Srishti Khanda Extracted Page 204
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-204
Sanskrit Original
इति सर्व च विज्ञाप्य निवेद्य गुरवे धनम् । कुर्यात्कृतं च तत्सर्वमाख्येयं गुरवे पुनः ॥२९२॥ यांस्तु गंधान्रसान्वापि ब्रह्मचारी न सेवते। सेवेततान्समावृत्य इति धर्मेषु निश्चयः॥२९३॥ ये केचिद्दिस्तरेणोक्ता नियमा ब्रह्मचारिणः । तान्सर्वाननुगृह्णीयाद्धक्तश्शिष्यश्च वै गुरोः:॥२९४॥ स एवं गुरवे प्रीतिमुपकृत्य यथाबलम् । अग्राम्येष्वाश्रमेष्वेवं शिष्यो वर्तेत कर्मणा ॥२९५॥ वेदवेदौ तथा वेदान्वेदार्थाश्च तथाद्विज: । भिक्षाभुगप्यधः शायी समधीत्य गुरोर्मुखात् ॥२९६॥ वेदब्रतोपयोगी च चतुर्थाशेन योगतः । गुरवे दक्षिणां दत्वा समावर्तेद्य॒थाविधि ॥२९७॥ घर्मान्वितैर्युतोदारै रम्रीनावाह् पूजयेत् । द्वितीयमायुषो भागं गृहमेधी समाचरेत् ॥२९८॥ गृहस्थ वृत्तयः पूर्व चतस्त्रो मुनिभिः कृताः। कुसूलथान्या प्रथमा कुंभीधान्याद्वितीयका ॥२९९॥ अश्वस्तनी तृतीयोक्ता कापोत्यथ चतुर्थिका । तासां परापरा श्रेष्ठा धर्मतालोकजित्तमा ॥३००॥ षट्कर्मवर्तकस्त्वेकस्त्रिभिरन्यः प्रसर्पते। द्वाभ्यां चैव चतुर्थस्तु द्विजः सब्रह्मणि स्थित:॥३ ० १॥ गृहमेधिव्रतादन्यन्महत्तीर्थ नचक्षते । नात्मार्थे पाचयेदन्नं न वृथाघातयेत्पशुम् ॥३ ० २॥ प्राणीवा यदि वा प्राणी संस्काराद्यज्ञमर्हति । नदिवा प्रस्वपेज्जातु न पूर्वापररात्रयोः ॥३०३॥ नभुंजीतांतरा काले नानृतं तु वदेदिह। नचास्याश्नन्वसेद्विप्रो गृहे कश्चिदपूजितः ॥३०४॥ तथास्यातिथयः पूज्या हव्यकव्यवहाः स्मृता: । वेदविद्याव्रतस्नाता श्रोत्रिया वेदपारगाः ॥३ ० ५॥ मेंने यह कार्य कर लिया है और अब यह कार्य करूंगा ॥२९१॥ इसतरह से सारी बातें बतलाकर तथा जो उसको धन मिला हो उसको गुरु को देकर उसके बाद अपने द्वारा किए हुए कार्यों को गुरु को बतलाए ॥२९२॥ जिन गन्धों और रसों का सेवन ब्रह्मचारी को नहीं करना चाहिए उन सबों का सेवन उसे समावर्तन संस्कार के बाद ही करना चाहिए ॥२९३॥ गुरु के भक्त शिष्य को उन समस्त नियमों का पालन करना चाहिए, जो नियम ब्रह्मचारी के लिए वतलाये गये हैं ॥२९४।॥ अपनी शक्ति के अनुसार गुरु को प्रसन्न करके शिष्य को चाहिए कि वह अग्राम्य आश्रमों में ही अपने कर्मो को सम्पन्न करे ॥२९५॥ शिष्य गुरु के मुख से एक वेद को अथवा दो वेदो को या तीन वेदों को वेदार्थ के साथ अध्ययन करे । वेदाध्ययन काल में वह भिक्षाटन के ही अन्न को खाये तथा पृथिवी पर सोये ॥२९६॥ उसके बाद वेदब्रत के लिए उपयोगी चतुर्थांश दक्षिणा गुरु को प्रदान करके विधिपूर्वक समार्वतन संस्कार कराये। २९७॥। वह धर्मानुकूल पत्नियों के साथ अग्नियों का आवाहन करके पूजन करे । वह अपने जीवन के दूसरे भाग को गृहमेधी (गृहस्थ) बनाकर बिताये ॥२९८॥ मुनियों ने गृहस्थ के लिए चार प्रकार की वृत्तियों को बतलाया है । पहली वृत्ति कुसूलधान्या (कोठिला भर अन्न रखने की) है । दूसरी वृत्ति कुम्भी धान्या (घड़ा भर अन्न रखने की) है ॥२९९॥ तीसरी वृत्ति अश्वस्तनी (उतना ही अन्न अपने पास रखना जो कल के लिए न बचे) और चौथी वृत्ति कापोती (प्रतीदिन माँगकर लाये और उसका उपयोग करे) है । इन चारो वृत्तियों में उत्तरोत्तर वृत्ति धर्मानुसार श्रेष्ठ हैं तथा लोकों को जित लेने वाली है ॥३००॥ उनमें षट्कर्म करने वाला ब्राह्मण एक वृत्ति को अपनाता है, उससे भिन्न तीन वृत्तियों को अपनाते है, या दो वृत्तियों को अपनाते हैं । चौथी वृत्ति को अपनाने वाला ब्राह्मण ब्रह्म में स्थित होता है ॥३०१॥ गार्हस्थ्य से बढकर कोई भी दूसरा साधन पवित्र करने वाला नहीं है केवल अपना पेट भरने के लिए अन्न नहीं पकाना चाहिए और व्यर्थ ही पशु को न मारे ॥३०२॥ प्राणी हो अथवा प्राणहीन हो उसका संस्कार पूर्वक यज्ञ करे। गृहस्थ कभी भी दिन में न सोए किञ्च पूर्वसंध्या तथा पर संध्या के भी समय न सोये ॥३०३॥ वह दिन में ही भोजन करे, कभी झूठ न बोले । वह घर में आये हुए अतिथि की पूजा किए बिना कभी भी भोजन न करे ॥३०४॥ इसके
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know