Srishti Khanda Extracted Page 244
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-244
Sanskrit Original
नतु ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन। मदीयं तु वचः श्रुत्वा ये करिष्यंति चार्चनम् ॥२५४॥ इह भुक्त्वा तु भोगास्ते परत्र मोक्षभागिनः । एतां ज्ञात्वा परां दृष्टिं वरं तुष्टः प्रयच्छति ॥२५५॥ शक्राऽहंते वरं दास्ये संग्रामे शन्रुनिग्रहे। तदा ब्रह्मा मोचयिता गत्वा शत्रुनिकेतनम् ॥२५६॥ स्वपुरं लप्स्यसे नष्टं शत्रुनाशात्परां मुदम्। अकंटकं महद्राज्यं त्रैलोक्ये ते भविष्यति ॥२५७॥ मर्त्यलोके यदा विष्णो अवतारं करिष्यसि। भ्रात्रा सह परं दुःखं स्वभार्याहरणादिजम् ॥२५८॥ हत्वा शत्रु पुनर्भार्या लप्स्यसे सुरसन्निधौ । गृहीत्वा तां पुना राज्यं कृत्वास्वर्गं गमिप्यसि ॥२५९॥ एकादशसहस्राणि वर्षाणां च पुनर्दिवम् । ख्यातिस्ते विपुला लोके अनुरागं जनैस्सह ॥२६०॥ सांतानिकानाम तेषां लोक: स्थास्यंति भाविताः। त्वया ते तारिता देव रामरुपेण मानवाः ॥२६१॥ गायत्री तु तदा रुद्रं वरदा प्रत्यभाषत्। पतितेपि च ते लिंगे पूजां कुर्वति ये नराः ॥२६२॥ ते पूताः पुण्यकर्माणः स्वर्गलोकस्य भागिनः । न तां गतिं चाम्निहोत्रे न क्रतौ हुतपावके ॥२६३॥ यां गतिं मनुजा यांति तव लिंगस्य पूजनात् । गंगातीरे सदालिगं बिल्वपत्रेण ये तव् ॥२६४॥ पूजयिष्यति सुप्रीतारुद्रलोकस्य भागिनः । प्राप्यापि सर्वभक्षत्वमग्ने त्वं भव पावनः॥२६५॥ त्वयि प्रीते सुराः सर्वे प्रीता वै नात्र संशयः। त्वन्मुखेन हविर्देवैः प्रीताः प्रीते त्वयि ध्रुवम् ॥२६६॥ भुंजते नात्र संदेहो वेदोक्तं वचनं यथा । गायत्री ब्राह्मणांस्तांश्च सर्वाश्चैवाब्रवीदिदम्॥२६७॥ युष्माकं प्रीणनं कृत्वा सर्वतीर्थेषु मानवाः । पदं सर्वे गमिष्यंति वैराजाख्यं न संशयः ॥२६८॥ की हितकारी तिथि है । गायत्री देवी ने कहा-- सावित्री देवी ने जो यह कहा है कि ब्रह्माजी की पूजा कोई ब्राह्मण नहीं करेगा मेरी बात को सुनकर जो ब्राह्मण ब्रह्माजी की अर्चना करेंगे ॥२५३-२५४॥ वे इस लोक में समस्त भोगों को भोग कर परलोक में मोक्ष प्राप्त करेंगे । इस परादृष्टि को जानकर प्रसन्न होकर गायत्री देवी वरदान देती है॥२५५॥ हे इन्द्र ! मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि संग्राम में जब तुम्हारा निग्रह हो जायेगा, उस समय तुम्हारे शत्रु के घर जाकर ब्रह्माजी तुम्हें छोड़वायेंगे ॥२५६॥ किञ्च शत्रु का नाश हो जाने पर अत्यन्त आनन्द पूर्वक अपनी राजधानी को आप प्राप्त करेंगे । आपका त्रैलोक्य में अकण्टक राज्य होगा ॥२५७॥ हे विष्णो ! जब आप मर्त्यलोक में अवतार लेंगे, पत्नी के हरण के कारण आपकों जब अत्यन्त कष्ट होगा ॥२५८॥ उस समय आप शत्रु का वध करके देवताओं के समक्ष अपनी पत्नी को पुनः प्राप्त करेंगे । अपनी पत्नी को लेकर आप राज्य करेंगे । उसके पश्चात् आप अपने लोक में जायेंगे ।।२५९॥ आप भूलोक में म्यास्ह हजार वर्ष तक राज्य करेंगे और आपमें प्रजाओं का विपुल अनुराग होगा । आपका विस्तृत यश होग ॥२६०॥ वे सबके सब सांतानिक लोको में जायेंगे, हे विष्णो ! आप राम रूप से मनुष्यों का उद्धार करेंगे ॥२६१॥ उसके बाद गायत्री देवी ने रुद्र को वरदान दिया । तुम्हारे लिङ्ग के गिर जाने पर भी जो लोग उस लिङ्ग की पूजा करेंगे ॥२६२॥ वे पवित्र होंगे और अपने पवित्र कर्म के द्वारा स्वर्गलोक के भागी होंगे । आपके लिङ्ग की पूजा करने से जिस गति की प्राप्ति होगी उस गति की प्राप्ति अग्निहोत्र अथवा यज्ञ करने से नहीं हो सकती है । जो लोग सर्वदा गङ्गा नदी के तट पर आपके लिङ्ग की पूजा विल्वपत्र से करेंगे ॥२६३-२६४॥ वे रुद्र लोक के भागी होंगे हे पावक शङ्कर भुक्त होने पर भी तुम पवित्र बने रहो ॥२६५॥ तुम्हारे प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होंगे, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है । तुम्हारे प्रसन्न होने पर तुम्हारे हीं मुख से देवता हविष्य ग्रहण करेंगे ॥२६६। यह वेद कहता है, अतएव यह मिथ्या नहीं हो सकता है । गायत्री देवी ने सभी ब्राह्मणों को यह कहा कि ॥२६७॥। जो लोग सभी तीर्थो में आप ब्राह्मणों को प्रसन्न करके निस्संदेह रूप से
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