Srishti Khanda Extracted Page 214
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-214
Sanskrit Original
कर्मणामानुपूर्व्य च प्रारंभो होत्रमेव च। होतुर्भक्षो यथाऽर्चापि प्रथमा कस्य कारिता ॥२२॥ कथं च भगवान्विष्णुः साहाय्यं केन कीदृशं | अमरै्वा कृतं यच्च तद्धवान्वक्तुमर्हति ॥२३॥ देवलोकं परित्यज्य कथंमर्त्यमुपागतः । गार्हपत्यं च विधिना अन्वाहार्यं च दक्षिणम् ॥२४॥ अप्रिमाहवनीयं च वेदीं चैव तथास्रुवम् । प्रोक्षणीयं सुचं चैव आवभृथ्यं तथैव च॥२५॥ अप्रीत्रीश्च यथाचक्रे हव्यभागवहान्हि वै । हव्यादांश्च सुरांश्चक्रे क्रव्यादांश्च पितूनपि॥२६॥ भागार्थं यज्ञविधिना ये यज्ञा यज्ञकर्मणि । यूपान्समित्कुशं सोमं पवित्रं परिधीनपि ॥२७॥ यज्ञियानि च द्रव्याणि यथा ब्रह्मा चकार ह। विबभ्राजपुरा यश्च॒ पारमेष्ठ्येन कर्मणा॥२८॥ क्षणा निमेषा: काष्ठाश्च कलास्रैकाल्यमेव च । मुहूर्तास्तिथयो मासा दिनं संवत्सरस्तथा॥२९॥ ऋतवः कालयोगाश्च प्रमाणं त्रिविधं पुरा । आयुः क्षेत्राण्यपचयं लक्षणं रूपसौष्ठवम् ॥३०॥ त्रयो वर्णास्त्रयो लोकास्तरैविद्यं पावकास्त्रयः । त्रैकाल्यं त्रीणि कर्माणि त्रयोवर्णास्त्रियोगुणाः ॥३९॥ सृष्टा लोकाः पराः स्रष्टा ये चान्येनल्पचेतसा। या गतिर्धर्मयुक्तानां या गतिः पापकर्मणाम्॥३ २॥ चातुर्वर्ण्यस्य प्रभवश्चातुर्वणर्यस्य रक्षिता । चतुर्विद्यस्य यो वेत्ता चतुराश्रमसंश्रयः ॥३३॥ यःपरं श्रूयते ज्योतिर्यः परं श्रूयते तपः । यः परं परतः प्राह परं यः परमात्मवान् ॥३४॥ सेतुर्यॉलोकसेतूनां मेध्यो यो मेध्यकर्मणाम्। वेद्यो यो वेदविदुषां यः प्रभुः प्रभवात्मनाम् ॥३५॥ असुभूतश्च भूतानामभ्निभूतोग्निवर्चसाम् । मनुष्याणां मनो भूतस्तपो भूतस्तपस्विनाम् ॥३६॥ पर आपलोगों ने जो किया तथा वहाँ जो हुआ उसे आप ॥२०॥ ब्रह्माजी द्वारा किये गये समस्त कर्मो को विस्तार पूर्वक मुझे सुनायें । मैं ब्रह्माजी के यज्ञ की विधि को पूर्णरूप से सुनना चाहता हूँ ॥२१॥ उस कर्म की आनुपूर्वी (क्रम) क्या थी ? यज्ञ कर्म का तथा अग्निहोत्र का प्रारम्भ, होता के भक्ष तथा जिसकी प्रथम पूजा हुयी उसकी अर्चा के प्रकार को मुझे बतलाये ॥२२॥ आप यह भी बतलायें कि भगवान् विष्णु ने किसके द्वारा तथा किस प्रकार से सहायता की अथवा देवताओं के द्वारा सहायता की ?॥।२३॥ ब्रह्माजी देवलोक का परित्याग करके मर्त्य लोक में क्यों आये ? विधिपूर्वक, गार्हपत्य, अन्वाहार्य तथा दक्षिण ॥२४।। अग्नि एवं आहवनीय अग्नि को, यज्ञ की वेदी, खुवा, प्रोक्षणीपात्र, रुक्, तथा जिस प्रकार अवभृथ स्नान उन्होंने किया उसे आप मुझे बतलायें ॥२५॥ उन्होंने तीनों अग्नियों का जैसे निर्माण किया, हव्य भाग का वहन करने वाले देवताओं, हव्य का भक्षण करने वाले देवताओं, असुरों तथा कव्य भाग को खाने वाले पितरों को ॥२६॥ यज्ञ विधि के द्वारा भागों के यज्ञ तथा अयज्ञ कर्म में होने वाले यूपों, समिधाओं, कुश, सोम, पवित्री, परिधियों ।।२७॥ यज्ञीय द्रव्यों को जैसे ब्रह्माजी ने बनाया, उसको तथा विवाभ्राज पूर्वक पारमेष्ठ (परमेष्ठी संबन्धी कर्म के द्वारा)।२८॥ क्षण, निमेष, काष्ठा, कला तथा तीनों कालों के कर्म, मुर्हृत, तिथियाँ, मास, दिन एवं संवत्सर ॥२९॥ ऋतु, काल, योग, तथा तीनों प्रकार के प्रमाण, आयुष, क्षेत्र तथा उनका हास लक्षण, रूप तथा सौष्ठव, तीनों वर्ण, तीनों लोक, त्रिविध कर्म तथा तीनों अग्नि । तीनों कालों में किए जाने वाले तीन कर्मो को, तीन वर्ण, तीन गुण ॥३१॥ और अल्प चेतस के द्वारा ब्रह्माजी द्वार जिन लोकों की सृष्टि की गयी । धार्मिक पुरुषों को प्राप्त होने वाली गतियों तथा पापियों की होने वाली गतियों का वर्णन आप करे।।३२।। चारों वर्णो की उत्पत्ति स्थान तथा चारो वर्णो की रक्षा करने वाले, चारो विद्याओं से संबन्धित कर्मो के ज्ञाता तथा चारो आश्रमों के आश्रय स्वरूप ॥३३॥ जो परंज्योति तथा परंतप रूप से सुने जाते हैं सर्वश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने जिनको कहा तथा जो परम परमात्मा हैं ॥३४॥ जो लोक के सेतुओं के भी सेतु हैं, जो मेध्य कर्मों में सर्वश्रेष्ठ मेध्य
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