Srishti Khanda Extracted Page 231

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-231

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

हक श्रीपद्ममहापुणण वेश्यायां तु रता द्यूते पितृमातृविवर्जिताः । न पुत्रः पैतृकं वित्तं विद्यां वापि गमिष्यति ॥७९॥ सर्वे च मोहिताः संतु सर्वोद्रियविवर्जिताः । रौद्रीं भिक्षां समश्नंतु परपिंडोपजीविनः ॥७२॥ आत्मानं वर्तयंतश्च निर्ममा धर्मवर्जिताः । कृपार्पिता तुयैर्विप्रै रुन्मत्ते मयि सांप्रतम् ॥७३॥ तेषां धनं च पुत्राश्च दासी दासमजाविकम् । कुलोत्पन्नाश्चवै नार्यो मयि तुष्टे भवन्त्विह ॥७४॥ एवं शमपं वरं चैव दत्वांतर्दानमीश्वर: । गतोद्विजा गते देवे मत्वा तं शङ्करं प्रभुम् ॥७५॥ अन्विष्यंतोपि यत्नेन न चापश्यंत ते यदा। तदा नियमसंपन्नाः पुष्करारण्यमागताः ॥७६॥ स्नात्वा ज्येष्ठसरो विप्रा जेपुस्ते शतरुद्रियम्। जाप्यावसाने देवस्तानशरीरगिराब्रवीत् ॥७७॥ अनृतं न मया प्रोक्तं स्वैरेष्वपि कुतः पुनः। आगतोनिग्रहे क्षेमं भूयोपि करवाण्यहम् ॥७८॥ शांता दांता द्विजा ये तु भक्तिमंतो मयि स्थिराः । न तेषां छिद्यते वेदो न धनं नापि संततिः॥७९॥ अग्निहोत्ररता ये च भक्तिमंतो जनार्दने । पूजयंति च ब्रह्माणं तेजोराशिं दिवाकरम् ॥८०॥ नाशुभं विद्यते तेषां येषां साम्ये स्थिता मतिः । एतावदुक्त्वा वचनं तूष्णीं भूतस्तु सोऽ भवत् ॥८ १॥ लब्ध्वा वरं सप्रसादं देवदेवान्महेश्वरात्। आजग्मुः सहितास्सर्वे यत्र देवः पितामहः ॥८ २॥ विरिञ्चि संहिताजाप्यैस्तोषयंतोऽ ग्रतः स्थिताः । तुष्टस्तानब्रवीद्वृह्मा मत्तोपि व्रियतां वरः ॥८३॥ ब्रह्मणस्तेन वाक्येन हृष्टाः सर्वे द्विजोत्तमाः । को वरोयाच्यतां विप्राः परितुष्टे पितामहे॥८४॥ अग्निहोत्राणि वेदाश्च शास्त्राणि विविधानि च । सांतानिकाश्च ये लोका वरदानाद्भवंतु नः ॥८५॥ ब्राह्मणों को शाप दे दिया कि तुमलोग वेदज्ञान विहीन, ऊपर की ओर जटा रखने वाले, सज्ञाधिकार से रहित, परस्त्रीगामी ।॥७०॥ वेश्या प्रेमी और द्यूतप्रेमी, माता-पिता से रहित हो जाओगे । तुमलोगों का पुत्र पिता की सम्पत्ति अथवा विद्या को नहीं प्राप्त कर पायेगा ॥७१॥ तुमलोग अज्ञानी तथा सभी इन्द्रियों से रहित हो जाओ । रुद्र की भिक्षा को खाने वाले होओगे । दूसरों के द्वारा दिए गये अन्न पर जीओगे ॥७२॥ अपने शरीर का पोषण करने वाले, निर्मम तथा अधार्मिक हो जाओगे । जिन ब्राह्मणों ने मुझ उन्मत्त के ऊपर इस समय कृपा की है ॥७३॥ उनके यहाँ, धन, पुत्र, दासी, दास, अजा, अविक (भेंड) आदि पशु हों । मेरी प्रसन्नता से उनके यहाँ सद्वंश में उत्पन्न नारियाँ हों।।७४।। इसतरह से शाप तथा वरदान देकर शङ्करजी अन्तर्धान हो गये । उनके चले जाने पर ब्राह्मणों ने जाना कि ये तो भगवान् शङ्कर थे ॥७५॥ उनका अन्वेषण करके भी वे ब्राह्मण जब उनको नहीं प्राप्त कर सके तो वे नियम का पालन करते हुए पुष्कर धाम में आये ॥७६॥ वहाँ वे ब्राह्मण ज्येष्ठ पुष्कर में स्नान करके शतरुद्रिय सूक्त का जप किए । पाठ के अन्त में भगवान् शङ्कर ने उन ब्राह्मणों से आकाशवाणी से कहा ॥७७॥ मैंने कोई भी बात झूठ नहीं कहा है, और स्वच्छान्दाचारियों के प्रति क्या कहना है । निग्रह का विषय बन जाने पर में क्षमा भी करता हूँ ॥७८॥ जो ब्राह्मण, शान्त, दान्त हैं; जिनकी मुझमें सुदृढ भक्ति है, उन सबों के वेद ज्ञान, धन तथा सन्तान का नाश नहीं होगा ॥७९॥ अग्निहोत्र करने वाले भगवान् विष्णु की भक्ति करने वाले, ब्रह्माजी की पूजा करने वाले तथा तेजोराशि सूर्य की पूजा करने वाले ॥८०॥ किञ्च जिनका साम्य (सबों के प्रति भगवदात्मकत्व) में बुद्धि लगी रहती है, उन लोगों का कभी अमङ्गल नहीं होता है । इतना ही मात्र कहकर आकाशवाणी चुप हो गयीं ॥८ १॥ देवाराध्य भगवान् शङ्करजी से प्रसन्नता पूर्वक वर प्राप्त करके वे सब एक साथ वहाँ आये जहाँ पर ब्रह्मदेव विद्यमान थे ॥८ २॥ संहिता के मन्त्रं से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके, उनके सामने खड़े ब्राह्मणों से ब्रह्माजी ने कहा आपलोग मुझसे भी वरदान माँगें। ८ ३॥ ब्रह्मजी के उस वाक्य को सुनकर सभी ब्राह्मण प्रसन्न हो गये; उन्होंने कहा- ब्राह्मणों प्रसन्न हुए ब्रह्माजी

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know