Srishti Khanda Extracted Page 223
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-223
Sanskrit Original
श्रोपद्ममहापुराण तरैलोक्यांतर्गतं यद्यदवसतुतत्तत्प्रधानतः । समादाय विधात्रास्याः कृतारूपस्य संस्थितिः ॥९५१॥ इंद्र उवाच कासि कस्य कुतश्च त्वमागता सुभ्रु कथ्यताम् । एकाकिनी किमर्थं च वीथीमध्येषु तिष्ठसि ॥९५.२॥ यान्येताऱ्यंगसंस्थानि भूषणानि विभर्षि च । नैतानि तवभूषायै त्वमेतेषां हि भूषणम् ॥१५३॥ न देवी न च गंधी नासुरी नच पन्नगी । किन्नरी दृष्टपूर्वा वा यादूशी त्वं सुलोचने ॥९५४॥ उक्ता मयापि बहुशः कस्माहत्से हि नोत्तरम्। त्रपान्विता तु सा कन्या शक्रं प्रोवाच वेपती ॥१५५॥ गोप कन्या त्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम् । नबनीतमिदं शुद्धं दधि चेदं विमंडकम् ॥१५६॥ दध्ना चैवात्र तक्रेण रसेनापि परंतप । अर्थी येनासि तद् ब्रूहि प्रगृह्णीष्व यथेप्सितम् ॥१५७ ॥ एवमुक्तस्तदा शक्रो गृहीत्वा तां करे दृढम् । अनयत्तां विशालक्षी यत्र ब्रह्माव्यवस्थित: ॥१५८॥ नीयमाना तु सा तेन क्रोशंती पितृमातरौ । हा तातमातर्हाभ्रातर्नयत्येष नरो बलात् ॥१५९॥ यदि वास्ति मया कार्य पितरं मे प्रेय्याचय । स दास्यति हि मां नूनं भवतः सत्यमुच्यते ॥१६०॥ काहि नाभिलषेत्कन्या भर्तारं भक्तिवत्सलम् । नादेयमपि ते किंचित्पितुर्मे धर्मवत्सल॥१६९॥ प्रसादये तं शिरसा मां स तुष्टः प्रदास्यति । पितुश्चित्तमविज्ञाय यद्यात्मानं ददामि ते ॥१६२॥ धर्मो हि विपुलो नश्येत्तेन त्वां न प्रसादये। भविष्यामि वशेतुभ्यं यदि तातः प्रदास्यति ॥१६३॥ इत्थमाभाष्यमाणस्तु तदा शक्रोनयच्च ताम्। ब्रह्मणः पुरतः स्थाप्य प्राहास्यार्थे मयाबले ॥१६४॥ हो गया ॥१४९॥ उन्होंने सोचा मैंने देवताओं, यक्षों, गन्धर्वो, सर्पो तथा राक्षसों की अनेक नारियों को देखा है किन्तु ऐसी रूप सम्पत्ति कहीं भी देखने को नहीं मिली ।।१५०॥ त्रैलोक्य में जितने भी प्रधान वस्तु हैं उन सबों को लेकर ब्रह्मा ने इसके रूप का निर्माण किया है ॥१५१॥ इन्द्र ने कहा-- हे सुभ्रु ! बतलाओं कि तुम कौन हो, तुम किसकी पुत्री-हो ? तुम कहाँ से आयी हो ? तुम अकेले इन गलियों में क्यों खड़ी हो 2॥१५२॥ तुम अपने इन अङ्गों में जो भूषणों को धारण की हो, वे तुम्हारे शरीर को नहीं भूषित करते हैं, तुम्हारा शरीर ही इन सबों को भूषित करता है ॥१५३॥ हे सुन्दर नेत्रों वाली ! तुम्हारा जैसा रूप है वैसा रूप न तो किसी देवी, न गन्धर्वी, न आसुरी, न पन्नगी (सर्पिणी) और न तो किसी किन्नरी का मैंने देखा है ॥१५४॥ मैने तो बहुत कहा तुम उत्तर क्यों नहीं देती हो ? लज्जित होकर उस कन्या ने इन्द्र से कापती हुयी कहा ॥१५५॥ हे वीर ! मैं गोपकन्या हुँ, में गोरस बेंचती हूँ । यह शुद्ध नवनीत है तथा यह मट्ठा से रहित दधि है ॥१५६॥ हे ae ! आपर दही, तक्र, गोरस, में से जो चाहे वह ले लें ॥१५७॥ उसके ऐसा कहने पर इन्द्र ने उसके हाथ को पकड़ लिया और उसको वहाँ लाया जहाँ पर ब्रह्माजी थे ॥१५८॥ इन्द्र के द्वारा ले जाती हुयी वह अपने माता-पिता को चिल्ला रही थी; अरे माँ, अरे पितः, अरे भाई, यह मनुष्य मुझे बलपूर्वक ले जा रहा है ॥१५९॥ वह कह रही थी यदि आपको मेरी आवश्यकता है; तो आप मेरे माता-पिता से माँग ले । मैं सत्य कह रही हूँ, वे मुझे आपको दे देंगे ॥१६०॥ ऐसी कौन कन्या होगी जो प्रेमी पति को न चाहे । हे धार्मिक ! मेरे पिता को आपके लिए अदेय कुछ भी नहीं हैं ॥१६१॥ मैं उनको शिर से प्रणाम करके प्रसन्न कर लूँगी, वे सन्तुष्ट होकर मुझे आपको दे देंगे, पिता के मन को जाने बिना मैं अपने को आपको यदि समर्पित कर देती हूँ तो ॥१६२॥ फिर महान् धर्म नष्ट होयेगा इसीलिए में आपको प्रसन्न नहीं कर रही हूँ । यदि मेरे पिताजी मुझे आपको दे देंगे तो मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊंगी ॥१६३॥ इसतरह से जब वह कह रही थी उसी समय इन्द्र उसे वहाँ लाये । ब्रह्माजी के सामने उसको स्थापित करके इन्द्र नेकहा-- मैं
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