Srishti Khanda Extracted Page 207

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-207

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Sanskrit Original

ग्रीष्मे हविष्यं प्रायच्छेत्समाघेष्वपि पंचसु । वानप्रस्थाश्रमेप्येताश्चतस्त्रो वृत्तयः स्मृताः ॥३३३॥ सद्यः प्रभक्षकाः केचित्केचिन्मासिकसंचयान् । वार्षिकान् संचयान् केचित्केचिदद्वादशवार्षिकान्॥३३४॥ कुर्वन्त्यतिथिपूजार्थं यज्ञतन्त्रारथिव च। अभ्रावकाश वर्षासु हेमंते जलसश्रयाः ॥३३५॥ ग्रीष्मे पंचाग्मि तपसः शरद्यमृतभोजनाः । भूमौविपरिवर्तत तिष्ठंति प्रपदैरपि॥३ ३६॥ स्थानासने च वर्तन्ते वसनेष्वपि संस्थिते। दंतोलूखलिनः केचिदश्मकुट्टास्तथा परे ॥३३७॥ शुक्लपक्षे पिबन्त्येके यवागूं क्वथितां क्वचित्। कृष्णपक्षेऽपिबंत्येके भुंजते च यथागमम् ॥३३८॥ मूलैरेके फलैरेके जलैरेके दृढव्रताः। वर्त्तयति यथान्यायं वैखानसधृतव्रताः ॥३३९॥ एताश्चान्याश्च विविधा दीक्षास्तेषां मनस्विनाम् । चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणो मतः॥३४०॥ वानप्रस्थो गृहस्थश्च सततोन्यः प्रवर्त्तते। तस्मिन्नेव युगे तात विप्रैः सर्वार्थदर्शिभिः ॥३४९॥ अगस्त्यश्च सप्तर्षयोमधुच्छंदो गवेषणः । सांकृतिः सदिवोभांडि र्यवप्रोथो ह्यथर्वणः ॥३४२॥ अहोवीर्यस्तथाकाम्यः स्थाणु मेधातिथि बुधः । मनोवाकः शिवीवाकः शून्यपालो कृतव्रणः ॥३४३॥ एते कर्मसु विद्वांसस्ततः स्वर्गमुपागमन् । एते प््रत्यक्षधर्माणस्तथा यायावरागणाः ॥३४४॥ ऋषीणामुग्रतपसां धर्मनैपुण्यदर्शिनाम् । सुरेश्वरं समाराध्य ब्राह्मणा वनमाश्रिता: ॥३ ४५॥ जिन अग्नियों का सेवन गृहस्थाश्रम में वह करता था । नियम पूर्वक निश्चित आहार करे भगवान् विष्णु की भक्ति करे।।३३१।। उस समय अग्निहोत्र तथा यज्ञ के सभी आङ्गोंका पालन करे । वह उन्ही ब्रीहि, यव तथा निवार का भोजन करे जो बिना बोये ही जमते हें । तथा विघस का भोजन करे ॥३३२॥ वह ग्रीष्म ऋतु में हविष्य का होम करे, माघ आदि पाँच महीनों में हविष्य का ही होम करे । वानप्रस्थाश्रम के लिए ये चार वृत्तियाँ बतलायी गयी हैं ॥३३३॥ कुछ लोग सद्यः प्राप्त वस्तु का भोजन करते हैं, कुछ लोग महीने भर चलने योग्य अन्नों का संचय करते हे । कुछलोग वर्ष तक चलने भर अन्न का संचय करते हैं, और कुछ लोग बारह वर्ष तक चलने भर अन्न का संचय करते हें ॥३३४॥ वे इतने अन्नों का संचय अतिथि की पूजा के लिए, तथा यज्ञ करने के लिए करते हैं । कुछ वानप्रस्थी वर्षा काल में मेघ के नीचे बैठते है, हेमन्त ऋतु में जल में निवास करते हैं ॥३३५॥ ग्रीष्मकाल में पञ्चाग्नि तापते हैं । वे शरद् ऋतु में अमृत का भोजन करते हैं । वे प्रथिवी पर लेटते हैं | कुछ तपस्वी आपने पैर के अग्रभाग (चौवे) पर खड़े रहते हैं ॥३३६॥ कुछ लोग एक ही स्थान पर तथा एक ही आसन से बैठे रहते हैं कुछ लोग वस्र भी धारण करते हैं । कुछ लोग दाँतों से कूटकर खा लेते हैं, कुछ लोग पत्थर से कूट कर खाते हैं ॥३३७॥ कुछ लोग शुक्ल पक्ष में एकबार यव के आँटे को उबालकर पी लेते हैं तो कुछ लोग जो समयानुसार मिल जाता है उसे ही खा लेते हैं ॥३३८॥ कुछ लोग केवल मूल को खाकर दृढता पूर्वक ब्रत का पालन करते हैं तो कुछ लोग फल खाकर ब्रत का पालन करते हैं । कुछ लोग केवल जल ही पीते हैं वे नियमानुसार वैखानस व्रत का पालन करते हैं ॥३३९॥ उन मनस्वी पुरुषों की इन सबों की तथा अन्य अनेक प्रकार की भी दीक्षाएँ होती हैं । चौथा धर्म औपनिषद धर्म है तथा वह सबों के लिए समान रूप से अनुष्ठेय है ॥३४०॥ वानप्रस्थ तथा गृहस्थों का जो धर्म है, उससे भिन्न ही संन्यासियों के धर्म का निरूपण सर्वार्थदर्शी मनीषियों ने किया है ॥३४१॥ आगस्त्य महर्षि, सप्तर्षि, गवेषण, साङ्कृति, सुदिव, भाण्डि, यवप्रोथ, अथर्वण ॥३४२॥ अहोवीर्य, काम्य, स्थाणु मेधातिथि, बुध, मनोवाक, शिनीवाक, शून्यपाल तथा अकृतव्रण ॥३४३॥ ये सबके सब धर्म तत्त्व के प्रख्यात ज्ञाता थे अतएव ये सब स्वर्ग को पराप्त किये । इन लोगों ने धर्म का साक्षात्कार किया था तथा ये सभी यायावर (संन्यासी) थे ॥३४४॥ इन सबों के

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