Srishti Khanda Extracted Page 226
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-226
Sanskrit Original
सत्रहवां अध्याय भीष्म उवाच तस्मिन्यज्ञे किमाश्वर्य तदासीदि्द्वजसत्तम । कथं रुद्रः स्थितस्तत्र विष्णुश्चापि सुरोत्तमः ॥१॥ गायत्र्या किं कृतं तत्र पत्नीत्वे स्थितया तया। आभीरैः किं सुवृत्तज्ञै ज्ञात्वा तैश्च कृतं मुने ॥२॥ एतहुत्तं समाचक्ष्व यथावृत्तं यथाकृतम् । आभीरै ब्रह्मणा चापि ममैतत्कौतुकं महत् ॥३॥ पुलस्त्य उवाच तस्मिन् यज्ञे यदाश्चर्यं॒॑वृत्तमासीन्नराधिप। कथयिष्यामि तत्सर्व श्ृणष्वैकमना नृप ॥४॥ रुद्रस्तु महदाश्चर्यं कृतवान्वै सदो गतः। निंद्यरूपधरो देवस्तत्रायादिद्दजसन्निधौ ॥५॥। विष्णुना न कृतं किंचित् प्राधान्ये स यतः स्थितः । नाशं तु गोपकन्याया ज्ञात्वा गोपकुमारकाः ॥६॥ गोप्यश्च तास्तथा सर्वा आगता ब्रह्मणोतिकम् । दृष्ट्वा तां मेखलाबद्धां यज्ञसीमव्यस्थिताम्॥७॥ हा पुत्रीति तदा माता पिता हा पुत्रिकेति च । स्वसेति बांधवाः सर्वे सख्यः सख्येन हा सखि ॥८॥ केन त्वमिह चानीता अलक्तां का तु सुंदरी। शाटी निवृत्तं कृत्वा तु केन युक्ता च कं बली ॥९॥ केन चेयं जटा पुत्रि रक्तसूत्रावकल्पिता। एवं विधानि वाक्यानि श्रुत्वोवाच स्वयं हरिः ॥१०॥ ब्रह्माजी के यज्ञ में शिवजी का भिक्षार्थ आगमन, सदस्यों द्वारा शिवजी का उपहास और शिवजी द्वारा कपाल का प्रदर्शन, ब्रह्मा रुद्र संवाद, शिवजी द्वारा ब्राह्मणों को शाप, गोपकन्या के साथ यज्ञ करने वाले ब्रह्माजी की सावित्री द्वारा भर्त्सना, ब्रह्माजी का सावित्री से क्षमा माँगना, ब्रह्मा आदि देवताओं को सावित्री का शाप, सावित्री का पर्वत पर चला जाना, विष्णु कृत सावित्री स्तोत्र, सावित्री द्वारा विष्णु को वरदान, गायत्री द्वारा ब्रह्मव्रत का वर्णन, सावित्री प्रदत्त शाप का अच्छादन, गायत्री द्वारा सभी देवियों एवं देवताओं को वरदान, रुद्र कृत गायत्री स्तोत्र, गायत्री द्वारा रुद्र को वर प्रदान भीष्मजी ने कहा-- हे द्विजश्रेष्ठ ! उस यज्ञ में कौन सा आश्चर्य हुआ ? वहाँ पर रुद्र तथा विष्णु कैसे बनेरहे ?॥१॥ वहाँ पर पत्नी रूप से स्थित रहकर गायत्री देवी ने क्या किया ? सुन्दर वृत्तान्त को जानकर अभीरों (अहीरों) ने क्या किया ?॥२॥ आप मुझे इसी वृत्तान्त को बतलाइये तथा वहाँ पर जो कोई घटना हुयी उसे बतलाइये। मुझे यह भी जानने का कोतुहल है कि आभीरों तथा ब्रह्माजी ने उसके बाद क्या किया 2॥३॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! उस यज्ञ में जो कुछ भी आश्चर्यमय घटना हुयी उसे में पूर्णरूप से कहता हूँ आप सावधानी पूर्वक सुनें ॥४।। उस सभा में जाकर रुद्र ने अत्यन्त आश्चर्यमय कार्य किया, वे अत्यन्त निन्दित रूप धारण करके ब्राह्मणों के सन्निकट आये ॥५॥ इस पर विष्णु ने वहाँ कुछ भी नहीं किया क्योंकि वहाँ वे ही प्रधान थे। गोपकुमारों ने जब यह जाना कि गोपकन्या का अपहरण हो गया और गोपियाँ भी इस बात को जानीं तो वे सबके सब ब्रह्माजी के पास आये, वहाँ उन सबों ने देखा कि वह गोपकन्या कमर में मेखला बाँधकर यज्ञ की सीमा में बैठी है॥७॥ उसके माता-पिता हाय पुत्रि ! हाय पुत्रि ! कहकर चिल्लाने लगे, उसके बांधव स्वसा कहकर, तथा सखियाँ सखी कहकर चिल्ला रही थीं ॥८॥ अलाक्तक से रहित तुम सुन्दरी को यहाँ पर किसने लाया है तुमको साड़ी सेरहित करके किसने यह कंबल पहना दिया है ?॥९॥ हे पुत्रि ! किसने तुम्हारी जटा बनाकर लाल सूत्र से बाँध दिया है? इस तरह की बातों को सुनकर श्रीहरि ने स्वयं कहा ॥१०॥ यहाँ इसको हमलोगों ने लाया है, और इसका उपयोग t
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know