Srishti Khanda Extracted Page 222

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-222

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Sanskrit Original

सृष्टिखण्ड . १९७ त्विषं संबिभ्रतीमंगैः केशगडेक्षणाधरैः । मन्मथाशोकवृक्षस्य प्रोद्धिन्नां कलिकामिव ॥१३८॥ प्रदग्धहच्छयेनैव नेत्रवह्विशिखोत्करैः । धात्रा कथं हि सा सृष्टा प्रतिरूपमपश्यता ॥१३९॥ कल्पिता चेत्स्वयं बुध्या नैपुण्यस्य गतिः परा । उत्तुगाग्राविमौ सृष्टौ यन्मे संपश्यतः सुखम् ॥१४०॥ पयोधरौ नातिचित्रं कस्य संजायते हदि। रागोपहतदेहोयमधरो यद्यपिस्फुटम्॥ १४ १॥ तथापि सेवमानस्य निर्वाणं संप्रयच्छति । वहद्धिरपि कौटिल्यमलकैः सुखमर्प्यते ॥९४२॥ दोषोपि गुणवद्धाति भूरिसौदर्यमाश्रितः । नेत्रयोर्भूषितावंतावाकर्णाभ्याशमागतौ ॥१४३॥ कारणाद्धावचैतन्यं प्रवदंति हि तद्विदः। कर्णयोर्भूषणे नेत्रे नेत्रयोः श्रवणाविमौ ॥१४४॥ कुंडलांजनयोरत्र नावकाशोस्ति कश्चन। न॒ तद्युक्तं कटाक्षाणं यद्विधाकरणं हृदि ॥१४५॥ तव संबंधिनो येऽत्र कथं तेदुःखभागिनः । सर्वसुंदरतामेति विकारः प्राकृतैर्गुणैः ॥१४६॥ वृद्धेक्षणशतानां तु दृष्टमेषा मया धनम् । धात्रा कौशल्यसीमेयं रूपोत्पत्तौ सुदर्शिता ॥१४७॥ करोत्येषा मनो नृणां सस्रेहं कृतिविभ्रमैः । एवं विमृशतस्तस्य तद्रूपापहतत्विषः ॥९४८॥ निरंतरोद्नतैश्छन्नमभवत्पुलकै ् वपुः। तां वीक्ष्य नवहेमाभ्रां पद्मपत्रायतेक्षणाम्॥१४९॥ देवानामथ यक्षाणं गंधर्वोरगरक्षसाम्। नाना दृष्टा मया नार्यो नेदृशी रूपसंपदा॥१५०॥ सद्धाग्य से सम्पन्न होती जिसको ब्रह्माजी प्रेमपूर्वक अपनाते और मेरा प्रयास भी सफल हो जाता । इन्द्र ने उस कन्या को देखा वह नीलमेघ, स्वणिम कमल तथा विद्रुम की कान्ति से सम्पन्न थी । (अर्थात् उसके केश काले मेघ के समान, शरीर स्वर्णिम कमल के समान तथा ओष्ठ विद्रुम की कान्ति के समान लाल-लाल थे) ॥१३६-१३७।। उसके अङ्ग, केश, कपोल, नेत्र तथा ओष्ठ कान्ति सम्पन्न थे । वह देखने में काम रूपी अशोक वृक्ष की विकसित कली के समान मनोहर थी ॥१३८॥ वासना रहित होने के कारण नेत्र अग्नि शिखा के अङ्कुर के समान थे इसकेसमान किसी दूसरी नारी को देखे बिना न जाने कैसे ब्रह्माजी ने इसकी सृष्टि कर दी ॥१३९॥ यदि उन्होंने इसकी कल्पना अपनी बुद्धि से की हो तब तो यह उनकी निपुणता की पराकाष्ठा होगी । जिनके आगे के भाग ऊपर की ओर उठे हुए ऐसे इसके ये दोनों स्तन हैं, जिनको मैं सुख पूर्वक देख रहा हूँ ॥१४०॥ इन दोनों को देखकर किसके हृदय में आश्चर्य नहीं भर जायेगा । इसका शरीर राग (लालिमा) से युक्त है और इसके ओष्ठ खुले हुए है ॥१४१॥ फिर भी उसका सेवन करने वाले को मुक्ति का सुख मिलेगा । इसके कुटिल होने पर भी केश सुखप्रद हैं । अर्थात् इसके बाल घुंघराले हैं ॥१४२। अधिक सौन्दर्य सम्पन्न होने के कारण दोष भी गुणों के समान प्रतीत होता है । इसके अलङ्कृत बड़े-बड़े नेत्र कानों के सन्निकट तक फैले हुए हैं ॥१४३॥ कारण के द्वारा भाव एवं चैतन्य होते हें यह ज्ञाता पुरुष बतलाते हैं । इसके कानों को दोनों नेत्र अलङ्कृत करते हैं और दोनों नेत्रों को दोनों कान अलङ्कृत करते हें ॥१४४।॥ अतएव यहाँ पर न तो कुण्डल के लिए कोई अवकाश है और न तो अञ्जन का । कटाक्षो का यह कोई अच्छा काम नहीं है कि वे हृदय को फाड़ने का काम करते हैं ॥१४५॥ हे देवि ! तुम्हारे जो सम्बन्धी होंगे वेता सुखी ही होंगे । प्रकृति के गुणों से उत्पन्न होने वाले विकार सभी प्रकार की सुन्दरता में परिणत हो जाते हैं। १४६॥ मैंने सैकड़ों विस्तृत नेत्रों रूपी सम्पत्ति को देखा है, ब्रह्मा ने यह तो अपनी कुशलता की पराकाष्ठा का प्रदर्शन किया है ॥१४७॥ यह अपने हावभावों के द्वारा मनुष्यों के मन में स्नेह उत्पन्न कर देती है । इस तरह से विचार करने वाले तथा उसके रूप को देखकर जिनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी उन इन्द्र के ॥१४८॥ सम्पूर्ण शरीर उस सुवर्ण के समान कान्ति से सम्पन्न तथा कमलदल के समान सुन्दर नेत्रों वाली कन्या को देखकर रोमाञ्चित

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