थित्वं चैव तेषां तु करिष्यंति द्विजोत्तमाः ॥२९०॥ सौजन्यं तेषु कुर्वति त्वं नो भ्राता पिता गुरुः | बांधवोपि न संदेहो न जीवेयं त्वया बिना॥२९९॥ त्वयि दृष्टे प्रसन्ना मे दृष्टिर्भवति शोभना। मनः प्रसीदतेऽत्यर्थं सत्यं सत्यं वदामि ते॥२९२॥ एवं विधानि वाक्यानि त्वद्दृष्ट्या ये निरीक्षिताः । सज्जनास्ते तु श्रोष्यंति जनानां प्रीदायकाः ॥२९३॥ इद्रत्वं नहुषः प्राप्य दृष्ट्वा त्वां याचयिप्यति । तव दृष्ट्या तु हतः पापो ह्यगस्त्यवचनाद् श्रुवम्॥ २९ ४॥ सर्पत्वं समनुप्राप्य प्रार्थयिष्यति तं तु सः । दर्पेणाहं विनष्टोस्मि शरणं मे मुने भव ॥२९५॥ वाक्येन तेन तस्यासौ नृपस्य भगवानृषिः । कृत्वा मनसि कारुण्यमिदं वाक्यं वदिष्यति ॥२९६॥ उत्पत्स्यते कुले राजा त्वदीये कुलनंदनः । सर्परूपधरं दृष्ट्वा स ते शापं हि भेत्स्यति॥२९७॥ तदा त्वं सर्पतां त्यक्त्वा पुनः स्वर्गं गमिष्यसि । अश्वमेधकृतेन त्वं भर्त्रा सह पुनर्दिवम् ॥२९८॥ आप लोगों को वर प्रदान किया है । तीनों सन्ध्याओं में अग्निहोत्र करने वाले अग्निहोत्री ब्राह्मण ॥२८३॥ अपने इक्कीस पीढी के पूर्वजों के साथ स्वर्ग में जायेंगे । इस तरह से इन्द्र, भगवान् विष्णु, रुद्र तथा अग्नि ॥२८४॥ ब्रह्माजी को तथा ब्राह्मणों को गायत्री देवी ने उत्तम वर प्रदान किया । उस पुष्कर में ही वर देकर गायत्री देवी ब्रह्माजी की पर्शववर्तिनी बन गयीं ।।२८५।। जब दूतों के द्वारा इस बात का पता चला की सावित्री देवी ने लक्ष्मी देवी तथा दूसरी देव युवतियों को अलग-अलग शाप दे दिया है ॥२८६॥ तो गायत्री देवी ने लक्ष्मीजी को वरदान दिया, सर्वदा अनिन्दित पुरुषों को सुन्दर सम्पत्ति प्रदान करके ॥२८७॥ सबों को प्रसन्न करने वाली आप सुशोभित होंगी; इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है । हे पुत्रि ! तुम जिसको देख लोगी वह मनुष्य अपने पुण्य फलों का भोग करेगा।२८८॥ जिन सबों का आप परित्याग कर देंगी वे सभी दुखी रहेंगे हे वरानने ! जो जीव तुम्हारी कृपा के पात्र होंगे, उनके ही जाति, कुल शील तथा धर्म संरक्षित होंगे वे ही लोग सभा में सुशोभित होंगे तथा राजाओं के कृपा पात्र होंगे; उन्हीं लोगों के यहाँ याचना करने के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मण जायेंगे ॥२९०॥ उन्हीं लोंगों के प्रति सज्जन पुरुष सौजन्य का प्रदर्शन करेंगे और कहेंगे कि आप ही मेरे आता, पिता और गुरु हें । उसके बन्धव भी इस तरह से कहेंगे कि आपके बिना मैं नहीं जी सकता हूँ ॥२९१॥ आपको ही देखने से मेरी दृष्टि प्रसन्न हो जाती है । यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि आपको देखकर मेरा मन प्रसन्न हो जाता है ॥२९२॥ इसतरह से तुम्हारी दृष्टि के ही कारण देखने वाले लोग उस व्यक्ति को कहेंगे लोगों को प्रसन्न करने वाले सज्जन पुरुष उनकी वाणी को सुनेंगे ॥२९३॥ इन्द्राणी से गायत्री देवी ने कहा-- नहुष भी इन्द्र बनकर तुम्हारी याचना करेगा । वह पापी तुम्हारे देखने मात्र से मरा हुआ होने के कारण महर्षि अगस्त्य के शाप के कारण ॥२९४॥ सर्प बनकर उनसे यह प्रार्थना करेगा कि दर्प के ही कारण मैं विनष्ट हो गया हूँ । हे मुने ! आप मेरी रक्षा करें ॥२९५॥ उस राजा की बातों को सुनकर भगवान् अगस्त्य महर्षि मन में करुण करके कहेंगे ॥२९६॥ हे राजन् ! तुम्हारे ही वंश में तुम्हारे वंशधर रूप से भगवान्
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