Srishti Khanda Extracted Page 219

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-219

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Sanskrit Original

लवषेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलैः समम् । सप्तलोकाः सपातालाः सप्तद्वीपाः सपत्तनाः ॥९२॥ वृक्षा वल्ल्यः सतृणानि शाकानि च फलानि च। पृथिवी वायुराकाशमापोज्योतिश्च पञ्चमम् ॥९३॥ सविग्रहाणि भूतानि धर्मशास्त्राणि यानि च । वेदभाष्याणि सूत्राणि ब्रह्मणा निर्मितं च यत् ॥९४॥ अमूर्त मूर्तमत्यन्तं मूर्तदृश्यं तथाखिलम् । एवं कृते तथास्मिस्तु यज्ञे पैतामहे तदा ॥९५॥ देवानां संनिधौ * तत्र ऋषिभिश्चसमागमे । ब्रह्मणो दक्षिणे पार्श्वे स्थितो विष्णुः सनातनः॥९६॥ वामपार्श्चे स्थितो रुद्रः पिनाकी वरदः प्रभुः । । ऋत्विजां चापि वरणं कृतं तत्र महात्मना ॥९७॥ भृगुर्होता वृतस्तत्र पुलस्त्योऽध्वर्य्युसत्तमः । तत्रोद्वाता मरीचिस्तु ब्रह्मा वै नारदः कृतः ॥९८॥ सनत्कुमारादयो ये सदस्यास्तत्र ते भवन्। प्रजापतयो दक्षाद्या वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः ॥९९॥ ब्रह्मणश्च समीपे तु कृतात्रऋत्विग्विकल्पना । वस््ैराभरणैर्युक्ताः कृता वैश्रवणेन ते ॥१००॥ अंगुलीयैः सकटकै रमकुटैर्भूषिता द्विजाः। चत्वारो द्वौ दशान्येच षोडशत्विजः ॥१०१॥ ब्राह्मणाः पूजिताः सर्वे प्रणिपातपुरः सरम् । अनुग्राह्मो भवद्धिस्तु सर्वैरस्मिन्क्रताविह ॥१०२॥ पत्नीममैषा सावित्री यूयं मे शरणं द्विजाः । विश्वकर्माणमाहूय ब्रह्मणः शीर्षमुडनम् ॥१०३॥ यज्ञे तु विहितं तस्य कारितं द्विजसत्तमैः । आतसेयानि वस्त्राणि दंपत्यर्थे तथा द्विजैः ॥१०४॥ ब्रह्मघोषेण ते विप्रानादयन्तस्त्रिविष्टपम् । पालयंतो जगच्चेदं क्षत्रियाः सायुधाः स्थिताः॥१०५॥ भक्ष्यप्रकारान्विविधान्वैश्यास्तत्र प्रचक्रिरे। रसबाहुल्ययुक्तं च भक्ष्यं भोज्यं कृतं ततः ॥१०६॥ अश्रुतं प्रागदृष्टं च दृष्टवा तुष्टः प्रजापतिः । प्राग्वाटेति ददौ नाम वैश्यानां सृष्टिकृद्विभुः ॥१०७॥ मुख्य झरने, अनेक देवताओं के खात, सभी जलाशय, सातो समुद्र ॥९१॥ लवणसमुद्र, इक्षुसमुद्र, सुरा समुद्र, धृतसमुद्र, दधिसमुद्र, दुग्धसमुद्र तथा जलसमुद्र ये सभी, सातो लोक, (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महलेंक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक) सातो पाताल (तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल और पाताल) अपने नगरों के साथ सातो द्वीप ॥९२॥ वृक्ष, लताएँ, तृण, शाक, फल, पृथिवी, वायु, आकाश, जल तथा तेज॥९ ३॥ शरीर धारण करके वहाँ आये यज्ञ तथा समस्त धर्मशास्त्र वेदों के भाष्य, सूत्र तथा ब्राह्मणग्रन्य ॥९४॥ अमूर्त, तथा मूर्तिमान तथा दृश्य सबके सब पदार्थ, ब्रह्माजी के उस यज्ञ में आये ॥९५॥ देवताओं के सन्निकट में ऋषियों के आ जाने पर ब्रह्माजी के दाहिने भाग में सनातन भगवान् विष्णु स्थित हो गये ॥९६॥ ब्रह्माजी के बायें भाग में पिनाकधारी तथा वरदमुद्रा से युक्त शङ्करजी स्थित हो गये । उसके बाद ब्रह्माजी ने ऋत्विजों का वरण किया॥९७॥ भूगु महर्षि का वरण होता के रूप में और पुलस्त्य महर्षि का श्रेष्ठ अध्वर्यु के रूप में हुआ । महर्षि मरीचि उद्राता के रूप में तथा नारदजी ब्रह्मा के रूप में वृत्त हुए ॥९८॥ वहाँ पर जो सनत्कुमार इत्यादि महर्षि थे वे उस यज्ञ में सदस्य हुए । दक्ष आदि जो वर्णहीन प्रजापति थे वे ब्राह्मण हुए ॥९९॥ ब्रह्माजी के समीप में ऋत्विजों ने विशेष रूप से कल्पना की, कुबेर ने उन सबों को वस्रों तथा आभूषणों से सजाया ॥१००॥। सभी ब्राह्मण अङ्गूठी, वलय तथा मुकुटों से सुसज्जित थे । इस तरह उस यज्ञ में सोलह ऋत्विक् हुए ॥१०१॥ ब्रह्माजी ने सभी ऋत्विजों को साष्टाङ्ग प्रणाम पुरस्सर पूजा की और कहा इस यज्ञ में आप सब लोग मेरे ऊपर कृपा करेंगे ॥१०२॥ मेरी पत्नी सावित्री हैं आपलोग ही मेरे रक्षक हैं । उसके बाद विश्वकर्मा को बुलाकर ब्रह्माजी का मुण्डन कराया गया ॥१०३॥ इसके बाद ब्राह्मणों ने यज्ञ के लिए विहित सभी कर्मो को ब्रह्माजी से कराया । ब्राह्मणों ने यजमानदम्पती को आतसेय (रेशमी) वस्त्र दिया ॥ १०४॥ वेदघोष पूर्वक विप्रों को देवताओं ने वस्त्र प्रदान किया । इस जगत् की रक्षा करते हुए

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