Srishti Khanda Extracted Page 218
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-218
Sanskrit Original
आसन् शुभानीद्रियाणि नराणामंतरात्मनाम् । महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरवाचयन् ॥७६॥ यज्ञे तस्मिन् हविः पाके शिवा आसंश्च पावकाः । प्रवत्तधर्मसद्वृत्ता लोका मुदितमानसाः ॥७७॥ विष्णोः सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधना गिरः । ततो देवाः समायाता दानवा राक्षसैस्सह ॥७८॥ भूतप्रेतपिशाचाश्च सर्वे तत्रागताः क्रमात् । गंधर्वाप्सरसश्चैव नागा विद्याधरा गणाः ॥७९॥ वानस्पत्या श्चौषधयो यच्चेहेद्यच्चनेहति। ब्रह्मादेशान्मारुतेन आनीताः सर्वतो दिशः ॥८०॥ यज्ञपर्वतमासाद्यदक्षिणामभितो दिशम् । सुरा उत्तरतः सर्वे मर्यादापर्वते स्थिताः ॥८ १॥ गंधर्वाप्सरसश्चैव मुनयो वेदपारगाः । पश्चिमां दिशमास्थाय स्थितास्तत्र महाक्रतौ ॥८ २॥ सर्वे देवनिकायाश्च दानवाश्चासुरा गणाः । अमर्ष पृष्ठतः कृत्वा सुप्रीतास्ते परस्परम् ॥८ ३॥ ऋषीन्पर्यचरन्सर्वे शूश्रूषन्त्राह्मणांस्तथा । ऋषयो बह्यर्षयश्च द्विजा देवर्षयस्तथा ॥८ ४॥ राजर्षयो मुख्यतमास्समायाताः समंततः । कतमश्च सुरोप्यत्र क्रतौ याज्यो भविष्यति ॥८५॥ पशवः पक्षिणश्चैव तत्रायातादिदृक्षवः । ब्राह्मणा भोक्तुकामाश्च सर्वेवर्णानुपूर्वशः ॥८ ६॥ स्वयं च वरुणोरत्नं दक्षश्चान्नं स्वयं ददौ । आगत्यवरुणो लोकात्पक्वं चान्न॑स्वतोऽपचत् ॥८७॥ वायुर्भक्षविकारांश्च रसपाचीदिवाकरः । अन्नपाचनकृत्सोमो मतिदाताबृहस्पतिः ॥८ ८॥ धनदानं धनाध्यक्षो वस्त्राणि विविधानि च । सरस्वती नदाध्यक्षो गंगादेवी सनर्मदा॥८ ९॥ याश्चान्याः सरितः पुण्याः कूपाश्चैव जलशया: । पल्वलानि तटाकानि कुंडानि विविधानि च ॥९०॥ प्रस्रवाणि च मुख्यानि देवखातान्यनेकशः। जलाशयानि सर्वाणि समुद्राः सप्त संख्यकाः ॥९९॥ था॥७५॥ अन्तरात्मा से युक्त मनुष्ये की इन्द्रियाँ शुभ हो गयीं । शोक रहित महर्षिण जोर-जोर से वेद मन्त्रों का उच्चारण करने लगे ॥७६॥ उस यज्ञ में हविष्य का पाक बनाने में अग्नियाँ मङ्गलमय हो गयीं । प्रवृत्ति धर्म वाले सभी जीव प्रसन्नमना तथा सद्वृति वाले हो गये ॥७७॥ सत्य प्रतिज्ञा करने वाले भगवान् विष्णु की शत्रु विनाशिनी वाणी सुनकर सभी देवता दानवों एवं राक्षसं के साथ वहाँ आये ॥७८॥ वहाँ पर क्रमश: भूत, प्रेत तथा पिशाच भी आये । गन्धर्व, अप्सरायें, नाग तथा विद्याधरों का समूह भी वहाँ आया ॥७९॥ ब्रह्माजी का आदेश प्राप्त करके वायु देवता सभी दिशाओं से उन सभी वनस्पतियों और औषधियों को लाये जो यहाँ हैं और जो नहीं है, उनको भी।।८०॥ यज्ञ पर्वत को प्राप्त करके सम्पूर्ण दिशा में वे औषधियाँ रखी गयीं । सभी देवता उत्तर पर्वत पर वहाँ स्थित हो गये॥८ १॥ गन्धर्व, अप्सराएँ तथा वेदपारङ्गत मुनिगण उस महाक्रतु में आकर पश्चिम दिशा में बैठ गयें ॥८२॥ देवताओं के सभी समूह दानवगण एवं असुरगण परस्पर के बैर को भूलकर एक-दूसरे से प्रसन्न रहकर ।।८३॥सवके सब ऋषियों तथा ब्राह्मणों की सेवा करने लगे । ऋषिगण, ब्रह्मर्षिगण, ब्राह्मणगण, देवर्षि गण ॥८४॥ अत्यन्त प्रख्यात राजर्षिगण वहाँ उस यज्ञ में सभी स्थानों से आये । इस यज्ञ में किस देवता की आराधना की जायेगी, वे इस वात को जानना चाहते थे ॥८५॥ उस यज्ञ को देखने की इच्छा से वहाँ, पशु-पक्षी भी आये । वर्णानुसार सभी ब्राह्मण वहाँ भोजन करने के लिए आये ॥८६॥ वहाँ पर स्वयम् वरुण रत्न तथा अन्न प्रदान करने का काम करते थे। स्वयं वरुण अपने लोक से आकर वहाँ अन्न पकाते थे ॥८७॥ वायुदेव भक्ष्य पदार्थो में होने वाले विकारों को दूर करते थे और सूर्य उनके रस को पकाते थे । वहाँ अन्न को पचाने का काम सोम करते थे तथा बुद्धि देने का काम वृहस्पति करते थे ॥८८॥ धनाध्यक्ष कुबेर धन तथा अनेक प्रकार के वस्रों को देते थे, सरस्वती नदी के स्वामी देवगङ्गा, नर्मदा तथा अन्य पवित्र नदियाँ, कूप, जलाशय, पल्वल (छोटे जलाशय) तड़ाग तथा अनेक कुण्ड॥८९-९०॥
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