Srishti Khanda Extracted Page 228
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-228
Sanskrit Original
वामहस्तेन तान् सर्वान् प्रणिपातपुरः सरम् । अत्र चाहं स्थिता मातर्त्रह्माणं समुपागता॥२६॥ भर्ता लब्धो मया देवः सर्वस्याद्यो जगत्पतिः। नाहं शोच्या भवत्या तु न पित्रा नच बांधवैः ॥२७॥ सखीगणश्च मे यातु भगिन्यो दारकैः सह । सर्वेषां कुशलं वाच्यं स्थितास्मि सहदैवतैः ॥२८॥ ` गतेषु तेषु सर्वेषु गायत्री सा सुमध्यमा। ब्रह्मणा सहिता रेजे यज्ञवाटं गता सती॥२९॥ . याचितो ब्राह्मणैर्ब्रह्मा वरान्नो देहि चेप्सितान्। यथेप्सितं वरं तेषां तदा ब्रह्माप्ययच्छत॥३०॥ तया देव्या च गायत्र्या दत्तं तच्चानुमोदितम्। सा तु यज्ञे स्थिता साध्वी देवतानां समीपगा ॥३९॥ दिव्यं वर्षशतं साग्रं स यज्ञो ववृधे तदा। यज्ञवाटं कपर्दी तु भिक्षार्थं समुपागतः॥३२॥ बृहत्कपालं संगृह्य पंच मुण्डरैलंकृतः । ऋत्विग्भिश्च सदस्यैश्च दूरात्तिष्ठन् जुगुप्सितः ॥३३॥ कथं त्वमिह संप्राप्तो निंदितो वेदवादिभिः । एवं प्रोत्सार्यमाणोपि निंद्यमानः स तैर्द्विजैः ॥३४॥ उवाच तान्द्िजान् सर्वान् स्मितं कृत्वा महेश्वरः। अत्र पैतामहे यज्ञे सर्वेषां तोषदायिनि॥३५॥ कश्चिदुत्सार्येते नैव ऋते मां द्विजसत्तमाः । उक्तः स तैः कपर्दी तु भुक्त्वा चान्नं ततो ब्रज॥३६॥ कपर्दिना च ते उक्ता भुक्त्वा यास्यामि भो द्विजाः । एवमुक्त्वा निषण्णः स कपालं यस्य चाग्रतः ॥३७॥ तेषां निरीक्ष्य तत्कर्म चक्रे कौटिल्यमीश्वरः । मुक्त्वा कपालं भूमौ तु तान्द्रिजानवलोकयन्॥३८॥ उवाच पुष्करं यामि स्नानार्थं द्विजसत्तमाः। तूर्ण गच्छेति तै रुक्तः स गतः परमेश्वरः॥३९॥ वियत्स्थितः कौतुकेन मोहयित्वा देवौकसः । स्नानार्थ पुष्करं याते कपर्दिनि द्विजातयः ॥४०॥ लोग यहाँ तक आ गये । उन सबों को देखकर उसने कहा मैंने पति के रूप में सर्वप्रथम देव ब्रह्माजी को प्राप्त किया हे । आपलोगों या मेरे माता-पिता को मेरे विषय में कोई चिन्ता नहीं करना चाहिए ॥२५-२७॥ मेरी सखियों, मेरी बहनें, उनके बच्चों सबों से मेरा कुशल आपलोग कहेंगे । में देवताओं के साथ हूँ ॥२८॥ उन सबों के चले जाने पर अत्यन्त सुन्दरी गायत्री देवी, ब्रह्माजी के साथ यज्ञशाला में सुशोभित हुयीं ॥२९॥ इसके बाद ब्राह्मणों ने ब्रह्माजी से कहा आप हमलोगों को अभिप्रेत वरदान दें । उसके बाद ब्रह्माजी ने भी उन सबों को अभिलषित वरदान प्रदान किया॥३ ०॥ गायत्री देवी ने भी ब्रह्माजी द्वारा दिए गये वरदान का अनुमोदन किया । वह साध्वी देवी देवताओं के समीप बनी रही ॥३१॥ वह यज्ञ दिव्य सौ वर्ष से भी अधिक वर्षा तक चलता रहा उसी समय यज्ञशाला में भगवान् शिव भिक्षा प्राप्त करने के लिए आये ॥३२॥ वे अपने हाथ में बहुत बड़ा कपाल लिए हुए तथा पाञ्च मुण्डों की माला धारण किए हुए थे । उन्हें दूर से ही देखकर ऋत्विक् तथा सदस्य उनकी निन्दा करने लगे ॥३३॥ तुम यहाँ कैसे आ गये? वेदज्ञ पुरुष तुम्हारी निन्दा करते हैं, उन ब्राह्मणों द्वारा निन्दा किए जाते हुए तथा उन लोगों के द्वारा भगाये जाने पर भी ॥३४॥ शिवजी ने उन ब्राह्मणों से मुस्कुराकर कहा-- सबों को सन्तुष्ट करने वाले इस ब्रह्माजी के यज्ञ में ॥३५।। किसी को भी नहीं भगाया जाता है, हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! केवल मुझको ही भागाया जा रहा है ? इसके बाद ब्राह्मणों ने कहा ठीक है, तुम भोजन करके चले जाना । इस पर शङ्करजी ने कहा-- हे ब्राह्मणों ! मैं भोजन करके चला जाऊँगा । इसतरह से कहकर शङ्करजी अपने सामने कपाल रखकर बैठ गये ॥३७॥ उन ब्राह्मणों. के उस कर्म को देखकर शङ्करजी ने कुटिलता की । कपाल को भूमि पर रखकर उनलोगों को देखते हुए ॥३८॥ उन्होंने कहा- श्रेष्ठ ब्राह्मणों ! में पुष्कर में स्नान करने के लिए जा रहा हूँ, ब्राह्मणों ने कहा शीघ्र जाओ, यह सुनकर परमेश्वर शङ्करजी चले गये ॥३९॥ वे कौतुकवशात् देवताओं को मोहित करके आकाश में स्थित हो गये ।
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