Srishti Khanda Extracted Page 206
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-206
Sanskrit Original
कायस्था दासवर्गाश्च दुहिता कृपणंपरम् । तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेन्नित्यमसंज्वरः ॥३ ९९॥ गृहधर्मरतो विद्वान्धर्मनिष्ठो जितक्लमः। नारभेद्वहुकार्याणि धर्मवान्किचिदार भेत् ॥३२०॥ गृहस्थवृतयस्तिस्रस्तासां निश्रेयसं परम् । परस्परं तथैवाहुश्चतुराश्रम्यमेव च ॥३२९॥ येचोक्ता नियमास्तेषां सर्व कार्य बुभूषुणा । कुम्भधान्यैरुंच्छशिलैः कापोतीं वृत्तिमाश्रितैः ॥३२२॥ यस्मिंश्चैते चसंत्यर्थास्तद्ाष्टरमभिवर्धते । पूर्वापरान्दशपरान्पुनाति च पितामहान् ॥३२३॥ गृहस्थवृत्तिमप्येतां वर्तयेद्यो गतव्यथः। स॒ चक्रधरलोकानां समानाम्ग्राप्रुयाद्रतिम् ॥३ २४॥ जितेंद्रियाणामथवा गतिरेष विधीयते। स्वर्गलोकोगृहस्थानां प्रतिष्ठानियतात्मनाम्॥३२५॥ ब्रह्मणा भिहता श्रेणी ह्योषा यस्याः प्रमुच्यते । द्वितीयां क्रमशः प्राप्य स्वर्गलोके महीयते॥३२६॥ तृतीयमपि वक्ष्यामि वानप्रस्थाश्रमं शृणु । गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः॥३२७॥ अपत्यस्यैव चापत्यं वनमेव तदाश्रयेत् । गृहस्थब्रतखिन्नानां वानप्रस्थाश्रमौकसाम्॥३२८॥ श्रूयतां भीष्म भद्रं ते सर्वलोकाश्रयात्मना । दीक्षापूर्वं निवृत्तानां पुण्यदेशनिवासिनाम् ॥३२९॥ प्रज्ञाबलयुजां पुसां सत्यशोचक्षमावतां । तृतीयमायुषो भागं वानप्रस्थाश्रमे वसन्॥३३०॥ तानेवाग्नीन्परिचरेद्यजमानो दिवौकसः । नियतो नियताहारो विष्णुभक्तिप्रसक्तिमान् ॥३३९॥ तदाम्निहोत्रमात्राणि यज्ञांगानि च सर्वशः । अकृष्टं वै ब्रीहियवं नीवारं विघसानि च ॥३३२॥ भाई पिता के समान होते है, पत्नी के पुत्र अपने शरीर स्वरूप हैं ॥३१८॥ दास वर्ग, शरीर के स्वामी होते हैं और पुत्री परम कृपणों की स्वामिनी होती है । अतएव ये सब यदि कुछ कह भी दें तो उसे वर्दास्त कर लेना चाहिए क्रोध नहीं करना चाहिए ॥३१९॥ गृहकर्म में लगे हुए विद्वान् को धर्मनिष्ठ तथा क्लेश से रहित होना चाहिए । धर्मज्ञ को बहुत कार्यो को नहीं प्रारम्भ करना चाहिए । वह कुछ ही कार्यो को करे ॥३२०॥। गृहस्थ की तीन वृत्तियाँ बतलायी गयी हैं उनमें सबसे बाद वाली वृत्ति (कापोती वृत्ति) श्रेष्ठ है । उसी तरह चारो आश्रमों की वृत्तियाँ बतलायी गयी हे॥३२१॥ उन आश्रमां के जो नियम बतलाये गये है कल्याण चाहने वालों को उन सबों का पालन करना चाहिए । कुम्भ धान्य के द्वारा, उंछ वृत्ति के द्वारा अथवा कापोती वृत्ति को अपनाने वालों के द्वारा ॥३२२॥ जिस राष्ट्र में उपर्युक्त नियमों का पालन किया जाता है, उस राष्ट्र की समृद्धि होती है । उन नियमों का पालन करने वाले अपने से पहले के दश पीढी तथा अपने से बाद के दश पीढी के पितरों को पवित्र बना देते हैं ॥३२३॥ कष्ट का अनुभव किए बिना यदि कोई गृहस्थ भी इस वृत्ति को अपनाता है वह भी भगवान् विष्णु के लोकों के समान लोकों में जाता है ॥३२४॥ अथवा जितेन्द्रिय गृहस्थों की इस प्रकार की गति वतलायी गयी है । जो नियम का पालन करने वाले गृहस्थ होते हैं, वे स्वर्ग लोक में जाते हैं ॥३२५॥ ब्रह्माजी के द्वारा कही गयी यह श्रेणी (विभाग) जिसका परित्याग कर देती है, वह क्रमशः दूसरी श्रेणी को प्राप्त करके स्वर्ग लोक में सम्मानित होता है ॥३२६॥ तीसरी श्रेणी जो वानप्रस्थ की श्रेणी है उसको भी में आपको बतलाता हुँ, आप सुनें । गृहस्थ जब यह देखे कि मेरे बाल पकने लग गये हैं ॥३२७॥ तथा अपने पुत्र के भी पुत्र (पौत्र) का भी मुख जब वह देख ले, तो उसे वन में ही चले जाना चाहिए । जो गृहस्थ ब्रत से खिन्न होकर तथा वानप्रस्थ आश्रम को अपनाने वालें ॥३२८॥ तथा जो सर्वलोकाश्रयी हे उसके भी त्रत को आप सुनें । पहले वानप्रस्थ की दीक्षा लेकर गार्हस्थ्य से निवृत हुए तथा पवित्र स्थान में रहने वाले ॥२२९॥ प्रकृष्ट ज्ञान सम्पन्न सत्य, शौच तथा क्षमा नामक गुण से युक्त पुरुषों को अपने जीवन के तीसरे भाग में वानप्रस्थ आश्रम में निवास करना चाहिए ॥३३०॥ वानप्रस्थाश्रम में उन्ही अग्नियों का सेवन करे
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