Srishti Khanda Extracted Page 234
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-234
Sanskrit Original
कर्पूराणि विचित्राणि जंबूकानि शुभानि च । अक्षोटामलकान् गृह्य जंबीराणि तथा परा ॥११६॥ बिल्वानि परिपक्वानि चिपिटानि वरानना। कार्पासतूलिकाश्चान्या वस्त्रं कौसुंभकं तथा॥९९७॥ एवमाद्यानि चान्यानि कृत्वा शूर्पे वराननाः । सावित्र्या सहिताः सर्वाः संप्राप्ताः सहसा शुभाः॥९१८॥ सावित्रीमागतां दृष्ट्वा भीतस्तत्र पुरंदरः। अधोमुखः स्थितो ब्रह्मा किमेषा मां वदिष्यति॥११९॥ त्रपान्वितौ विष्णुरुद्रौ सर्वे चान्ये द्विजातयः। सभासदस्तथा भीतास्तथा चान्ये दिवौकसः ॥१२०॥ पुत्रा: पौत्रा भागिनेया मातुला भ्रातरस्तथा। ऋभवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः ॥१२१॥ वैलक्ष्येऽ वस्थिताः सर्वे सावित्री किं वादिष्यति । ब्रह्मपाश्वें स्थिता तत्र किंतु वै गोपकन्यका ॥९२२॥ मौनीभूता तु शृण्वाना सर्वेषां वदतां गिरः । अध्वर्युणा समाहूता नागता वरवर्णिनी॥१२३॥ शक्रेणान्याहता भीरा दत्ता सा विष्णुना स्वयम् । अनुमोदिता च रुद्रेण पित्राऽदत्तास्वयं तथा॥९२४॥ कथं सा भविता यज्ञे समाप्तिं वाब्रजेत्कथम्। एवं चिन्तयतां तेषां प्रविष्टा कमलालया ॥१२५॥ वृतो ब्रह्मा सदस्यैस्तु ऋत्विग्भि्दैवतै स्तथा । हूयंते चामग्नयस्तत्र ब्राहमणैर्वेदपारगैः ॥१२६॥ पत्लीशालास्थिता गोपी सैणश्रृंगा समेखला । क्षौमवस्त्रपरीधाना ध्यायंती परमं पदम्॥९२७॥ पतिव्रता पतिप्राणा प्राधान्ये च निवेशिता। रूपान्विता विशालाक्षी तेजसा भास्करोपमा ॥९२८॥ द्योतयंती सदस्तत्र सूर्यस्येव यथा प्रभा। ज्वलमानं तथावह्निं श्रयंते ऋत्विजस्तथा ॥१२९॥ पशूनामिहगृह्णाना भागं स्वस्वचरोर्मुदा। यज्ञभागार्थिनो देवा विलंबाद्ब्रुवते तदा ॥१३०॥ कालहीनं न कर्तव्यं कृतं न फलदं यतः । वेदेष्वेवमधीकारो दृष्टः सर्वैर्मनीषिभिः ॥१३१॥ तथा ऑवला ले ली थीं । कुछ देवियाँ ॥११५-११६॥ पके हुए विल्व के फल तथा चिउड़ा ली थी । कुछ देवियाँ कपास की रुई तथा कुछ कुसुम्भरङ्ग के वस्रों को ली थीं ॥११७॥ इसतरह की दूसरी भी वस्तुओं को शूप में रखकर देवियाँ सहसा सावित्री देवी के साथ वहाँ आयीं'।११८॥ आयी हुयी सावित्री देवी को देखकर इन्द्र भयभीत हो गये। ब्रह्माजी नीचे मुँह करके इसलिए बैठे थे कि सावित्री न जाने मुझको क्या कहेगी ॥११९॥ विष्णु, रुद्र तथा दूसरे ब्राह्मण लज्जित थे । सभी सभासद तथा देवता भी भयभीत थे ॥१२०॥। वहाँ पर ब्रह्माजी के पुत्र, पौत्र, भागिने, मामा, भाई, देवताओं के भी देव ऋभु नामक देवगण ।॥१२१॥ ये सबके सब इसलिए उदासीन बैठे थे कि सावित्री देवी उन सबों को न जाने क्या कहेंगी । किन्तु ब्रह्माजी के बगल में वह गोपकन्या सबों की वाणी को सुनती हुयी मौन होकर बैठी थी । अध्वर्यु ने उनको बुलाया भी किन्तु वह वहाँ नहीं गयीं ॥१२२-१२३॥ उस आभीर कन्या को स्वयं इन्द्र लाये थे और विष्णु ने उसको (गायत्री देवी को) ब्रह्माजी को पत्नी रूप से प्रदान किया था । उसका अनुमोदन रुद्र ने किया था तथा ब्रह्माजी ने उसको स्वयं स्वीकार किया था ॥१२४।। इस यज्ञ में न जाने क्या होगा ? यज्ञ परिपूर्ण कैसे होगा ? इस तरह से सभी चिन्ता ही कर रहे थे कि उसी समय कमलासना सावित्री देवी यज्ञशाला में आ गयीं । ब्रह्माजी के चारो ओर सदस्य थे, ऋत्विक् थे तथा देवता बैठे थे । वहाँ पर वेद पारंगत ब्राह्मण अग्नियों में होम कर रहे थे ॥१२६॥ गायत्री देवी हाथ में मृग का श्रृंग लिए हुए तथा मेखला बाधे हुए पत्नीशाला में विद्यमान थीं । वह रेशमी वस्त्र पहने थीं और भगवान् विष्णु का ध्यान कर रही थी ॥१२७॥ वह प्रतित्रता तथा पति को प्राण के समान समझने वाली प्रधान रूप से वहाँ बैठी थीं । वह रूपवती थी तथा उसकें बड़े-बड़े नेत्र थे । उसका सूर्य के समान तेज था ॥१२८॥ जिस तरह सूर्य को प्रभा देवी प्रकाशित करती हैं, उसीतरह वह सम्पूर्ण सभा को प्रकाशित कर रही थीं । ऋत्विगण जलती हुयी अग्नि का सेवन कर रहे थे ॥१२९॥ देवता अपने-अपने तथा पशुओं के
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