Srishti Khanda Extracted Page 217
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-217
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण ततो जगामनिर्वाणं पृथिवीधारणाद्धरिः । एवमादिवराहेण धृत्वा ब्रह्महितार्थिना ॥६३॥ उद्धतापुष्करे पृथ्वी सागरांबुगतापुरा। वृतः शमदमाभ्यां यो दिव्ये कोकामुखे स्थितः॥६ ४॥ आदित्यै र्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिदैवतैः सह । रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥६ ५॥ दिग्भिर्विदिग्भिः पृथिवी नदीभिः सहसागरैः । चराचरगुरुः श्रीमान्ब्रह्मा ब्रह्मविदांवरः ॥६६॥ उवाच वचनं कोकामुखं तीर्थ त्वया विभो। पालनीयं सदागोप्यं रक्षाकार्या मखेत्विह ॥६७॥ एवं करिष्ये भगवस्तदाब्रह्माणमुक्तवान् । उवाच तं पुनर्ब्रह्मा विष्णुं देवं पुरः स्थितम् ॥६८॥ त्वं हि मे परमो देवस्त्वं हि मे परमो गुरुः। त्वं हि मे परमं धाम शक्रादीनां सुरोत्तम॥६९॥ उत्फुल्लामलपदझ्ाक्ष शत्रुपक्षक्षयावह । यथा यज्ञे न मे ध्वंसो दानवैश्च विधीयते ॥७०॥ तथा त्वया विधातव्यं प्रणतस्य नमोस्तुते । विष्णुरुवाच भयंत्यजस्व देवेश क्षयं नेष्यामि दानवान् ॥७९॥ ये चान्ये विध्नकर्तारो यातुधानास्तथासुराः । घातयिष्याम्यहं सर्वान्स्वस्ति तिष्ठ पितामह ॥७२॥ एवमुक्त्वा स्थितस्तत्र साहाय्येनकृतक्षणः । प्रववुश्च शिवावाताः प्रसन्नाश्च दिशो दश ॥७३॥ सुप्रभाणि च ज्योतीषि चंद्रं चक्क: प्रदक्षिणम्। न विग्रहं ग्रहाश्चक्कः प्रसेदुश्रापि सिंधवः ॥७४॥ नीरजस्काभूमिरासीत्सकला ह्वाददास्त्वपः । जग्मुः स्वमार्गं सरितो नापि चुक्षुभुरर्णवाः ॥७५॥ sO SPOS SSSI SE का उद्धार अपनी दाढ़ के द्वारा किए । उसके बाद पृथिवी को धारण करने वाले वे यज्ञ वाराह पृथिवी को अपने स्थान पर लाकर स्थापित कर दिए ॥६२॥ पृथिवी को धारण करने के पश्चात् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये । इसतरह से ब्रह्माजी का कल्याण करने वाले आदि वराह के द्वारा धारण करके पृथिवी को कमल के ऊपर रख दिया गया जो इसके पहले पृथिवी सागर के जल में समा गयी थी । शम तथा दम गुण से युक्त जो ब्रह्माजी कोकामुख में विद्यमान थे ॥६३-६४॥ आदित्यो, वसुओं, साध्यदेवों, मरुद्गणं, रुद्रों, विश्व की सहायता करने वाले, यक्षों, राक्षसों एव किन्नरों ॥६५॥ दिशाओं, विदिशाओं, पृथिवी, नदियों, महासागरों के साथ चराचर गुरु, श्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने ॥६६॥ कोकामुख तीर्थ से कहा-- हे प्रभो ! आप इस यज्ञ की सदा रक्षा करते रहेंगे ॥६७॥ उस समय कोकामुख तीर्थ ने ब्रह्माजी से कहा-- हे भगवन् ! मैं ऐसा ही करूँगा । उसके बाद ब्रह्माजी ने अपने सामने विद्यमान भगवान् विष्णु से कहा ॥६८॥ आप ही मेरे सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, आप ही मेरे परम गुरु हैं, आप ही मेरे परमधाम (प्राप्य) हैं, तथा इन्द्रादि देवताओं के भी आप ही आश्रय हैं, हे सुरश्रेष्ठ !।६९॥ हे विकसित कमल के समान मनोहर नेत्र वाले कमल नयन भगवन् ! हे शत्रु के पक्ष का विनाश करने वाले ! जिस उपाय से दानव मेरे यज्ञ को विध्वस्त न कर सकें उसी प्रकार के कार्यों को आप करें । मैं आपकी शरण में हूँ, आपको नमस्कार है । भगवान् विष्णु ने कहा-- हे देवेश ! आप भय छोड़ दें, मैं दानवों का विनाश कर दूँगा ॥७१॥ इसके अतिरिक्त जो विघ्न करने वाले दैत्य तथा असुर हैं, मैं उन सबों को मार दूँगा, आपका कल्याण हो ॥७२॥ इसतरह से कहकर भगवान् विष्णु सहायक रूप से वहाँ पर सावधन होकर स्थिर हो गये । उस समय सुन्दर हवायें चलने लगीं; दशो दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं।।७३॥ सम्पूर्ण ज्योतिश्चक्र सुन्दर कान्ति से युक्त हो गया, और वे सब चन्द्रमा के दक्षिणवर्ती हो गये । ग्रहों में कोई विग्रह नहीं हुआ, नदियाँ स्वच्छ हो गयीं ॥७४॥ पृथिवी धूलि से रहित हो गयी और जल सम्पूर्ण आह्वाद को प्रदान करने वाले हो गये । नदियाँ अपने मार्ग से प्रवाहित होने लगीं, समुद्र में किसी भी प्रकार का क्षेभ नहीं
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