Srishti Khanda Extracted Page 245
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-245
Sanskrit Original
अन्न प्रकारान्विविधान्दत्वा दानान्यनेकशः । श्राद्धेषु प्रीणनं कृत्वा देवदेवा भवंति ते ॥२६९॥ ये च वै ब्राह्मणश्रेष्ठास्तेषामास्यो दिवौकसः । भुंजते च हविः क्षिप्रं कव्यं चैव पितामहाः ॥२७०॥ यूयं हि धारणेशक्ता सतरैलोक्यस्य न संशयः। प्राणायामेन चैकेन सर्वे पूता भविष्यथ ॥२७९॥ विशेषात्पुष्करे स्नात्वा मां जप्त्वा वेदमातरम्। प्रतिग्रहकृतान्दोषान्नप्राप्स्यथ द्विजोतमाः ॥२७२॥ पुष्करे चान्न दानेन प्रीता: स्युः सर्वदेवताः । एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोट्याः फलमवाप्स्यते ॥२७३॥ ब्र्महत्यादिपापानि दुष्कृतानि कृतानि च । करिष्यांति नरास्सर्वे दत्वा पुष्त्करे धनम् ॥२७४॥ मदीयेन तु जाप्येन पूजनीयस्त्रिभिः कृतैः। ब्रह्महत्या समं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥२७५॥ दशभिर्जन्मभिर्जातं शतेन च पुरा कृतम्। त्रियुगेनसहस्रेण गायत्री हंतिकिल्बिषम् ॥२७६॥ एवं ज्ञात्वा सदा पूता जाप्ये तु मम वैकृते। भविष्यध्वं न संदेहो नात्र कार्या विचारणा ॥२७७॥ प्रणवेन त्रिमात्रेण सार्द्ध जप्त्वा विशेषतः। पूताः सर्वे न संदेहो जप्त्वा मां शिरसा सह॥२७८॥ अष्टाक्षरा स्थिता चाहं जगद्व्याप्तं मयात्त्विदम् । माताहं सर्ववेदानां पदैः सर्वेरलंकृता ॥२७९॥ जप्त्वा मां भक्तितः सिद्धिं यास्यंति द्विजसत्तमाः। प्राधान्यं मम जाप्येन सर्वेषां वो भविष्यति ॥२८०॥ गायत्री सारमात्रोपि वरं विप्रः सुसंयतः । नायंत्रित श्वतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥२८९॥ यस्माद्विप्रेषु सावित्र्या शापो दत्तः सदस्यथ। अत्र दत्तं हुतं चापि सर्वमक्षयकारकम् ॥२८२॥ | दत्तो वरो मया तेन युष्माकं द्विजसत्तमाः । अग्निहोत्रपरा विप्रास्त्रिकालं होमदायिनः ॥२८३॥ वैराज पद को प्राप्त करेंगे ॥२६८॥ अनेक प्रकार के अन्नों का ब्राह्मणों को दान देकर तथा श्राद्धो में ब्राह्मणों को प्रसन्न करने वाले मनुष्य मृत्यु के पश्चात् देवताओं के भी पूज्य हो जाते हैं ॥२६९॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणों के मुख से ही देवताओं का भोजन होता है और पितृगण भी ब्राह्मण मुख से कव्य (श्राद्धदान) को ग्रहण करते हैं ॥२७०॥ आपलोग त्रैलोक्य का धारण करने में समर्थ हैं । आप लोगों को सभी केवल प्रणाम करके ही पवित्र हो जायेंगो।२७१॥ विशेष रूप से पुष्कर में स्नान करके तथा वेद माता मेरा (गायत्री का) जप करके हैं ब्राह्मणों ! आपलोगों को प्रतिग्रह (दान लेने) से होने वाला पाप नहीं लगेगा ॥२७२॥ पुष्कर तीर्थ में अन्नदान करने से सभी देवताओं को प्रसन्नता होती है । यहाँ पर एक भी ब्राह्मण को भोजन कराने से करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने के फल की प्राप्ति होगी॥ २७३॥ ब्रह्महत्या इत्यादि तथा अन्य जो पाप किए गये रहते हैं, वैसे पापों को सभी मनुष्य आप लोगों के हाथ में धन देकर अपने को पवित्र करेंगे ॥२७४॥ मेरे मन्त्र के द्वारा तीन बार पूजा करने से ब्रह्महत्या के समान भी पाप शीघ्र ही विनष्ट हो जाते हें ॥२७५॥ दश जन्मों में उत्पन्न तथा पहले के सौ जन्मों में भी किए गये पाप बारह हजार गायत्री का जप करने से विनष्ट हो जाते हैं ॥२७६॥ इसतरह जानकर जो ब्राह्मण गायत्री मन्त्र का जप करेंगे वे सर्वदा पवित्र रहेंगे इसके विषय में कोई विचार नहीं करना चाहिए ॥२७७॥ विशेष रूप से प्रणवोच्चारण पूर्वक तीनों व्याहतयों के साथ मेरा जप करके सभी ब्राह्मण निःसन्देह रूप से पवित्र हो जायेंगे ॥२७८॥। में अष्टाक्षरा हूँ । अर्थात् मेरे प्रत्येक चरण आठ अक्षरों वाले होते हैं, यह सारा जगत् मुझसे व्याप्त है । सभी पदों से अलङ्कृत मै वेदोंकी , माता हूँ ॥२७९॥ श्रेष्ठ ब्राह्मण भक्ति पूर्वक मेरा जप करके सिद्धि प्राप्त कर लेंगे । मेरा जप करने से आपलोग सर्ब | में प्रधान हो जायेंगे ॥२८०॥ गायत्री प्रधान ब्राह्मण श्रेष्ठ है; किन्तु अजितेन्द्रिय, चारो वेदों का ज्ञाता भी, सर्वकुछ खाने वाला एवं सब कुछ बेचने वाला ब्राह्मण श्रेष्ठ नहीं है ॥२८ १॥ चूकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को शाप दिया हें । अतएव यहाँ पर (पुष्कर क्षेत्र में) किया गया दान और होम अक्षय होगा ॥२८२॥ इसीलिए, ब्राह्मण श्रेष्ठं मैंने Oh»
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