Srishti Khanda Extracted Page 230

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-230

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Sanskrit Original

प्रविष्टो ब्रह्मणः सद्म दृष्टो देवो द्विजोत्तमै: । प्रहसांति च केप्येनं केचिन्निर्भर्त्सयंति च ॥५६॥ अपरे पांसुभिः सिञ्चन्त्युन्मत्तंतं तं तथा द्विजाः। लोष्ठैश्च॒ लगुडैश्चान्ये शुष्मिणो बलगर्विताः ॥५७॥ प्रहरन्तिस्मोपहासं च कुर्वाणा हस्तसंविदम्। ततोन्ये बटवस्तत्र जटास्वागृह्ण चांतिकम् ॥५८॥ पृच्छति व्रतचर्या तां केनैषा ते निदर्शिता । अत्र वामा स्त्रियः संति तासामर्थे त्वमागतः ॥५९॥ केनैषा दर्शिता चर्या गुरुणा पापदर्झशिना। येन चोन्मत्तवद्वाक्यं वदन्मध्ये प्रधावसि ॥६०॥ शिश्चं मे ब्रह्मणो रूपं भगं चापि जनार्दनः । उप्यमानमिदं बीजं लोकः क्लिश्राति चान्यथा ॥६ ९॥ मयायं जनितः पुत्रो जनितोनेन चाप्यहम् । महादेवकृते सृष्टिः सृष्टा भार्या हिमालये ॥६२॥ उमा दत्ता तु रुद्रस्य कस्य सा तनया वद । मूढा यूयं न जानीथ वदतां भगवांस्तु व: ॥६३॥ ब्रह्मणा न कृता चर्या दर्शितेनेव विष्णुना । गिरिशेनापि देवेन ब्रह्मवध्याकृतेन तु ॥६४॥ कथस्विद्वर्हसे देवं वध्योस्माकं त्वमद्य वै । एवं तै ् हन्यमानस्तु ब्राह्मणस्तत्र शंकरः ॥६५॥ स्मितं कृवा ब्रवीत्सर्वान्ब्राह्मणन्नपसत्तम । किं मां नवित्थभो विप्रा उन्मत्तं नष्टचेतनम् ॥६६॥ यूयं कारुणिकाः सर्वे मित्रभावे व्यवस्थिताः । वदमानमिदं छदा ब्रह्मरूपधरं हरम्॥६७॥ मायया तस्य देवस्य मोहितास्ते द्विजोत्तमाः । कपर्दिनं निजध्नुस्ते पाणिपादैश्च मुष्टिभिः ॥६८॥ दंडेश्रापि चकोलैश्च उन्मत्तवेषधारिणम्। पीड्यमानस्ततस्तैस्तु द्विजैः कोपमथागमत् ॥६९॥ ततो देवेन ते शप्ता यूयं वेदविवर्जिताः । ऊर्ध्वजटाः क्रतुभ्रष्टाः परदारोपसेविनः ॥७०॥ समय शिवजी के द्वारा नगर के देखने के समय, ब्राह्मणों के बात करने पर कौतुकवशात् सभा में आकर स्विष्ट कृत होम के समय शङ्करजी उसी उन्मत्त वेष से ।५४-५५॥ ब्राह्मणों के गृह में प्रवेश कर गये । उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने देखा । उसको देखकर कुछ ब्राह्मणों ने उनका उपहास किया तो कुछ ब्राह्मणों ने शङ्करजी की भर्त्सना की ॥५६॥ दूसरे ब्राह्मण उन्मत्त शङ्करजी के ऊपर धूल फेंकने लगे । बल के गर्व से दृप्त बने कुछ ब्राह्मण ढेले और लाठी से उन्हें मारने लगे ॥५७॥ कुछ लोग सन्निकट में विद्यमान शङ्करजी का उपहास करने लगे । उसके बाद दूसरे ब्राह्मण शङ्करजी की जटा को पकड़कर ॥५८॥ पूछने लगे कि तुमको इस व्रतचर्या को किसने बतलाया है ? यहाँ सुन्दर खनियाँ हैं क्या उन सबों के लिए तुम यहाँ आये हो ?॥५९॥ किस पापी गुरु ने तुमको यह आचरण बतलाया है ? जिसके कारण पागल के समान बोलते हुए तुम सबों के बीच में दौड़ रहे हो ?।६०॥ शङ्करजी ने कहा मेरा लिङ्ग ब्रह्म रूप है और जनार्दन ही मन हैं । इस बीज का वपन करने से संसार कष्टानुभव करता है ॥६१॥ मैंने इसे पुत्र रूप से उत्पन्न किया और इसने मुझे उत्पन्न किया है । महादेव के द्वारा सृष्टि की जाने पर उनकी पत्नी की सृष्टि हिमालय से हुयी ॥६२॥ उमा का विवाह शङ्कर से हुआ, बतलाओ वह किसकी पुत्री है ? तुमलोग मूर्ख हो नहीं जानते हो, जाकर इस बात को ब्रह्माजी से पूछो ॥६३॥ इस आचरण को ब्रह्मा ने नहीं किया, इसे विष्णु ने भी नहीं बतलाया, ब्रह्म हत्या करने वाले शङ्कर के द्वारा यह चर्या की गयी ॥६४॥ अरे तुम ब्रह्माजी की निन्दा कर रहे हो आज तुम हमलोगों के बध्य हो, इसतरह से उन ब्राह्मणों द्वारा कहकर मारे जाते हुए ॥६५॥ हे नृप श्रेष्ठ शङ्करजी ने मुस्कुराकर ब्राह्मणों से कहा-- ब्राह्मणों ! क्या तुमलोग उन्मत्त तथा अज्ञानी मुझको नहीं जानते हो 2॥६६॥ आपलोग दयालु तथा मेरे मित्र हैं । इस तरह से कहने वाले बनावटी ब्रह्मरूपधारी शङ्करजी को ॥६७॥ शङ्करजी की माया से मोहित वे ब्राह्मण श्रेष्ठ उन्मत्त वेषधारी शङ्करजी को हाथ, पैर तथा मुक्कों से ॥६८॥ दण्डों और कील से मारने लगे। उन सबों के द्वारा उस प्रकार से पीडित किए जाते हुए शङ्करजी क्रुद्ध हो गये ॥६९॥ उसके बाद शङ्करजी ने उन

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