Srishti Khanda Extracted Page 243

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-243

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Sanskrit Original

एवं तूर्यनिनादैस्तु शंखशब्दैश्च पुष्कलैः । भ्रामयित्वा रथं वीर पुरं सर्व प्रदक्षिणम् ॥२४९॥ स्वस्थाने स्थापयेद्देवं दत्वा नीराजनं बुध: । य एवं कुरुते यात्रां यो वा भक्तद्यापि पश्यति॥२४२॥ रथं वा कर्षयेद्यस्तु स गच्छेद्दह्मण: पदम् । कार्तिके मास्यामवास्यां यश्च दीपप्रदीपनम् ॥२४३॥ शालायां ब्रह्मणः कुर्यात्सगच्छेत्परमं पदम् । गंधपुष्पैर्नवैर्वस्रैरात्मानं पूजयेत्तुयः ॥२४४॥ तस्यां प्रतिपदायां तु सगच्छेद्ृह्मणः पदम् । महापुण्या तिथिरियं बलिराज्यप्रवर्तिनी ॥२४५॥ ब्रह्मणः सुप्रिया नित्यं बालेयी परिकीर्तिता। ब्रह्माणं पूजयेद्योऽ स्यामात्मानं च विशेषतः ॥२४६॥ स याति परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः। चैत्र मासि महाबाहो पुण्या प्रतिपदांवरा॥२४७॥ तस्यां यः श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानकुर्यान्नरोत्तमः । न तस्य दुरितं किंचिन्नाधयो व्याधयो नृप॥२४८॥ भवंति कुरुशार्दूल तस्मात्स्रानं समाचरेत् । दिव्यं नीराजनं तब्द्रि सर्वरोगविनाशनम् ॥२४९॥ गोमहिष्यादियत्किञ्चित्तत्सर्व तर्पयेन्नप । तेन वस्त्रादिभिः सर्वैस्तोरणं बाह्यतो न्यसेत् ॥२५०॥ ब्राह्मणानां तथाभोज्यं कुर्यात्कुरुकुलोद्वह । तिस्रो ह्येताः पुरा प्रोक्ता स्तिथयः कुरुनंदन ॥२५९॥ कार्तिकाश्चयुजेमसि चैत्रे मासितथा नृप । स्नानं दानं शतगुणं कार्त्तिके या तिथिर्नृप ॥२५२॥ बलिराजस्तु शुभदा पशूनां हितकारिणी । गायत्युवाच यदुक्तं तु तया वाक्यं सावित्र्या कमलोद्भवम् ॥२५३॥ को शूद्रों से वहन नहीं करवाना चाहिए । पूजा करने वाले पुजारी को छोड़कर किसी को भी उस रथ पर नहीं चढना चाहिए ॥२३९॥ ब्रह्माजी की दाहिनी ओर गायत्री देवी को स्थापित करें, भोजक को वायीं बगल में ब्रह्माजी को समक्ष कमल को स्थापित करे ॥२४०॥ इसतरह काहली की ध्वनि तथा पुष्कल मात्रा में शंख की ध्वनि पूर्वक हे वीर सम्पूर्ण नगर में र्थ को दक्षिणावर्त धुमाकर ॥२४१॥ विज्ञ पुरुष को चाहिए की वह आरती करके उनको अपने स्थान पर स्थापित कर दे । जो पुरुष इसतरह से रथयात्रा कराता है अथवा जो उस यात्रा का भक्ति पूर्वक दर्शन करता है॥२४२॥ अथवा जो रथ को खींचता है, वह मृत्यु के पश्चात् ब्रह्माजी के लोक में जाता है । कार्तिक मास की अमावस्या के दिन जो व्यक्ति ब्रह्माजी के मंदिर में उनके समक्ष दीपक जलाता है । वह परमपद को प्राप्त करता है । चन्दन, पुष्प तथा नवीन वस्र से जो व्यक्ति ब्रह्मा की पूजा प्रतिपद् तिथि को करता है वह ब्रह्माजी के लोक में जाता है । यह तिथि अत्यन्त पवित्र है । इसी तिथि को राजा बलि को राज्य मिला था ॥२४४-२४५॥ यह तिथि ब्रह्माजी को अत्यन्त प्रिय है और इस प्रतिपत् का नाम बालेयी प्रतिपत् है । इस तिथि को जो ब्रह्माजी की पूजा तथा आत्मा की पूजा विशेष रूप से करता है ॥२४६॥ वह निस्सीम तेज: सम्पन्न भगवान् विष्णु के लोक में जाता है । हे महाबाहो! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को जो व्यक्ति चाण्डाल का स्पर्श करके स्नान करता है उस नरश्रेष्ठ को न तो कोई पाप लगता है और न तो उसको कोई आधि-व्याधि होती है ॥२४८॥ हे कुरुश्रेष्ठ ! उस दिन चाण्डाल का स्पर्श करके स्नान करना ही चाहिए । ब्रह्माजी का वह नीराजन दिव्य नीराजन है । सभी रोगों को नष्ट करने वाला है॥२४९॥ गौ, भैस इत्यादि जो कुछ भी हो उसे उन सबों को ले चलना चाहिये । अपने दरवाजे के बाहर वस्त्रादि से तोरण बंधवाये ॥२५०॥ हे कुरुनंदन उस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराये । पहले जो तीन तिथियाँ बतलायी गयी है, वे कार्तिक के महीने में, आश्विन के महीने में तथा चैत्र के महीने में होती है, उनमें जो कार्तिक महीने में प्रतिपदा तिथि होती है, वह सौ गुणा अधिक पुष्यप्रदा होती है ॥२५२। वह राजा बलि का कल्याण करने वाली तथा पशुओं

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