Srishti Khanda Extracted Page 216
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-216
Sanskrit Original
सनत्कुमारश्च महानुभावो मनुर्महात्मा भगवान्प्रजापतिः । पुराणदेवोथ तथा प्रचक्रे प्रदीप्तवैश्वानरतुल्यतेजाः ॥५९॥ पुरा कमलजातस्य स्वपतस्तस्य कोटरे । पुष्करे चयत्रसंभूता . देवाऋषिगणास्तथा ॥५२॥ एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः। पुराणं कथ्यते यत्र वेदस्मृतिसुसंहितम् ॥५३॥ वराहस्तु श्रुतिमुखः प्रादुर्भूतो विरिचिनः । सहायार्थं सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः ॥५४॥ विस्तीर्ण पुष्करे कृत्वा तीर्थ कोकामुखं हि तत्। वेदपादो युपदंष्टरः क्रतुहस्तश्चितीमुखः ॥५५॥ अभ्निजिह्णो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः । अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदांग; श्रुतिभूषणः ॥५६॥ आज्यनासः स्रुवतुंडः सामघोषस्वनो महान् । सत्यधर्ममयः श्रीमान्कर्मविक्रमसत्त्कृतः ॥५७॥ प्रायश्चित्त नखो धीरः पशुजानुर्मखाकृतिः । उद्गत्रात्रो होमलिंगो फलबीजमहौषधिः ॥५८॥ वास्वतरात्मा मंत्रास्थि रापस्फिक् सोमशोणितः । वेदस्कंधो हर्विर्गधो हव्यकव्यातिवेगवान् ॥५९॥ प्राग्वंशकायो ् युतिमान्नानादीक्षाभिरर्चितः । दक्षिणा हृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥६०॥ उपाकर्मेष्टिरुचिरः प्रवरर्यावर्तभूषणः । छायापत्नीसहायोवै मणिश्रृंगमिवोच्छित: ॥६ १॥ सर्वलोकहितात्मा यो दंष्ट्याभ्युज्जहार गाम् । ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः ॥६२॥ ब्रह्माजी, पृथिवी पर देवता, मनुष्य तथा लोकों का कल्याण करने के लिए यज्ञ किये ॥४९॥ ब्रह्माजी, कपिल, परमेष्ठी, देवगण, सप्तर्षिगण, महायशा त्र्यम्बक (शिवजी) ॥५०॥ सनत्कुमार महर्षि, महाप्रभाव सम्पन्न मनु (स्वायम्भुव मनु) भगवान् प्रजापति (उस यज्ञ में आये) उस यज्ञ में अग्नि के समान तेजस्वी भगवान् विष्णु ने अग्नि को प्रज्वलित करने का काम किया ॥५१॥ प्राचीन काल में उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी जब उस कमल की कर्णिका में सो रहे थे, जिस कमल पर हीं देवता तथा ऋषिगण उत्पन्न हुए ॥५२॥ यह उन महात्मा ब्रह्माजी का पौष्कर प्रादुर्भाव है, जिसकेविषय में वेद तथा स्मृतियों के अर्थ से युक्त पुराण (पद्म महापुराण) कहा जाता है ॥५३॥ श्रुतियों के मुख स्वरूप वराह ब्रह्माजी को सहायता करने के लिए उत्पन्न हुए । सुरश्रेष्ठ (भगवान् विष्णु) वराह का रूप धारण कर लिए॥५४। उन्होंने अपना शरीर जहाँ विस्तीर्ण किया वह कोकामुख नामक तीर्थ है वेद ही उनके पैर थे, यूप ही उनके दाढ थे, क्रतु रूप हाथ वाले, चितीरूपी मुख वाले ॥५५॥ उनके अग्निही जिह्वा थी, कुश ही रोम थे, ब्रह्म ही शिर हुआ रात और दिन ये दोने उनके नेत्र हुए, अथवा रात्रि के द्वारा उपलक्षित चन्द्रमा और दिन के द्वारा उपलक्षित सूर्य उनके दोनों दिव्य नेत्र थे । वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष् तथा छन्द) ही उनके कानों केभूषण बने ॥५६। घृत ही उनकी नाक बना, सुक् ही उनका तुण्ड (थुथुन) हुआ और साम ध्वनि ही उनका घर्धर घोष था । ऐश्वर्य सम्पन्न वे सत्य तथा धर्म स्वरूप कर्म वैदिक कर्म तथा विक्रम से समादृत थे ॥५७॥ प्रायश्चित हीं उनका सुदृढ नख हुआ, यज्ञ पशु ही उनके घुटने थे, इसतरह से वे यज्ञ के समान आकार वाले थे । उद्गाता ही उनके आंत थे, होम ही लिङ्ग था । फल तथा बीज महौषधियाँ हुयीं ॥५८॥ वायु ही उनकी अन्तरात्मा बना, वेद मन्त्र ही उनके सुदृढ स्फिक् थे, उन यज्ञ वराहका सोम ही शोणित (खून) बना, वेद ही उनके स्कन्ध थे हविष्य ही गन्ध हुआ । हव्य तथा कव्य रूपी अत्यन्त वेग से वे सम्पन्न थे ॥५९॥ पत्नीशाला ही उनका (यज्ञ वराह का) देदीप्यमान शरीर था । वे दीक्षाओं से अर्चित थे । दक्षिणा ही उनका हृदय थी तथा महासत्र स्वरूप महायोग थे॥६ ०॥ वे उपकर्म रूपी इष्टि से सुशोभित थे । प्रवर्ग्य आवर्त ही उनके भूषण हुए । छाया ही उनकी पत्नी थी इसंतंरहं के वेयशवराह, ऊचे मणि शृङ्ग के समान देखने में लगते थे ॥६१॥ सम्पूर्ण जीवों का कल्याण करने वाले उन्होंने पृथिवी शि
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