Srishti Khanda Extracted Page 236

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-236

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Sanskrit Original

सृष्टिखण्ड शशश पुलस्त्य उवाच एवमुक्ता तदा क्कुद्धा ब्रह्माणं शप्तुमुद्यता ॥१४४॥ यदिमेस्ति तपस्तप्तं गुरवो यदि तोषिताः । सर्वब्रह्मसमूहेषु स्थानेषु विविधेषु च ॥१४५॥ नैव ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन। ऋते तु कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरी तव ॥१४६॥ करिष्यंति द्विजाः सर्वे मर्त्या नान्यत्र भूतले । एतद्वह्माणमुक्त्वाह शतक्रतुमुपस्थितम् ॥ ९४७॥ भो भोः शक्र त्वया नीता आभीरी ब्रह्मणोतिकम् । यस्मात्तेक्षुद्रक कर्म तस्मात्वं लप्स्यसे फलम् ॥१४८॥ यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्रभविष्यसि। तदात्वं शत्रुभि बद्धो नीतः परमिकां दशाम् ॥१४९॥ अकिंचनो नष्टसत्वः शत्रूणां नगरे स्थितः । पराभवं महत्प्राप्य नचिरादेव मोक्ष्यसे ॥१५०॥ शक्रं शप्त्वा तदा देवी विष्णुं वाक्यमथाब्रवीत्। भृगुवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भविष्यति ॥९५ १॥ भार्यावियोगजं दुःखं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे । हताते शत्रुणा पत्नी परेपारेमहोदधेः ॥१५२॥ न च त्वं ज्ञास्यसे नीतां शोकोपहतचेतनः । भ्रात्रा सह परंकष्टमापदं प्राप्यदुःखितः ॥१५३॥ यदा यदुकुले जातः कृष्ण संज्ञोभविष्यसि । पशूनां दासतां प्राप्यचिरकालं भ्रमिष्यसि ॥९ ५४॥ तदाह रुद्रं कुपिता यदा दारुवने स्थितः। तदात्वां ऋषयः क्रुद्धाः शापं दास्यंति वै हर॥९५५॥ भोभोः कापालिक क्षुद्र स्त्रीरस्माकं जिहीर्षसि। तदेतददर्पितं तेद्य भूमौ लिंगं पतिष्यति ॥१५६॥ विहीनः पौरुषेण त्वं मुनिशापाच्च पीडितः। गंगाद्वारे स्थिता पत्नी सात्वामाश्चासयिष्यति॥९५७॥ अग्नेत्वं सर्वभक्षोसि पूर्व पुत्रेण मे कृतः। भृगुणा धर्मनित्येन कथं दग्धं दहाम्यहम् ॥१५८॥ इस तरह से ब्रह्माजी के कहने पर सावित्री देवी क्रुद्ध हो गयीं और ब्रह्माजी को शाप देने के लिए तैयार होगयीं॥१४४॥ उन्होंने कहा यदि मैंने तपस्या की है, यदि मैंने अपने गुरुजनों को संतुष्ट किया है तो सभी ब्रह्म समूह में तथा अनेक स्थानो में ब्राह्मण आपकी पूजा नहीं करेंगे । आपकी केवल कार्तिक के महीने में सांवत्सरिकी पूजा होगी।१४५-१४६॥ भूलोक में दूसरे स्थान पर भी आपकी पूजा नहीं होगी । इसतरह से ब्रह्माजी को शाप देकर सावित्री देवी ने इन्द्र से कहा ॥१४७॥ अरे इन्द्र ! आपने इस अभीर कन्या को ब्रह्माजी के सन्निकट लाया है । यह तुम्हारा क्षुद्र कर्म है,अतएव तुम भी इस कर्म कां फल प्राप्त करोगे ॥१४८॥ इन्द्र जब तुम युद्ध में स्थित रहोगे उस समय तुम शतु के द्वार बाँध दिए जाओगे और बड़ी हीन दशा में पहुँच जाओगे ॥१४९॥ तुम शत्रु के नगर में अकिञ्चन तथा सत्व रहित हो जाओगे । महान् पराभव को प्राप्त करके तुम शीघ्र नहीं छूटोगे ॥१५०॥ इन्द्र को शापदेकर सावित्री देवी भगवान् विष्णु से कही । महर्षि भृगु के शाप के अनुसार जब तुम्हारा जन्म मनुष्य योनि में होगा॥१५१॥ उस समय तुम अपनी पत्नी के वियोग से उत्पन्न दुःख को भोगोगे । शत्रु तुम्हारी पत्मी का अपहरण करके समुद्र के दूसरे पार ले जायेगे ॥१५२॥ शोक सन्तप्त अन्तःकरण वाले अपनी उस पत्नी का पता नहींपाओगे। तुम अपने भाई के साथ अत्यधिक कष्ट को भोगोगे ॥१५३॥ जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे उस समय तुम्हारा नाम कृष्ण होयेगा । उस समय तुम पशुओं के दास (चरवाहे) बनकर दीर्घकाल तक वन में भ्रमण करोगे॥१५४॥ उसके बाद क्रुद्ध होकर सावित्री देवी ने रुद्र से कहा--- जब तुम दारुक बन में रहोगे उस समय हे हर क्रुद्ध होकर ऋषिगण तुम को शाप देंगे ॥१५५॥ वे कहेंगे कि ऐ क्षुद्र कापालिक तुम हमलोगों की स्त्रियों का हरण करना चाहते हो क्या ? तुम्हारा यह दर्प युक्त लिङ्ग पृथिवी पर गिर जायेगा ॥१५६॥ तुम पौरुष से विहीन होकर मुनियों के शाप से पीड़ित हो जाओगे । जब तुम हरिद्वार में रहोगे तो तुम्हारी पत्नी तुम्हें आश्वस्त करेगी।। १५७॥।

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