Srishti Khanda Extracted Page 208

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-208

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

अपास्योपरतांमायां ब्राह्मणा वनमाश्रिताः । अनक्षत्रास्तथाऽ धृष्या दृश्यन्ते प्रोषिता गणाः ॥३४६॥ जरया तु परिद्यूना व्याधिना परिपीडिता: । चतुर्थं त्वाश्रमं शेषं वानप्रस्था श्रमाद्ययुः ॥३४७॥ सद्यस्कारी सुनिर्वाप्य सर्ववेदसदक्षिणाम् । आत्मयाजी सौम्यमतिरात्मक्रीडात्मसंश्रयः ॥३४८॥ आत्मन्यग्निं समाधाय त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहम्। सद्यस्कश्च॒ यजेद्यज्ञानिष्टिं चैव सर्वदा ॥३४९॥ सदैवयाजिनां यज्ञानात्मनीज्या प्रवर्तते । त्रीनेवाग्रीस्त्यजेत्सम्यगात्मन्येवात्मना क्षणात् ॥३५०॥ परप्रुयाद्येन वा यच्च तत्प्राशनीयादकुत्सयन्। केशलोमनखान्र्यस्येद्वानप्रस्थाश्रमे रतः ॥३५९॥ आश्रमादाश्रमं सद्यः पूतो गच्छति कर्मभिः । अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दत्वा प्रव्रजेद्द्विजः ॥३५२॥ लोकास्तेजोमयास्तस्य प्रेत्य चानंत्यमश्नुते । सुशीलवृत्तो व्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र चरन्तुमीहते ॥३५३॥ अरोष मोहोगतसंधिविग्रहः सचेदुदासनवदात्मचिंतया । यमेषु चैवान्यगतेषु नव्यथः स्वशास्रशून्यो हृदिनात्मविभ्रमः ॥३५४॥ भवेद्यथेष्टा गतिरात्मयाजिनी निस्संशये धर्मपरे जितेन्द्रिये । अतःपरं श्रेष्ठमतीवसहुणै रथिष्ठितं त्रीनतिवर्त्यचाश्रमान् ॥३५५॥ चतुर्थमुक्तं परमाश्रमं शृणु प्रकीर्त्यमानं परमं परायणम् । प्राप्य संस्कारमेताभ्यामाश्रमाभ्यां ततः परम् ॥३५६॥ अतिरिक्त जो उग्र तपस्वी थे, तथा धर्म के नैपुण्य को जानने वाले थे वे सुरेश्वर ब्रह्माजी की आराधना करके वन में चले गये थे ॥३४५॥ माया के बन्धन को तोड़कर वे ब्राह्मण वन में चले गये । वे वन में गये हुए नक्षत्र से भिन्न तथा अधृष्य रूप से दिखायी देते हैं ॥३४६॥ बार्द्धक्य के द्वारा सताये गये तथा व्याधि से अत्यन्त पीडित वानप्रस्थ का परित्याग करके चतुर्थ आश्रम संन्यास में प्रवेश कर गये ।।३४७॥। संन्यास आश्रम में प्रवेश करने वाले को यज्ञ में अपना सब कुछ दक्षिणा देकर, अग्नि को शान्त करके, सद्यस्करी (शीघ्र किसी काम को करने वाला) होना चाहिए। उसे आत्मयजन करना चाहिए, उसे सौम्य मति वाला, अपनी आत्मा में ही क्रीडा करने वाला तथा आत्म संश्रय होना चाहिए ॥३४८॥ अपनी आत्मा में ही भावना द्वारा अग्नि का आधान करके सभी प्रकार के परिग्रहं का परित्याग कर देना चाहिए वे आत्मा में ही यज्ञों को तथा सदा इष्टियों को करते हैं ॥३४९। जो सदैव यज्ञों को करते हैं, उनका आत्मा में ही भावनात्मक यज्ञ चलता रहता है । वह तीनों अग्नियों का अच्छी तरह से परित्याग अपनी आत्मा में ही कर दे ॥३५०॥ जहाँ कहीं से जो कुछ भी मिले उसे ही उन्हें खाना चाहिए, वह अन्न की निन्दा न करे । वह वानप्रस्थाश्रम में ही केश, तथा रोमों को त्याग दे ॥३५१॥ मुमुक्षु पुरुष एक आश्रम से दूसरे आश्रम में कर्मो के द्वारा प्रवेश कर जाय ऐसा करने वाला पवित्र मुमुक्षु होता है । जो द्विज सभी भूतों (जीवों) को अभय प्रदान करके संन्यास ले लेता है ॥३५१-३५२॥ वह तेजोमय लोकों को जीत लेता है तथा मृत्यु के पश्चात् आनन्त्य को प्राप्त करता है। जो शील सम्पन्न वृत्ति वाला तथा निष्पाप मुमुक्षु पुरुष इस लोक में अथवा परलोक में रमण करना नहीं चाहता है॥३५३॥ वह रोष, मोह, संधि तथा विग्रह से रहित एवं संसार से उदासीन होकर आत्मचिन्तन करता रहता है । यमों तथा दूसरों के चले जाने पर उसको कोई कष्ट नहीं होता है, वह शास्त्र शून्य हो जाता है, उसे आत्मा के विषय में किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रहता है ॥३५४।। उसकी अपनी इच्छानुसार होने वाली गति अपनी आत्मा का ही यजन करने वाली हो जाती है । वह संशय रहित, धर्म परायण तथा जितेन्द्रिय हो जाता है । अतएव श्रेष्ठ गुणों से

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know