Srishti Khanda Extracted Page 237
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-237
Sanskrit Original
जातवेदस्सरु्रस्त्वां रेतसा प्लावयिष्यति । अमेध्येषु च ते जिह्वा अधिकं प्रज्वलिष्यति ॥१५९॥ ब्राह्मणानृत्विजः सर्वान्सावित्री वै शशाप ह । प्रतिग्रहार्थाऽग्निहोत्रो वृथाटव्याश्रयास्तथा॥९६०॥ सदातीर्थानि क्षेत्राणि लोभादेव भजिष्यथ। परान्नेषु सदा तृप्ता अतृप्तास्स्वगृहेषु च ॥१६९१९॥ अयाज्ययाजनं कृत्वा कुत्सितस्य प्रतिग्रहम् । वृथा धनार्जनं कृत्वा व्ययं चैव तथा वृथा॥१६२॥ प्रेतानां तेन प्रेतत्वं भविष्यति न संशयः । एवं शक्रं तथा विष्णुं रुद्रं वै वावकं तथा ॥१६३॥ ब्रह्माणं ब्राह्मणांश्चैव सर्वास्तानाशपद्रुषा । शापं दत्वा तथा तेषां निष्क्रांता सदसस्तथा॥९६४॥ जयेष्ठं पुष्करमासाद्य तदा सा च व्यवस्थिता । लक्ष्मीं प्राह सतीं तां च शक्रभार्यां वराननाम् ॥९६५॥ युवतीस्तास्तथोवाच नात्र स्थास्यामि संसदि। तत्र चाहं गमिष्यामि यत्र श्रोष्ये न च ध्वनिम्॥१६६॥ ततस्ताः प्रमदाः सर्वाः प्रयाताः स्वनिकेतनम्। सावित्री कुपिता तासामपि शापाय चोद्यता ॥१६७॥ यस्मान्मां तु परित्यज्य गतास्ता देवयोषितः। तासामपि तथा शापं प्रदास्ये कुपिता भ्शम् ॥१६८॥ चैकत्र वासो लक्ष्म्यास्तु भविष्यति कदाचन। क्षुद्रा सा चलचित्ता च मूर्खेषु च वसिष्यति ॥१६९॥ म्लेच्छेषु पार्वतीयेषु कुत्सितेऽकुत्सिते तथा । मूर्खेषु चावलिप्तेषु अभिशप्ते दुरात्मनि ॥१७०॥ एवंविधे नरे स्यात्ते वसतिः शापकारिता। शापं दत्वा ततस्तस्या इंद्राणीमशपत्तदा ॥१७१॥ बरह्महत्यागृहीतेद्रे पत्यौ ते दुःखभागिनि। नहुषापहृते राज्ये दृष्ट्वा त्वां याचयिष्यति ॥१७२॥ अहमिन्द्रः कथं चैषा नोपस्थास्यति बालिशा। सवन्दिवान्हनिष्यामि न लप्स्येहं शचीं यदि ॥९७३॥ 8. स स्स प्न Te टन इसके बाद तुम मेरे पुत्र के द्वारा सर्वभक्षी बन जाओगे । महर्षि भूगु के द्वारा शाप देकर दग्ध हुए तुमको मैं कया कहू ?।।१५८॥ ऐ अग्नि तुमको रुद्र वीर्य से डुबो देगें । अपिवित्र वस्तुओं के जलाने में तुम्हारी जिह्वा अधिक प्रज्वलित होगी ।।१५९॥ उसके बाद सावित्री ने समस्त ऋत्विज ब्राह्मणों को शाप दिया तुम लोग दान लेने के लिए अग्निहोत्र करोगे तथा पृथिवी पर व्यर्थ भ्रमण करोगे ॥१६०॥ लोभ से प्रेरित होकर तुम लोग सदा तीर्थो तथा कषत्रं में निवास करोगे । तुमलोगों की तृप्ति सदा परान्न से ही होंगी, तुमलोग अपने घरों में अतृप्त रहोगे ॥ १६ १॥ जो यज्ञ कराने के पात्र नहीं हैं, उनसे यज्ञ कराकर तुमलोग उनसे निन्दित दान लोगे ॥१६२॥ इसलिए मरने के बाद तुमलोग प्रेत हो जाओगे । इसतरह से इन्द्र, विष्णु, रुद्र तथा अग्नि को ॥१६३॥ ब्रह्मा तथा समस्त ब्राह्मणों को क्रोधवशात् शाप देकर सावित्री देवी उस सभा से बाहर निकल गयी ॥१६४॥ वे वहाँ से ज्येष्ठ पुष्कर में आकर, वहाँ स्थित हो गयीं । सभा में हीं उन्होंने लक्ष्मीजी, सती देवी तथा इन्द्र की सुन्दर पत्नी शची से कहा अब मैं इस संसद में नहीं रुक सकती हुँ । अब मैं यहाँ से इतनी दूर चली जाऊंगी जहाँ से यहाँ की ध्वनि न सुनायी - पड़े। १६५-१६६। उसके बाद वे सभी प्रमदाएँ अपने-अपने घर चली गयीं । उन सबों के चले जाने से सावित्री देवी क्रुद्ध हो गयीं और उन सबों को भी शाप देने के लिए तैयार हो गयीं ॥१६७॥ चूकि वे सभी देव पत्नियाँ मुझको छोड़कर चली गयी हैं, अतएव मैं उन सबों को भी शाप दूँगी । मैं इस समय अत्यन्त क्रुद्ध हूँ ॥१६८॥ सावित्री देवी ने कहा-- लक्ष्मी का कभी भी एक स्थान पर निवास नहीं होगा । क्षुद्र स्वभाव तथा चञ्चल चित्त वाली होकर वह मूर्खा के यहाँ निवास करेगी ॥१६९॥ उन्होंने लक्ष्मी के लिए कहा कि मेरे शाप के कारण अत्यन्त निन्दित पर्वतों में रहने वाले म्लेच्छों के यहाँ, मूर्खो के यहाँ, अभिमानियों के यहाँ, अभिशप्तों के यहाँ, दुष्टों के यहाँ।१७०॥ तुम्हारा निवास इसीतरह के लोगों के यहाँ होयेगा । लक्ष्मीजी को शाप देकर उन्होंने इन्द्राणी को शाप दिया; जिस समय इन्द्र ब्रह्महत्या से अभिभूत हो जायेंगे, और तुम्हारे पति अत्यन्त दुःख भोगेंगे । उस समय तुम्हारा राज्य नहुष
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know