Srishti Khanda Extracted Page 209
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-209
Sanskrit Original
यत्कार्यं परमात्मार्थ तत्त्वमेकमनाः श्रुणू । काषायं धारयित्वा तुश्रेणी स्थानेषु च त्रिषु ॥३५७॥ यो व्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् । तद्धावनेन संन्यस्य वर्तनं श्रूयतां तथा ॥३५८॥ एक एव चरेद्धर्म सिध्यर्थमसहायवान्। एकश्चरति यः पश्यन्नजहाति नहीयते॥३५९॥ अनभ्निरनिकेतस्तु ग्रामं भ्िक्षार्थमाश्रयेत् । अश्वस्तनविधानः स्यान्मुनिर्भावसमन्वितः ॥३६०॥ लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्नं निषेवयेत् । कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता ॥३६९॥ उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद्विक्षुलक्षणम् । यस्मिन् वाचः प्रविशंति कूपे प्राप्तामृता इव ॥३६२॥ नवक्तारं पुनर्याति सकैवल्याश्रमे वसेत्। नैव पश्येन्न श्ृणुयादवाच्यं जातु कस्यचित् ॥३६३॥ ब्राह्मणानां विशषेण नैतद्धूयात्कथंचन । यदुब्राह्मणस्यानुकूलं तदेव सततं वदेत् ॥३६४॥ तुष्णीमासीत निंदायां कुर्वन् भैषज्यमात्मनः । येन पूर्णमिवाकाशं भवत्येकेन सर्वदा॥३६५॥ शून्यं येन समाकीर्णं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥३६६॥ येनकेनचिदाछन्नो येनकेनचिदाशितः । यत्र क्वचन शायी च तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥३६७॥ अहेरिवजनाद्धीतः सुहदोनरकादिव। कृपणादिव नारीभ्य स्तंदेवा ब्राह्मणं विदुः ॥३६८॥ TREASON ल SESS IS RICHES HES युक्त सन्यासाश्रम, स्वेतर तीन आश्रमों की अपेक्षा अत्यधिक श्रेष्ठ है ॥३५५॥ चतुर्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ आश्रम कहा गया है । वह परम परायण है । उसका में वर्णन करता हूँ उसे सुनो । गार्हस्थ्य तथा वानप्रस्थ इन दोनों आश्रमों से संस्कार प्राप्त करके उसके बाद ॥३५६॥ मुमुक्षु पुरुष को परमात्मा की प्राप्ति के लिए जो कुछ करना चाहिए उसे सुनो । जीवन के तीनों विभागों को पार करके उससे श्रेष्ठ सन्यासाश्रम में प्रवेश करने वाला पुरुष काषाय वस्र को धारण करे । संन्यास सर्वश्रेष्ठ आश्रम है । अतएव संन्यास लेकर उसकी भावना से युक्त हो जाय । संन्यासाश्रम के कर्तव्यों को सुनो ॥३५७-३५८॥ वह अपने साथ किसी को सहायक न रखे । धर्म की सिद्धि के लिए अकेले संन्यास के नियमों का पालन करे । जों अकेले रहता है वह न तो कुछ त्यागता है और न तो उसकी कोई हानि ही होती है ॥३५९॥ वह अग्नि का सेवन न करे । रहने के लिए घर न बनाये । वह केवल भिक्षा प्राप्त करने के लिए ग्राम में प्रवेश करे । वह आगामी दिन के लिए कुछ भी संग्रह न करे, वह संन्यास की भावना से युक्त रहे ॥३६०॥ वह थोड़ी मात्रा में और निश्चित ही भोजन करे । वह दिन में एक बार ही भोजन करे । वह कपाल (नारियल की खोपड़ी से बने पात्र) में भोजन करे । वृक्ष की जड में निवास करे, गन्दा कपड़ा पहने, किसी से कोई सहायता न ले।३६ १॥ वह सबों के प्रति उपेक्षा की भावना रखे, यही संन्यासी का लक्षण है । जिसतरह से कूप में गया हुआ पानी कुएँ. में ही रह जाता है, उसी तरह वह किसी की भी बात सुनकर उसे सह ले ॥३६२॥ वह किसी का उत्तर न दे ऐसा ही व्यक्ति कैवल्य (संन्यासाश्रम) में रहने के योग्य होता है । वह किसी की निन्दा न तो सुने और न तो किसी की निन्दा करे ॥३६३॥ विशेष रूप से उसे ब्राह्मणों की निन्दा न तो सुनना चाहिए और न करना चाहिए । जो ब्राह्मणों के अनुकूल हो उसे ही बोलना चाहिए ॥३६४।। यदि कोई उसकी निन्दा करे तो उसे अपनी आत्मशुद्धि की औषधि समझकर चुपचाप बैठे रहना चाहिए । जिससे केवल उसी से आकाश पूर्ण के समान हो जाता है । जिससे आकाश परिपूर्ण हो जाय उसे देवता ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) समझते हैं । जिस किसी भी वस्तु से अपने शरीर को ढँक लेने वाले, जिस किसे भी वस्तु को खाकर रह जाने वाले, जहाँ कहीं भी सो लेने वाले को देवता, ब्राह्मण समझते हैं ॥३६७॥ वह जनसमूह से उसी तरह से डरता है जिसतरह कोई सर्प को देखकर डरता है, जिस तरह कोई नरक से भयभीत होता है, उसी तरह अपने मित्रों को देखकर भयभीत होता है । वह नारियों को देखकर उसी तरह डरता
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