Srishti Khanda Extracted Page 210

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-210

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Sanskrit Original

नहृष्येत विषीदेत मानितोऽमानितस्तथा । सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥३६९॥ नाभिनंदेतमरणं नाभिनंदेतजीवितम् । कालमेव निरीक्षेत निर्देशं कृषको यथा ॥३७०॥ अनभ्याहतचितश्च दांतश्चाहतधीस्तथा । विमुक्तः सर्वपापेभ्यो नरो गछेत्ततो दिवम् ॥३७१॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो भूतानामभयं यतः। तस्य देहविमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥३७२॥ यथा नागपदेन्यानि पदानि पदगामिनाम् । सर्वाण्येवावलीयंते तथा ज्ञानानि चेतसि॥३७३॥ एवं सर्वमहिंसायां धर्मोर्थश्च महीयते । मृतः स नित्यं भवति यो हिंसां प्रतिपद्यते ॥३७४॥ अहिंसकस्ततः सम्यग्धृतिमान्नियतेंद्रियः । शरण्यस्सर्वभूतानां गतिमाप्रोत्यनुत्तमाम् ॥३७५॥ एवं प्रज्ञान तृप्तस्य निर्भयस्य मनीषिणः । न मृत्युरधिको भावः सोऽमृतत्वं च गच्छति॥३७६॥ विमुक्तः सर्वसंगेभ्यो मुनिराकाशवत्स्थितः । विष्णुप्रियकरः शांतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥३७७॥ जीवितं यस्य धर्मार्थ धर्मोरत्यर्थमेव च । अहोरात्रादि पुण्यार्थं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥३७८॥ निवारित समारंभ निर्नमस्कारमस्तुतिम् | अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥३७९॥ सर्वाणि भूतानि सुखं रमंते सर्वाणि दुःखानि भृशं भवंति । तेषां भवोत्पादनजातखेदः कुर्यात्तु कर्माणि च श्रद्दधानः ॥३८०॥ दानं हि भूताभयदक्षिणायाः सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह । तीक्ष्णे तनुं यः प्रथमं जुहोति सोनंतमाप्रोत्यभयं प्रजाभ्यः ॥३८ १॥ हे जिसतरह कोई कंजूस व्यक्ति किसी को आते देखकर डरता है । ऐसे पुरुष को देवता ब्राह्मण जानते हें ॥३६८॥ जो सम्मान को प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और अपमान के कारण दु:खी नहीं होता है, जो सबों को अभय प्रदान करता है उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं ॥३६९॥ जो जीवन और मरण का अभिनंदन (समादर) नहीं करता है, वह कृषक के समान केवल काल की प्रतीक्षा करता है, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं ॥३७०॥ जिसका चित्त राग अथवा द्वेष से दूषित नहीं होता है जो जितेन्द्रिय होकर अपने मन को वश में रखता हे, वह व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है और वह अन्त में मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥३७१॥ जिसको किसी जीव से भय नहीं होता है, तथा जोकिसी जीव को भयभीत नहीं करता है, उस देहात्माभिमान से रहित पुरुष को कहीं भी भय नहीं प्राप्त होता हे॥३७२॥ जिसतरह पैर से चलने वाले सभी प्राणियों के पद्चिहन, हाथी के पद्चिहन में समा जाते हे, किञ्च जिसतरह सभी ज्ञानां का लय अन्तःकरण में हो जाता है ॥३७३॥ उसीतरह सभी धर्म तथा अर्थ अहिंसा धर्म में ही समा जाते हें । जो हिंसा करता है, वह नित्य ही मरता रहता है ।।३७४।। अतएव जो अहिसंक होता है, वह सम्यक् धैर्य: सम्पन्न, जितेन्द्रिय, सभी जीवों का रक्षक होता है फलत: वह सर्वोत्तम गति प्राप्त करता है ॥३७५॥ इस तरह के प्रज्ञान के कारण तृप्त तथा निर्भय मनीषी होता है, उसके लिए मृत्यु कोई अधिक भाव नहीं है, अतएव वह अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है ।।३७६। जो मननशील पुरुष आकाश के समान समस्त आसक्तियों से रहित होते हैं, वह शान्त पुरुष भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाला होता है; देवगण उसे ब्राह्मण जानते हैं ॥३७७॥ जिसका जीवन धर्म के लिए होता है, धर्म अत्यधिक पुण्यकारक होता है तथा जिसके रात-दिन पुण्य करने के लिए होते हैं उसको देवगण ब्राह्मण समझते हैं ॥३७८॥ जिसके मन में कोई भी कामना नहीं होती है, तथा जो किसी कामना से किसी कार्य का संकल्प नही करता है, जो किसी स्तुति अथवा नमस्कार नहीं चाहता है, जिसके सभी कर्म विनष्ट हो गये है, ऐसे पुण्य पुरुष को देवता ब्राह्मण जानते हैं ॥३७९॥ सभी जीव सुख में रमण करते हैं, तथा दुःख में अत्यधिक कष्ट का अनुभव

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