Srishti Khanda Extracted Page 235
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-235
Sanskrit Original
प्रावर्ग्ये क्रियमाणे तु ब्राह्मणैवेंदपारगै: । क्षीरद्दयेन संयुक्तश्ृतेनाध्वर्युणा तथा ॥१३२॥ उपहूते नागते नचाहूतेषु द्विजन्मसु । क्रियमाणे तथा भक्ष्ये दृष्ट्वा देवी रुषान्विता ॥१३३॥ उवाच देवी ब्रह्माणं सदो मध्ये तु मौनिनम्। किमेतद्युज्यते देव कर्तुमेतद्विचेष्टितम् ॥१३४॥ मां परित्यज्य यत्कामात्कृतवानासि किल्विषम् । न तुल्या पादरजसा ममैषा या शिरः कृता॥१३५॥ यद्वदंति जना स्सर्वे संगताः सदसि स्थिताः । आज्ञामीश्चरभूतानां तां कुरुष्व यदीच्छसि॥१३६॥ भवता रूपलोभेन कृतं लोकविगर्हितम्। पुत्रेषु न कृता लज्जा पौत्रेषु च न ते प्रभो ॥१३७॥ कामकारकृतं मन्य एतत्कर्म विगर्हितम्। पितामहोसि देवानामृषीणां प्रपितामहः ॥९३८॥ कथं न ते त्रपा जाता आत्मनः पश्यतस्तनुम् । लोकमध्ये कृतं हास्यमहं चापकृता प्रभो ॥१३९॥ यद्येष ते स्थिरो भावस्तिष्ठ देव नमोस्तुते । अहं कथं सखीनां तु दर्शयिष्यामि वै मुखम्॥९४०॥ भर्त्रा मे विधृता पत्नी कथमेतदहं वदे। ब्रह्मोवाच ऋत्विग्भिस्त्वरित श्चाहं दीक्षाकालादनंतरम् ॥९४९॥ पत्नीं विना न होमोऽत्र शीध्रं पत्नीमिहानय । शक्रेणेषा समानीता दत्तेयं मम विष्णुना ॥१४२॥ गृहीता च मया सुश्रु क्षमस्वैतं मया कृतम् । नचापराधं भूयोन्यं करिष्ये तव सुव्रते ॥१४३॥ पादयोः पतितस्तेऽहं क्षमस्वेह नमोस्तुते। 3-८3 न पल --+++«- कयता मनन जाड चरुभाग को ग्रहण करने वाले, यज्ञभाग को प्राप्त करने की इच्छा से शीघ्र ही बोल रहे थे ॥१३०॥ कोई काम देर से नहीं करना चाहिए, देर करने से फल की प्राप्ति नहीं होती है, मनीषियों ने इसी प्रकार से वेदों में अधिकार अनुभव किया है ॥१३१॥ जिस समय वेद पारङ्गत ब्राह्मण प्रावर्ग्ग कर रहे थे । दो प्रकार से दुग्ध से पके हुए अध्वर्यु के द्वारा ॥१३२॥ उपहूत तथा आने के बाद आहूत ब्राह्मणों के द्वारा किए जाते हुए प्रवर्ग्य को देखकर सावित्री देवी क्रुद्ध हो गयीं ॥१३३॥ सभा के बीच में मौन बैठे हुए ब्रह्माजी को देखकर सावित्री देवी ने कहा-- हे देव ! आपके द्वारा की गयी यह क्रिया क्या उचित है 2॥१३४॥ आपने यह जो मुझको त्याग कर कामवशात् पापकर्म किया है । जिसको आपने अपने शिर चढाया है वह तो मेरे पैर की धूलि के भी समान नहीं है ॥१३५॥ इस सभा में स्थित लोग जो स्वामी के समान कहते हैं, उसे ही आप करते जाइये ॥१३६॥ रुप के लोभ में पड़कर आपने यह लोक निन्दित कर्म किया है । हे प्रभो ! आपको अपने पुत्रों तथा पौत्रों के सामने लज्जा भी नहीं आयीं?॥१३७॥ मुझे लगता है कि आपने यह निन्दित कर्म अपनी इच्छा से किया है । आप देवताओं के पितामह तथा ऋषियों के प्रपितामह हैं ॥१३८॥ अपने शरीर को देखकर आपको लज्जा क्यों नहीं आयी ? आपने संसार में मेरी हँसी करायी हैऔर मेरा अपमान आपने किया है ॥१३९॥ यदि आपका यह स्थिर भाव है, हे देव ! आप यहाँ रहें आपको नमस्कार है । मैं अपनी सखियों को यहाँ किस प्रकार अपना मुख दिखाऊँगी ?॥१४०॥ मैं यहाँ कैसे कहूँ कि मेरे पति ने दूसरी पत्नी बना लिया है ? ब्रह्माजी ने कहा-- दीक्षाकाल के पश्चात् ऋत्विजं ने शीश्रता करने को मुझे कहा ॥१४१॥ उन लोगों ने कहा पत्नी के बिना होम नहीं हो सकता है । पत्नी को शीघ्र बुलाइये । उस समय इन्द्र ने इसको यहाँ ला दिया और विष्णु ने इसे मुझे प्रदान कर दिया ॥१४२॥ इसके बाद मैंने इसे स्वीकार कर लिया । हे देवि ! मेरे इस अपराध को आप क्षमा करें । हे सुव्रते ! अब कभी भी मैं आपका अपराध नहीं करूँगा ॥१४३॥ मैं तुम्हारा पैर पकड़ता हूँ । तुम मुझे क्षमा कर दो । तुम्हें नमस्कार है । पुलस्त्य महर्षि ने कहा--
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