Srishti Khanda Extracted Page 220

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-220

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Sanskrit Original

द्विजानां पादश्रुशूषा शूद्रैः कार्या सदात्विह । पादप्रक्षालनं भोज्यमुच्छिष्टस्य प्रर्माजनम्॥१०८॥ तेपि चक्कुस्तदा तत्र तेभ्यो भूयः पितामहः । शुश्रूषार्थं मया यूयं तुरीये तु पदे कृताः ॥१०९॥ द्विजानां क्षत्रबन्धूनां बन्धूनां च भवद्दिधैः । त्रिभ्यश्शुश्रूषणा कार्येत्युक्त्वा ब्रह्मा तथाऽकरोत्॥१ ९ ०॥ द्वाराध्यक्ष तथा शक्रं वरुणं रसदायकम् । वित्तप्रदं वैश्रवणं पवनं गंधदायिनम् ॥९१९॥ उद्योतकारिणं सूर्य प्रभुत्वे माधवः स्थित: । सोमः सोमप्रदस्तेषां वामपक्षपथाश्रित: ॥१ १ २॥ सुसत्कृता च पत्नी सा सावित्री च वरांगना । अध्वर्युणा समाहूता एहि देवि त्वरान्विता ॥११३॥ उत्थिताश्चाम्रयः सर्वे दीक्षाकाल उपागतः । व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता ॥१९४॥ इह वै न कृतं किंचिद्द्वारे वै मंडनं मया। भित्त्यां वैचित्रकर्माणि स्वस्तिकं प्रौगणे न तु॥९९५॥ प्रक्षालनं च भांडनां न कृतं किमपि त्विह। लक्ष्मीरद्यापि नायाता पत्नीनारायणस्य या॥११६॥ अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णा तु यमस्य तु वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वै सुप्रभा तथा ॥१९७॥ ऋद्धिवैंश्रवणो भार्या शम्भोर्गौरी जगत्प्रिया । मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया धृतिः क्षमा ॥११९॥ गंगा सरस्वती चैव नाद्यायाताश्च कन्यकाः । इंद्राणी चंद्रपत्नी तु रोहिणी शशिनः प्रिया ॥१२०॥ अरुंधती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणां च या स्त्रियः । अनसूयात्रिपत्मी च तथान्याः प्रमदा इह ॥१२९॥ बध्वो दुहितरश्चैव सख्यो भगिनिकास्तथा । नाद्यागतास्तु ताः सर्वा अहं तावत्स्थिता चिरम्॥१ २२॥ क्षत्रिय आयुध लेकर स्थित हो गये ॥१०५॥ वैश्यों ने वहाँ पर अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थो को उपस्थित किया । उसके बाद सम्पूर्ण भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ रस से परिपूर्ण हो गये ॥१०६॥ इस प्रकार का यज्ञ पहले न तो सुना गया था और न देखा गया था, उससे ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न हुए । उन्होंने वैश्यों को प्राग्वाट नाम प्रदान किया ।१०७॥ ब्रह्माजी ने कहा कि शूद्रों को सदा ब्राह्मणों के चरणों की सेवा करनी चाहिए । उन्हें ब्राह्मणों का पैर धोना चाहिए तथा ब्राह्मणों के उच्छिष्ट पात्रों को साफ करना चाहिए ॥१०८॥ शूद्रं ने भी ब्रह्माजी के कथनानुसार कार्य किया । उसके बाद में उनसे ब्रह्माजी ने कहा सेवा करने के ही लिए मैंने आपलोगों की नियुक्ति चतुर्थ पद पर की है ॥१०९॥ ब्राह्मणों, क्षत्रियो तथा वैश्यों इन तीनों की आपलोगो को सेवा करनी चाहिए इसतरह से कहकर ब्रह्माजी ने ॥११०॥ इन्द्र को द्वाराध्यक्ष, वरुण को रस प्रदाता तथा कुबेर को धन प्रदाता एवं वायुदेव को गन्ध प्रदाता बनाया ॥१११॥ उन्होंने प्रकाशकर्ता सूर्य को तथा स्वामित्व के पद पर भगवान् माधव को नियुक्त किया । वाम पक्ष पथाश्रित सोम को उन्होने सोम प्रदाता बनाया ॥११२॥। नारियों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी की पत्नी का सत्कार करके अध्वर्यु ने सावित्री को बुलाते हुए कहा हे देवि ! शीघ्र आओ ॥११३॥ सभी अग्नियाँ प्रदीप्त हो गयी हैं दीक्षा का समय आ गया है । किन्तु कार्यन्तरों में व्यस्त रहने के कारण सावित्री देवी स्त्री के स्वभाव के अनुसार शीघ्र नहीं आयीं ॥११४॥ उन्होंने कहा अभी मैंने दरवाजों को बिल्कुल नहीं अलंकृत किया है न तो मैंने दिवालों पर चित्र बनाया है और न तो आंगन में स्वस्तिक चिह्न बनाया है ॥११५॥। अभी मैंने पात्रों को भी नहीं धोया है, अभी नारायण की पत्नी लक्ष्मीजी भी नहीं आयी हैं ॥११६॥ न तो अग्नि की पत्नी स्वाहा आयी हैं और न यम की पत्नी धूम्रोर्णा आयी हैं । वरुण की पत्नी गौरी तथा वायु की पत्नी सुप्रभा भी नहीं आयी हैं ॥१९७॥ कुबेर की पत्नी ऋद्धि तथा शङ्करजी की जगत्त्रयपत्नी गौरी भी नहीं आयी हैं ॥११८॥। मेघा, श्रद्धा, विभूति, अनसूया, धृति, क्षमा ॥११९॥ गङ्गा, सरस्वती (नदी) ये सभी कन्यकाएँ नहीं आ पायी,हैं, इन्द्र की पत्नी, चन्द्रमा की पत्नी रोहिणी जो चन्द्रमा की प्रियतमा हैं ॥ १२०॥ महर्षि वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती तथा सप्तर्षियों की जो पत्नियाँ हैं, अत्रि महर्षि की पत्नी अनसूया तथा दूसरी भी

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