Srishti Khanda Extracted Page 213

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-213

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Sanskrit Original

अन्येषां चैव देवानां दत्त: स्वर्गो महात्मना। अग्निहोत्रार्थमुत्पन्ना वेदा ओषधयस्तथा ॥७॥ ये चान्ये पशवो भूमौ सर्वे यज्ञकारणात् । सृष्टा भगवता तेन इत्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥८॥ तदत्र कौतुकं मह्यं श्रुत्वेदं तब भाषितम्। यं काममधिकृत्यैकं यत्फलं यां च भावनाम् ॥९॥ कृतश्चानेन वै यज्ञः सर्व शंसितुमर्हसि । शतरूपा च या नारी सावित्री सात्विहोच्यते ॥१०॥ भार्या सा ब्रह्मणः प्रोक्ता ऋषीणां जननी च सा । पुलस्त्याद्यान्मुनीन्सप्त दक्षाद्यास्तु प्रजापतीन् ॥११॥ स्वायंभुवादीश्च मनून्सावित्रीसमजीजनत्। धर्मपत्नी तु तां ब्रह्मा पुत्रिणीं ब्रह्मणः प्रियाम्॥१२॥ पतिव्रतां महाभागां सुव्रतां चारुहासिनीम् । कथं सतीं परित्यज्य भार्यामन्यामविंदत ॥१३॥ किंनाम्नी किं समाचरा कस्य सा तनया विभोः । क्व सा दुष्टा हि देवेन केन चास्य प्रदर्शिता ॥ ९ ४॥ किं रूपा सातु देवेशी दृष्टा चित्तविमोहिनी। यां तु दृष्ट्वा स देवेशः कामस्य वशमेयिवान् ॥१५॥ वर्णतो रूपतश्चैव सावित्रयास्त्वधिका मुने । या मोहितवती देवं सर्वलोकेश्वरं विभुम् ॥१६॥ यथा गृहीतवान्देवो नारीं तां लोकसुदरिम् । यथा प्रवृत्तो यज्ञोसौ तथा सर्व॑ प्रकीर्तय ॥१७॥ तां दृष्टवा ब्रह्मणः पार्श्वे सावित्री किं चकार ह । सावित्र्यां तु तदा ब्रह्मा कां तु वृत्तिमवर्त्तत ॥ ९ ८॥ सन्निधौ कानि वाक्यानि सावित्री ब्रह्मणा तदा। उक्ताप्युक्ततती भूयः सर्व शंसितुमर्हसि ॥१९॥ किं कृतं तत्र युष्माभिः कोपोवाथक्षमाथ वा । यत्कृतं तत्र यद्दृष्टं यत्तवोक्तं मयात्विह ॥२०॥ विस्तरेणेह सर्वाणि कर्माणि परमेष्ठिनः । श्रोतुमिछाम्यशेषेण विधेर्यज्ञविधि परम् ॥२९॥ वेदों में अर्चनीय रूप से वर्णन हैं उसे आप बतलाये तथा किस कामना से ब्रह्माजी ने यज्ञ किया ॥५॥ जिस प्रकार से ये अजर तथा अमर देवताओं के भी स्वामी हैं उस प्रकार का उनका अक्षय स्वर्ग भी अजर-अमर देखा जाता है॥६॥ उन महात्मा ब्रह्माजी ने दूसरे देवताओं को स्वर्ग प्रदान किया । वहाँ पर अग्निहोत्र के लिए वेद तथा औषधियाँ (अन्न) उत्पन्न हो गयीं ॥७॥ पृथिवी पर जितने भी दूसरे पशु हैं, उन सबों की ब्रह्माजी ने यज्ञ के लिए सृष्टि की, यह वैदिकी श्रुति बतलाती है ॥८॥ आपके इन वचन को सुनकर मेरे मन में उत्कण्ठा उत्पन्न हो गयी है । जिस कामना से जिस फल तथा भावना से ॥९॥ ब्रह्माजी ने इस यज्ञ को किया उन सारी बातों को आप मुझे बतलायें । शतरूपा नाम की जो नारी है, उसी को यहाँ सावित्री कहा गया है ॥१०॥ उसी को ब्रह्माजी की पत्नी तथा ऋषियों की माता कहा गया है । पुलस्त्य आदि सात मुनियों तथा दक्ष आदि प्रजापतियों ॥११॥ तथा स्वायम्भुव आदि मनुओं को सावित्री ने जन्म दिया । ब्रह्माजी ने अपनी पुत्रों वाली प्रियतमा पतिव्रता महभागा, सुन्दर ब्रत वाली तथा चारुहासिनी एवं सती पत्नी का परित्याग करके दूसरी पत्नी को क्यों ग्रहण किया ?॥१२-१३॥ हे विभो ! ब्रह्माजी की उस पत्नी का क्या नाम था? उसका आचरण कैसा था ? वह किसकी पुत्री थी ? ब्रह्माजी ने उसको कहाँ देखा ? और उसको किसने दिखाया?।।१४॥ देवेशी देखते ही जो चित्त को मोहित करने वाली थी उसका कैसा रूप था ? जिसको देखकर ब्रह्माजी काममोहित हो गये थे 2॥१५॥ जिसने वर्ण और रूप में सावित्री देवी से अधिक होने के कारण सभी लोकों के स्वामी ब्रह्माजी को मोहित कर लिया ।।१६॥ ब्रह्माजी ने जिस प्रकार से उस लोकसुन्दरी नारी को स्वीकार किया तथा जिस प्रकार से वह यज्ञ प्रारम्भ हुआ, उन सारी बातों को आप मुझे बतलायें ॥१७॥ ब्रह्माजी के बगल में उस देवी को बैठी हुयी देखकर सावित्री देवी ने क्या किया ? उस समय सावित्री देवी के विषय में ब्रह्माजी की कैसी वृत्ति हुयी ?॥१८॥ उनके सन्निकट में ब्रह्माजी ने सावित्री देवी से क्या कहा ? ब्रह्माजी की बातों को सुनकर सावित्री देवी ने क्या कहा? उसे भी आप मुझे बतलायें ॥१९॥ उस समय आप लोगों ने क्रोध किया अथवा क्षमा कर दिया? वहाँ

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