Srishti Khanda Extracted Page 205
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-205
Sanskrit Original
स्वकर्मजीविनो दांता: क्रियावंतस्तपस्विनः । तेषां हव्यं च कव्यं चाप्यर्हणार्थं विधीयते ॥३०६॥ नश्चरै स्संप्रयातस्य स्वधर्मापगतस्य च । अपविद्धाप्निहोत्रस्य गुरोर्वालीककारिणः ॥३०७॥ असत्याभिनिवेशस्य नाधिकारोस्ति कर्मणोः। संविभागोऽत्र भूतानां सर्वेषामेव शिष्यते ॥३०८॥ तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना । विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं चामृतभोजनः ॥३०९॥ अमृतं यज्ञशेषंस्याद्धोजनं हविषा समम् । संभुक्तशेषं योश्वति तमाहुर्विधसाशिनम् ॥३१०॥ स्वदारनिरतो दान्तो दक्षोत्यर्थं जितेद्रियः । ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमातुलातिथिसंहतैः ॥३११॥ वृद्धबालातुरै वैद्चे ज्ञतिसंबंधिबांधवै:। मात्रा पित्रा च जामात्रा भ्रात्रापुत्रेण भार्यया ॥३१२॥ दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् । एतान्विमुच्य संवादान्सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ९ ३॥ एतैर्जितैस्तु जयति सर्वलोकान्न संशयः । आचार्योब्रह्मलोकेशः प्राजापत्यप्रभुः पिता ॥३९४॥ अतिथिः सर्वलोकेश ऋत्विग्वेदाश्रयः प्रभुः । जामाताप्सरसां लोके ज्ञातयोवैश्वदेविकाः॥३९५॥ संबंधिबांधवादिक्षु पृथिव्यां मातृमातुलौ। वृद्धबालातुराश्चैव आकाशे प्रभविष्णवः ॥३९६॥ पुरोधा ऋषिलोकेशः संश्रितास्साध्यलोकपाः । अश्विलोकपतिवैंद्यो भ्राता तु वसुलोकपः ॥३९७॥ चंद्रलोकेश्वरी भार्या दुहिताप्सरसां गृहे। भ्राताज्येष्ठः समः पित्रा भार्यापुत्रस्वका तनुः ॥३९८॥ I हव्य एवं कव्य का वहन करने वाले अतिथि पूज्य बतलाये गये हैं । जो गृहस्थ वेदविद्या व्रत स्नात होते हैं वेद पारंगत वेदिक होते हैं ॥३०५॥ आपने कर्मों के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं तथा अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं, नित्य नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करते हैं । तपस्वी होते हैं उन सबों के द्वारा प्रदत्त हव्य एवं कव्य समादरणीय होते हें ॥३०६॥ नश्वर वस्तुओं से अपना निर्वाह करने वाले, अपने धर्म का पालन नहीं करने वाले, जिसने अग्निहोत्र का परित्याग कर दिया है तथा गुरु से मिथ्या व्यवहार करता हें ॥३०७॥ जिसका असत्य भाषण में ही अभिनिवेश होता है, ऐसे गृहस्थ ब्राह्मण का कर्मों में अधिकार नहीं होता है । समस्त संसारी व्यक्तियों के लिए जीवन के संविभाग को बतलाया गया है ॥३०८॥ जो लोग भोजन नहीं बनाते हैं, ऐसे ब्रह्मचारी तथा संन्यासियों को गृहस्थ को चाहिए कि भोजन दे । गृहस्थ ब्राह्मण को विघशासी तथा अमृतभोजी होना चाहिए । यज्ञ से बचा हुआ अन्न अमृत होता है और उसका भोजन हविष्य के भोजन के समान होता है । अतिथियों आदि के खाने से बचे हुए को जो खाता है उसे विघशासी कहते हैं ॥३१०॥ गृहस्थ को अपनी पत्नी से ही स्नेह करना चाहिए, उसे दान्त (जितेन्द्रिय) दक्ष (कर्मो के सम्पादन में निपुण) तथा अत्यन्त जितेन्द्रिय होना चाहिए । उसे कभी भी ऋत्विक, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि समूह, वृद्ध, बालक, रोगी, वैद्य, दायाद, सम्बन्धीजन, बन्धुवर्ग, माता, पिता, दमाद, भाई, पुत्र, पत्नी ॥३११-३१२॥ पुत्री, दासवर्ग से विवाद नहीं करना चाहिये । इन सबों के साथ संवाद रखने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥३१३॥ वह अपने इन संबन्धियो को जित लेता है वह सभी लोगों पर विजय प्राप्त कर लेता है । गृहस्थ के ब्रह्मलोक के स्वामी आचार्य होते हैं, पिता प्रजापति लोक के स्वामी होते हैं ॥३१:४॥ अतिथि सभी लोकों के स्वामी होते हैं, ऋत्विक वेद के स्वामी होते हैं । जामाता (दामाद) अप्सरालोक के स्वामी होते हैं, दायाद विश्वेदेव लोक के स्वामी होते हैं ॥३१५॥ संबन्धीजन तथा बांधव दिशाओं के स्वामी होते हैं, माता और मामा पृथिवी के स्वामी होते हैं, वृद्ध, बालक एवं आतुररोगी आकाश के स्वामी होते हैं ॥३१६॥ पुरोहित ऋषि लोक के स्वामी होते हैं, दास वर्ग साध्य लोक के स्वामी होते हैं, वैद्य अश्विनी कुमार लोक के स्वामी हैं, भाई वसुलोक के स्वामी होते हैं ॥३१७॥ पत्नी चन्द्रलोक की स्वामिनी होती है, पुत्री अप्सराओं के गृह की स्वामिनी होती है । बड़े
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