Srishti Khanda Extracted Page 215
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-215
Sanskrit Original
विनयो नयवृत्तीनां तेजस्तेजस्विनामपि । इत्येतत्सर्वमखिलान्सृजन् लोकपितामह: ॥३७॥ यज्ञाद्रति कामनैछत् कथं यज्ञे मतिः कृता। एष मे संशयो ब्रह्मन्नेष मे संशयः पर: ॥३८॥ आश्चर्यः परमो ब्रह्मा देवैदैत्यैश्च पठ्यते । कर्मणाश्चर्यभूतोपि तत्वतः स इहोच्यते ॥३९॥ पुलस्त्य उवाच प्रश्नभारो महानेष त्वयोक्तो ब्रह्मणश्च यः। यथाशक्ति तु वक्ष्यामि श्रूयतां तत्परं यशः ॥४०॥ सहस्रास्यं सहस्राक्षं सहस्रचरणं च यम् सहस्रश्रवणं चैव सहस्त्रकरमव्ययम् ॥४९॥ सहस्रजिह्णं साहस्रं सहस्रपरमं प्रभुम्। सहस्रं सहस्रादिं सहस्रभुजमव्ययम्॥४२॥ हवनं सवनं चैव हव्यं होतारमेव च । पात्राणि च पवित्राणि वेदीं दीक्षां चरुं ख्रुवम्॥४३॥ खुक् सोममदभृच्चैव प्रोक्षणी दक्षिणाधनम् । अध्वर्यु सामगं विप्रं सदस्यान्सदनंसदः ॥४४॥ यूपं समित्कुशं दवी चमसोलूखलानि च । प्राग्वंशं यज्ञभूमिं च होतारं बन्धनंच यत्॥४५॥ ह्वस्वान्यतिप्रमाणानि प्रमाणस्थावराणि च । प्रायश्चित्तानि वाजाश्च स्थंडिलानि कुशास्तथा ॥४६॥ मंत्रं यज्ञं च हवनं वह्विभावं भवं च यम् । अग्रेभुजं होमभुजं शुभार्चिषमुदायुधम् ॥४७॥ आहुर्वेदविदो विप्रा योयज्ञः शाश्वत: प्रभुः । यां पृछसि महाराज पुण्यां दिव्यामिमां कथाम्॥४८॥ यदर्थ भगवान्ब्रह्मा भूमौ यज्ञमथा करोत्। हितार्थं सुरमर्त्यानां लोकानां प्रभवाय च ॥४९॥ ब्रह्माथकपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च।देवाः सप्तर्षयश्चैव त््यंबकश्च महायशाः ॥५०॥ कर्म हैं, जो वेदज्ञ पुरुषों के द्वारा जानने योग्य हैं, तथा जो समर्थो के भी स्वामी हैं ॥३५॥ जो सभी जीवों के प्राण स्वरूप हैं, तथा अग्नि के समान देदीप्यमान कान्ति वालों के लिए अग्नि स्वरूप हैं । जो मनुष्यों के मन स्वरूप हैं तथा तपस्वियों के तप: स्वरूप है ॥३६॥ न्याय वृत्ति को अपनाने वालों के जो विनय (नम्रता) हैं तथा तेजस्वियों के तेज: स्वरूप हैं । इस जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी हैं ॥३७॥ वे यज्ञ के द्वारा किस गति को प्राप्त करना चाहे? उनको यज्ञ करने की इच्छा कैसे हुयी ? हे ब्रह्मन् ! मुझकों यही सबसे बड़ा संदेह होता हे ॥३८॥ देवता तथा असुर ब्रह्माजी को आश्चर्य रूप से जानते हैं । कमों के द्वारा आश्चर्य स्वरूप होकर भी वे तत्त्वत: यहाँ वर्णित किए गये हें ॥३९॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- ब्रह्माजी के विषय में आपने बहुत बड़ा प्रश्न किया है । मैं अपनी शक्ति के अनुसार उन सबों का उत्तर दूँगा । उसे आप सुनें ॥४०॥ जिन हजारों मुख वाले, अनन्त नेत्रों वाले, अनन्त चरणों वाले, अनन्त कानों वाले, अनन्त विकार रहित हाथों वाले ॥४१॥ अनन्त जिह्वाओं हजारों-हजार जीवों के परं स्वामी, अनन्त प्रदान करने वाले, अनन्त जगत् के मूलकारण, अनन्त भुजाओं वाले अव्यय पुरुष को आप पूछ रहे हें ॥४२॥ जो स्वयं ही हवन, सवन, हव्य (हवनीय द्रव्य) होता, समस्त यज्ञ पात्र, पवित्र, वेदी, दीक्षा, चरु, खुव।॥४३।। खुक, होम, अवभृथ, प्रोक्षणी, दक्षिणा का धन, अध्वर्यु सामग (साममन्त्रों क गान करने वाले), ब्राह्मण, सदस्य, सदन (यज्ञमण्डप) सदः (उपवेशन) ॥४४॥ यूप (यज्ञस्तम्भ) समिधा, कुश, दर्वी (खैर के काष्ट की बनी करछल जिससे चरु चलाया जाता है |) चमस (चमच) उलूखल (ओखली), प्राग्वंश (पत्नीशाला), यज्ञस्थल, होता तथा बन्धन स्वरूप हैं ॥४५॥ छोटे तथा लम्बे स्थावर पदार्थ, प्रायश्चित, अनेक प्रकार के अन्न, (बाज) स्थण्डिल तथा स्थण्डिल के कुश ॥४६॥ यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले मन्त्र, यज्ञ, हवन, वह्लिभाग तथा यव, अग्रेभुज, होमभुज आयुध उठाये हुए शुभार्चिष (मङ्गल ज्योति) ॥४७॥ पुरुष को वेदज्ञ ब्राह्मणों ने यज्ञ तथा शाश्वत स्वामी कहा है । हे महाराज भीष्म ! आप जिस दिव्य कथा को पूछ रहे हें ॥४८॥ तथा जिसके लिए भगवान्
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