Srishti Khanda Extracted Page 238
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-238
Sanskrit Original
ष्टा त्वंच तदा त्रस्ता वाकपते दुःखितागृहे । वसिष्यसे दुराचारे मम शापेन गर्विते॥१७४॥ देवभार्यासु सर्वासु तदाशापमयच्छत। नचापत्यकृतां प्रीतिमेताः सर्वालभिष्यथ॥१७५॥ दह्यमाना दिवारात्रौ वंध्या शब्देन दूषिताः । गौर्य्यप्येवं तदा शप्ता सावित्र्या वरवर्णिनी ॥१७६॥ रुदमाना तु सा दृष्टा विष्णुना च प्रसादिता। मारोदीस्त्वं विशालाक्षि एह्यागच्छ सदाशुभे ॥१७७॥ प्रविश्य च सभां देहि मेखलां क्षौमवाससी । गृहाणदीक्षां ब्रह्माणि पादौ च प्रणमामि ते॥१७८॥ एवमुक्ताऽब्रवीदेनं न करोमि वचस्तव । तत्र चाहं गमिष्यामि यत्र श्रोष्ये न वै ध्वनिम्॥१७९॥ एतावदुक्ता सारुह्यतस्मात्स्थानात्रिरौ स्थिता। विष्णुस्तदग्रतः स्थित्वा बध्वा च करसंपुटम्॥१८०॥ तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भक्त्या परमया स्थितः। विष्णुरुवाच सर्वगा सर्वभूतेषु द्रष्टव्या सर्वतोद्भुता ॥१८९॥ सदसच्चैव यत्किचिद्दृश्यंतन्नाविना त्वया । तथापि येषु स्थानेषु द्रष्टव्या सिद्धिमीप्सुभिः ॥१८२॥ स्मर्तव्या भूतिकामैर्वा तत्प्रवक्ष्यामि तेऽग्रतः । सावित्री पुष्करे नाम तीर्थानां प्रवरे शुभे ॥१८३॥ वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिंगधारिणी। प्रयागे ललितादेवी कामुका गंधमादने ॥१८४॥ मानसे कुमुदा नाम विश्वकाया तथांबरे । गोमंते गोमती नाम मंदरे कामचारिणी ॥१८५॥ ले लेंगे और वे तुम को भी प्राप्त करना चाहेंगे ॥१७१-१७२॥ नहुष कहेंगे कि मैं इन्द्र हूँ अतएव वह मूर्ख इन्द्राणी मेरी पत्नी क्यों नहीं होती है ? यदि मुझे शची नहीं मिली तो में सभी देवताओं को मार दूँगा ।। १७३॥ उस समय दुःखी होकर तुमको ऐ दुराचरण करने वाली गर्विली शची मेरे शाप के कारण तुम्हें बृहस्पति के घर में निवास करना पड़ेगा ॥ १७४॥ उसके बाद सावित्री ने सभी देवताओं की पत्नियों को शाप दिया कि इन सबों को कभी भी सन्तान जन्य स्नेह नहीं प्राप्त होगा ॥१७५॥ तुमलोग बन्ध्या शब्द से दूषित होकर दिन-रात जलती रहोगी । इसीतरह से सुन्दरी गौरी देवी को भी शाप सावित्री ने दिया ॥१७६॥ इसके बाद रोती हुयी सावित्री देवी को भगवान् विष्णु ने देखा । उन्होंने उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा-- हे शुभे ! हे विशालाक्षि ! मत रोइये आप आइये मेरे साथ, सभा में चलिए और वहाँ आप रेशमी वस्त्र और मेखला धारण कीजिये । हे ब्रह्माणि ! में आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ॥ १७७-१७८॥ इसतरह से भगवान् विष्णु के कहने पर सावित्री देवी ने कहा-- मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी । मैं वहाँ चली जाऊंगी जहाँ पर मुझको यह ध्वनि नहीं सुनायी पड़ेगी ॥१७९॥ इसतरह से कहकर सावित्री देवी पर्वत के ऊपर चढकर वहीं स्थित हो गयी । भगवान् विष्णु उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥१८०॥ उनके सामने प्रणत होकर अत्यधिक भक्ति पूर्वक उनकी (सावित्री देवी की) स्तुति करने लगे । भगवान् विष्णु ने कहा-- हे सर्वव्यापिके ! सभी भूतों में देखी जाने योग्य तथा सबसे अद्भुत देवि ! संसार में जितने भी अच्छे एवं बुरे पदार्थ हैं (या जड़ एवं चेतन पदार्थ हैं) उन सबों में आपकी व्याप्ति है । फिर भी सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक जीवों द्वारा जहाँ पर जिस रूप में आप देखी जाने योग्य हैं, अथवा ऐश्वर्य चाहने वालों के द्वारा जिस रूप में आपका स्मरण करना चाहिए ।।१८१-१८२॥ उसे मैं कह रहा हूँ । तीर्थो में श्रेष्ठ पुष्कर में आपका नाम सावित्री होगा ॥१८३॥ वाराणसी में आपका नाम विशालाक्षी होगा, नैमिष तीर्थ में लिङ्गधारिणी होगा, प्रयाग में आपका नाम ललिता देवी तथा गन्धमादन पर्वत पर कामुका देवी आपका नाम होगा ॥१८४।। मानस तीर्थ में आपका नाम कुमुदा देवी होगा, आकाश में आपका नाम विश्वकाया होगा, गोमन्त तीर्थ में आपका स्मरण गोमती नाम से तथा मन्दराचल पर आपकी
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