Srishti Khanda Extracted Page 211

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-211

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Sanskrit Original

कल जे श्रीपद्ममहापुराण उत्तानमास्येन हविर्जुहोति अनंतमाप्रोत्यभितः प्रतिष्ठाम् । तस्यांगसंगादभिनिष्कृतं च वैश्वानरं सर्वमिदं प्रपेदे ॥३८२॥ प्रादेशमात्रं हदभिस्रुतं य त्तस्मिन्प्राणेनात्मयाजी जुहोति । तस्याम्निहोत्रे हुतमात्मसंस्थं सर्वेषु लोकेषु सदैवतेषु ॥३८३॥ देवं विधातुं त्रिवृतं सुवर्ण ये वै विदुस्तं परमार्थभूतम् । ते सर्वभूतेषु महीयमाना देवाः समर्था अमृतं व्रजंति ॥३८४॥ देवांश्च वेद्यं च विधिं च कृत्स्न मथोनिरुक्तं परमार्थतां च । सर्व शरीरात्मनि यः प्रवेद तस्याभिसर्वे प्रचरंति नित्यम् ॥३८५॥ भूमावसक्तं दिवि चाप्रमेयं हिरण्मयं तं च समंडलांते । प्रदक्षिणं दक्षिणमंतरिक्षे योवेदनाप्यात्मनि दीप्तरश्मिः ॥३८६॥ आवर्तमानं च विवर्तमानं षण्नेमियद्द्वादशारं त्रिपर्व । यस्येदमास्यं परिपातिविश्वं तत्कालचक्रंनिहितं गुहायाम् ॥३८७॥ यतः प्रसादं जगतः शरीरं सर्वाश्च लोकानधिगच्छतीह । तस्मिन्हि संतर्पयतीह देवान् स वै विमुक्तो भवतीह नित्यम् ॥३८८। तेजोमयो नित्यमतः पुराणो लोकेभवत्यर्थभयादुपैति । भूतानि यस्मान्नभयं ब्रजति भूतेभ्यो यो नोद्विजते कदाचित् ॥३८९॥ करते हें उन सबों को संखीर में उत्पत्ति जन्य खेद (श्रम) होता है; इसलिए श्रद्धा पूर्वक ही कर्मो को करना चाहिए।।३८०॥। जीवों को अभय प्रदान रूप दान सबसे बड़ा दान है । उससे बड़ा दान संसार में कोई भी नहीं है । जो सर्वप्रथम जलती हुयी अग्नि में अपने शरीर का होम कर देता हे, वह प्रजाओं के लिए अनन्त अभय को प्राप्त करता है ॥३८१॥ जो ऊपर की ओर मुख करके उसमें हविष्य का होम करता है वह चारो ओर से अनन्त अभय को प्राप्त करता है । उसके शरीर से निकली हुयी अग्नि को ही इस सम्पूर्ण जगत् ने प्राप्त किया ॥३८२॥ जो अग्नि हृदय से एक बित्ता ऊपर निकलती है उसी में आत्मा यात्री प्राण का होम करता है । उसके अग्निहोत्र जो आत्मसंस्थ वस्तु का होम किया जाता है वह सभी लोकों तथा देवताओं में स्थित होता है ॥३८३॥ परमार्थ स्वरूप सुन्दर वर्ण वाले देवता को त्रिवृत करने की प्रक्रिया को जो जानते हैं; वे देवगण सभी भूतों में आनन्दानुभव करते हुए अमृतत्व को प्राप्तकर लेते हैं ॥३८४॥ जो सभी वेदों को, वेद्य तत्त्व को, सम्पूर्ण विधि को; उनकी निरुक्ति तथा परमार्थता को इन सबों को अच्छी तरह से जानता है उसी के चारो ओर ये सभी सदा घूमते रहते हैं ॥३८५॥। प्रथिवी से जिसका सम्बन्ध नहीं होता है द्युलोक में अप्रमेय हिरण्मय मण्डल के भीतर अन्तरिक्ष में दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा करने वालों की प्रख्यात किरणों वाले सूर्य को अपनी आत्मा में नहीं जानता है ॥३८६॥ जिस काल तत्त्व का आवर्तित तथा विवर्तित होने वाला छह (ऋतु रूपी) नेमियों, बारह मास रूप आरों तथा तीन (गर्भी, वरसात एवं जाड़ा) पर्वों वाला संवत्सर मुख है, तथा जो सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करता है, वह काल चक्र अत्यन्त गूढ है ॥३८७॥ जिसकी प्रसन्नता ही जगत् का शरीर, जो सम्पूर्ण लोकों को प्राप्त करता है, उसी काल तत्त्व में जो इन्द्रियों को तृप्त करता है, वह सदैव ही मुक्त रहता है ॥३८८॥ वह तेजोमय पुराण पुरुष लोक में प्रयोजन वशात् आता है । उससे किसी भी जीव को भय नहीं होता है और वह कभी भी भूतों (जीवों) से उद्विग्न नहीं होता है ॥३८९॥ वह किसी की निंदा का पात्र नहीं र्यी

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