Srishti Khanda Extracted Page 229
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-229
Sanskrit Original
कथं होमोऽत्र क्रियते कपाले सदसि स्थिते । कपालांतान्यशौचानि पुरा प्राह प्रजापतिः ॥४९॥ विप्रेभ्योऽ धात्सदस्येकः कपालमुत्क्षिपाम्यहम्। उद्भृतं तु सदस्येन प्रक्षिप्तं पाणिना स्वयम् ॥४२॥ तावदन्यत्स्थितं तत्र पुनरेव समुद्धतम् । एवं द्वितीयं तृतीयं विंशतिरित्रंशदप्यहो ॥४३॥ पंचाशच्च शतं चैव सहस्रमयुतं तथा। एवं नांतः कपालानां प्राप्यते द्विजसत्तमैः ॥४४॥ नत्वा कपर्दिनं देवं शरणं समुपागताः । पुष्करारण्यमासाद्य जप्यैश्च वैदिकै भृशम्॥४५॥ तुष्टुवुः सहिताः सर्वे तावत्तुष्टो हरः स्वयम्। ततः स दर्शनं प्रादादिद्दजानां भक्तितः शिवः ॥४६॥ उवाच तांस्ततो देवो भक्तिनम्रान् द्विजोत्तमान् । पुरोडाशस्यनिष्पत्तिः कपालं न विना भवेत्॥४७॥ कुरुध्वं वचनं विप्राः भागः स्विष्टकृतो मम । एवं कृते कृतं सर्व मदीयं शासनं भवेत् ॥४८॥ तथेत्यूचु ईिजाश्शंभुं कुर्मो वै तव शासनम्। कपालपाणिराहेशो भगवतं पितामहम् ॥४९॥ वरं वरय भो ब्रह्मन्हृदि यत्तेप्रियं स्थितम्। सर्व तव प्रदास्यामि अदेयं नास्ति मे प्रभो ॥५०॥ ब्रह्मोवाच नते वर ग्रहीष्यामि दीक्षितोऽहं सदः स्थितः। सर्वकामप्रदश्चाहं यो मां प्रार्थयते त्विह ॥५१॥ एवं वदंतं वरदं क्रतौ तस्मिन्पितामहम् । तथेति चोक्त्वा रुद्रः स वरमस्मादयाचत ॥५२॥ ततो मन्वंतरेतीते पुनरेवप्रभुः स्वयम्। ब्रह्मोत्तरं कृतं स्थानं स्वयं देवेन शंभुना॥५३॥ चतुर्ष्वपि हि वेदेषु परिनिष्ठां गतो हि यः। तस्मिन्काले तदा देवो नगरस्यावलोकने ॥५४॥ संभाषणे द्विजानां तु कौतुकेन सदोगतः । तेनैवोन्मत्तवेषेण हुतशेषे महेश्वरः ॥५५॥ शङ्करजी के स्नान करने के लिए पुष्कर में चले जाने पर ब्राह्मणों ने कहा ॥४०॥ जब सभा में कपाल विद्यमान है तो फिर होम कैसे किया जा सकता है ? कपाल के भीतर रहने वाली वस्तुएँ अपवित्र होती हैं ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है।।४ १५॥ उस समा में एक ब्राह्मण ने कहा में कपाल को उठाकर फेंक देता हूँ, और स्वयं सदस्य के द्वारा उसे उठाकर अपने हाथ से फेंक दिए जाने पर ॥४२॥ वहाँ पर दूसरा कपाल निकल आया फिर उसको फेंका गया । इसतरह दूसरा, तीसरा, बीसवाँ, तीसवाँ, भी कपाल फेंका गया ॥४३॥ पचासवाँ, सौवाँ, हजारवाँ, दश हजारवाँ भी उसी तरह उठाकर फेंका गया । इस तरह वे ब्राह्मण श्रेष्ठ कपालों का अन्त नहीं कर पा रहे थे ॥४४।॥ इसके बाद शङ्करजी को नमस्कार करके वे ब्राह्मण उनके शरणागत हो गये । पुष्करारण्य में आकर वैदिक मन्त्रों के द्वारा उन लोगों ने शङ्करजी की बहुत अधिक स्तुति की । उससे शङ्करजी प्रसन्न हो गये । उसके बाद ब्राह्मणों की भक्ति के कारण प्रसन्न होकर शङ्करजी ने साक्षात् दर्शन दिया ॥४५-४६॥ उसके बाद उनकी भक्ति से नम्र बने हुए ब्राह्मणों से रा्करजी ने कहा कि कपाल के बिना पुरोडाश की सिद्धि नहीं हो सकती है ॥४७॥। हे ब्राह्मणों ! मेरी बात मानो स्विष्टकृत का भाग मेरा होता है । ऐसा करने से मेरी सभी आज्ञाओं का पालन हो जाता है ॥४८॥। ब्राह्मणों ने तथास्तु कहकर शङ्करजी से कहा कि हमलोग आपकी आज्ञा का पालन करेंगे । हाथ में कपाल लेकर शिवजी ने ब्रह्माजी से कहा ॥४९॥ हे ब्रह्मन्! आपके हृदय में जो हो उस वरदान को आप माँग लीजिए । आप जो भी कहेंगे वह मैं आपको दूँगा । आपको अदेय कुछ भी नहीं हैं ॥५०॥ ब्रह्माजी ने कहा-- मैं तुम्हारा वरदान नहीं लूँगा; मैं दीक्षित होकर सभा में स्थित हूँ । कोई भी जो कुछ मुझसे याचना करता है, मैं उसकी सारी कामनाओं को पूर्ण कर देता हूँ ॥५१॥ उस यज्ञ में इस प्रकार से कहने वाले तथा वरदान देने वाले ब्रह्माजी से शङ्करजी ने वरदान माँगा ॥५२॥। उसके बाद मन्वन्तर के बीत जाने पर फिर स्वयं प्रभु ब्रह्मोत्तर स्थान पर स्वयं शङ्करजी ने अपना स्थान बनाया ॥५३॥ चारो वेद में पारङ्गत उस
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