Srishti Khanda Extracted Page 221
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-221
Sanskrit Original
नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्नायांति ताः स्त्रियः । ब्रूहि गत्वा विरंचिं तु तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्॥१२३॥ सर्वाभिः सहिता चाहमागच्छामि त्वरान्विता । सर्वैः परिवृतः शोभां देवैः सह महाद्युते ॥१२४॥ भवान्प्राप्रोति परमां तथाहं तु न संशयः । वदमानां तथाध्वर्युस्त्यक्त्वा ब्रह्माणमागतः ॥९२५॥ सावित्री व्याकुला देव प्रसक्ता गृहकर्मणि। सख्यो नाभ्यागतायावत्तावन्नागमनं मम॥१२६॥ एवमुक्तोस्मि वै देव कालश्चाप्यतिवर्त्तते । यत्तेद्यरुचितं तावत्तत्कुरुष्व पितामह ॥१२७॥ एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा किंचित्कोपसमन्वितः । पत्नीं चान्यां मदर्थे वै शीघ्रं शक्र इहानय ॥१२८॥ यथा प्रवर्तते यज्ञः कालहीनो न जायते । तथा शीघ्रं विधत्स्व त्वं नारीं कांचिदुपानय ॥१२९॥ यावद्यज्ञसमाप्तिर्मे वर्णे त्वां मा कृथा मनः। भूयोपि तां प्रमोक्ष्यामि समाप्तौ तु क्रतोरिह ॥१३०॥ एवमुक्तस्तदा शक्रो गत्वा सर्व धरातलम् । स्त्रियो दृष्टाश्च यास्तेन सर्वाः परपरिग्रहाः॥१३१॥ आभीरकऱ्यारूपाढ्या सुनासा चारुलोचना । न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी॥१३२॥ नचास्ति तादूशी कन्या यादूशी सा वरांगना। ददर्श तां सुचार्वगीं श्रियं देवीमिवापराम् ॥१३३॥ संक्षिपन्ती मनोवृत्तिविभवं रूपसंपदा । यद्यद्वस्तुसौदर्याद्विशिष्टं लभ्यते क्वचित् ॥९३४॥ तत्तच्छरीरसंलम्नरंतन्वंग्या ददृशे वरम् । तां दृष्ट्वा चिंतयामास यद्येषा कन्यका भवेत्॥१३५॥ तन्मत्तः कृतपुण्योन्यो न देवो भुवि विद्यते । योषिद्रत्नमिदं सेयं सद्भाग्या यां पितामहः ॥१३६॥ सरागो यदि वास्यात्तु सफलस्त्वेष मे श्रमः। नीलाभ्रकनकांभोजविद्रुमाभां ददर्श ताम्॥१३७॥ खियाँ वे सव, उनकी बहुएँ तथा बेटियाँ, मेरी सखियाँ तथा मेरी बहनें भी नहीं आयी हैं । इसलिए मैं रुकी हूँ, उनकी प्रतीक्षा कर रही हूँ ॥१२१-१२२॥ जब तक ये सब नहीं आ जा रही हैं, तब तक मैं अकेले नहीं जा सकती । अतएव जाकर ब्रह्माजी से कहिए कि वे थोड़ी देर रुक जायँ ॥१२३॥ में इन सबों के साथ शीघ्र ही आ रही हूँ । हे महामत्ते ! जिस तरह आप सभी देतवाओं के साथ सुशोभित होते हैं ॥१२४।॥ उसी तरह मैं भी इनसबों के साथ सुशोभित होती हूँ । इसतरह से कहने वाली सावित्री देवी को छोड़कर अध्वर्यु ब्रह्माजी के पास आ गये ॥१२५॥ उन्होंने ब्रह्माजी से कहा-- हे देव ! सावित्रीजी गृह के कार्या में व्यस्त हैं । उन्होंने कहा है कि जब तक मेरी सखियाँ नहीं आ जाती हैं, तब तक मैं नहीं आ सकती हुँ ॥१२६॥ हे देव ! उन्होंने ऐसा ही कहा है और समय भी बीतता जा रहा है, अतएव इस समय आपको जो उचित मालुम पड़े वही कीजिए ॥१२७॥ इस तरह से कहने पर ब्रह्माजी कुछ क्रुद्ध हो गये । उन्होंने कहा इन्द्र ! तुम शीघ्र मेरे लिए दूसरी पत्नी लाओ ॥१२८॥ जिससे कि यज्ञ प्रारम्भ हो जाय समय बीत न जाये । अतएव ऐसा शीघ्र करो, किसी स्री को लाओ ॥१२९॥ उससे कहो कि जब तक मेरा यज्ञ पूरा न हो जाय तब तक के लिए मैंने तुम्हारा वरण किया है । मन में कोई दूसरी बात न सोचो । यज्ञ समाप्त हो जाने पर में उसको छोड़ दूँगा ॥१३०।। इस तरह कहने पर सम्पूर्ण घरातल पर जाकर इन्द्र ने जिन खियों को देखा वे सब दूसरों की पत्नी थीं ॥१३१॥ उन्होंने एक अभीर (अहीर) की कन्या को देखा । वह देखने में सुन्दर थी, उसके नेत्र तथा नाक मनोहर थे । कोई भी देवी गन्धर्वी, आसुरी, सर्पिणी ॥१३२॥ उतना सुन्दर कन्या नहीं थी वह इतनी सुन्दरी थी । इन्द्र ने उस सुन्दरी को देखा वह लक्ष्मी के समान सुन्दर थी ॥१३३॥ वह देखने मात्र से अपने रूप के द्वारा मन को आकृष्ट कर लेती थी; संसार में जो कोई भी वस्तु सौन्दर्य से विशिष्ट पायी जाती है ॥१३४॥ उन्होंने देखा कि उस सुन्दरी के शरीर में उन सबों का समावेश था । उसको देखकर उन्होंने सोचा भाग्यवशात् यदि यह कन्या होती ॥१३५॥ तब तो मेरे समान संसार में कोई भी दूसरा पुण्यवान् नहीं होता । यह वही स्त्रीरत्न होती तथा
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