Srishti Khanda Extracted Page 227

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-227

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Sanskrit Original

इह चास्माभिरानीता पन्त्यर्थ विनियोजिता । ब्रह्मणा लंबिता बाला प्रलापं मा कृथास्त्विह ॥९९॥ पुण्या चैषा सुभाग्या च सर्वेषां कुलनंदिनी। पुण्याचेन्न भवत्येषा कथमागच्छते सदः॥१२॥ एवं ज्ञात्वा महाभाग न त्वं शोचितुमर्हसि । कन्यैषा ते महाभागा प्राप्ता देवं विरिंचनम् ॥१३॥ योगिनो योगयुक्ता ये ब्राह्मणा वेदपारगाः। नलभ॑ते प्रार्थयन्तस्तां गतिं दुहिता गता॥१४॥ धर्मवंतं सदाचारं भवंतं धर्मवत्सलम् । मया ज्ञात्वा ततः कन्या दत्ता चैषा विरंचये॥१५॥ अनया तारितो गच्छ दिव्यान् लोकान्महोदयान् । युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये ॥१६॥ अवतारं करिष्येऽहं सा क्रीडा तु भविष्यति। यदा नंदप्रभृतयो ह्वावतारं धरातले ॥१७॥ करिष्यंति तदाचाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः । युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यंति मया सह॥१८॥ तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः । करिष्यंति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः ॥१९॥ नचास्या भविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्। श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा ॥२०॥ एवमेष वरो देव योदत्तो भवताहिमे । अवतारः कुलेऽस्माकं कर्तव्यो धर्मसाधनः ॥२९॥ भवतो दर्शनादेव भवामः स्वर्गवासिनः । शुभदा कन्यका चैषा तारिणी मे कुलैः सह ॥२२॥ एवं भवतु देवेश वरदानं विभो तव। अनुनीतास्तदा गोपाः वयं देवेन विष्णुना॥२३॥ ब्रह्मणाप्येवमेवं तु वामहस्तेन भाषितम् । त्रपान्विता दर्शने तु बंधूनां वरवर्णिनी ॥२४॥ कैरहं तु समाख्याता येनेमं देशमागताः। दृष्ट्वा तु तास्ततः प्राह गायत्री गोपकन्यका ॥२५॥ bio RP NaN DE NUON ENE पत्नी के लिए किया है । ब्रह्माजी ने इसे अपनी पत्नी बना लिया है यहाँ शोर-गुल मत मचाओ ॥११॥ यह अत्यन्त पुण्य शालिनी, सौभाग्यवती तथा तुम्हारे कुल को आनन्दित करने वाली है । यदि यह पवित्र नहीं होती तो इस सभा में कैसे आ सकती थी ?॥१२॥ अतएव हे महाभाग ! इस बात को जानकर आपलोगों को शोक नहीं करना चाहिए। यह कन्या महाभाग्यवती है, इसने ब्रह्माजी को पति के रूप में प्राप्त किया है ॥१३॥ तुम्हारी कन्या ने जिस गति को प्राप्त किया है, उसको योग करने वाले योगी और वेद पारङ्गत ब्राह्मण भी नहीं प्राप्त कर पाते हैं ॥१४॥ धार्मिक, सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर मैने ब्रह्माजी को इस कन्या को प्रदान किया है ॥१५॥ इसने तो तुमलोगों के स्वर्गलोक में विद्यमान पित्तरों को भी तार दिया है, इसके द्वारा देवताओं के कार्य की सिद्धि हो गयी ॥१६॥ जब परथिवी पर नन्द इत्यादि का अवतार होगा उस समय में भी अवतार लूँगा, उसी समय देवकार्य की सिद्धि रूपी क्रीडा होगी ॥१७॥ मैं भी उस समय तुम सबों के बीच में रहकर आपलोगों की कन्याओं के साथ क्रीडा करूंगा । और वे सब भी मेरे साथ क्रोडा करेंगी ॥१८॥ उस समय न तो कोई दोष होगा, न किसी से किसी का द्वेष होगा और न कोई किसी से क्रोध करेगा । उस समय गोप मनुष्य भी किसी प्रकर का भय नहीं करेंगे ॥१९॥ इस कार्य से इसको भी कोई पाप नहीं लगेगा । भगवान् विष्णु की बातों को सुनकर सबों ने उनको प्रणाम किया और सब चले गये।।२०॥ उन सबों ने भगवान् विष्णु से कहा हे देव ! आपने जो वरदान दिया है, वह हमलोगों को प्राप्त होए । आपको हमलोगों के वंश में धर्म के साधन भूत अवतार लेना चाहिए ॥२१॥ आपका दर्शन करके ही हमलोग स्वर्ग के निवासी बन गये । मङ्गलमयी यह कन्या भी हमलोगों के वंश को तारने वाली बन गयी ॥२२॥ हे देवेश ! हे विभो !! आपका ऐसा वरदान हो । उसके बाद स्वयं भगवान् विष्णु के द्वारा अनुनय किये जाने पर ॥२३॥ तथा ब्रह्माजी ने भी अपने बायें हाथ से सूचित करके कहा ऐसा ही होगा । लज्जित होने के कारण वह सुन्दरी अपने बाँधवों को नहीं देख पा रही थी ॥२४॥ वह सोचती थी कि किसने इन लोगों को मेरे विषय में बतला दिया कि ये

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