Srishti Khanda Extracted Page 203
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-203
Sanskrit Original
XE श्रीपदामहापुराण कृते द्वादशभिर्वषै स्रेतायां हायनेन तु। मासेन द्वापरे भीष्म अहोरात्रेण तत्कलौ ॥२७८॥ फलं संप्राप्यते लोके क्षेत्रेस्मिस्तीर्थवासिभिः । इत्येवं देवदेवेन पुरोक्तं ब्रह्मणा मम ॥२७९॥ नातः परतरं किचित् क्षेत्रमस्तीह भूतले। तस्मात्सर्वप्रयत्मेनारण्यमेतत्समाश्रयेत् ॥२८०॥ गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थाथ भिक्षुकः । यथोक्तकारिणः सर्वे गच्छंति परमां गतिम् ॥२८१॥ एकस्मिन्नाश्रमे धर्म योऽनुतिष्ठेद्यथाविधि । अकामद्वेषसंयुक्तः स परत्र महीयते ॥२८२॥ चतुष्पथाहि निःश्रेणी ब्रह्मणेह प्रतिष्ठिता। एतामाश्रित्य निश्रेणी ब्रह्मलोके महीयते॥२८३॥ आयुषोऽपि चतुभगं ब्रह्मचार्यनसूयक: । गुरौ वा गुरुपुत्रे वा वसेद्धमार्थ कोविदः ॥२८४॥ कर्मातिरेकेण गुरोरध्येतव्यं बुभूषता । दक्षिणानां प्रदापी स्यादाहूतो गुरुमाश्रयेत् ॥२८५॥ जघन्यशायी पूर्व॑ स्यादुत्थायी गुरुवेश्मनि। यच्च शिष्येण कर्त्तव्यं कार्यमासेवनादिकम् ॥२८६॥ कृतमित्येव तत्सर्वं कृत्वा तिष्ठेत्तु पार्श्वतः । किंकरः सर्वकारी च सर्वकर्म सुकोविदः ॥२८७॥ शुचिर्दक्षो गुणोपेतो ब्रूयादिष्टमथोत्तरम् । चक्षुषा गुरुमव्यग्रो निरीक्षेत जितेंद्रियः ॥२८८॥ नाभुक्तवति चाश्नीयादपीतवति नो पिबेत् । नतिष्ठति तथासीत न सुप्तेनैवसंविशेत् ॥२८९॥ उत्तानाभ्यां च पाणिभ्यां पादावस्यमृदुस्पृशेत् । दक्षिणं दक्षिणेनैव सव्यं सव्येन पीडयेत् ॥२९०॥ अभिवाद्य गुरु ब्रूयादभिधां स्वां ब्रुवन्निति। इदं करिष्ये भगवन्निदं चापि मया कृतम् ॥२९९॥ करता है ॥२७६-२७७॥। सत्ययुग में बारह वर्षो तक, त्रेता में एक वर्ष तक, द्वापर युग में एक मास तक तीर्थ में निवास करने से जिस फल को प्राप्त किया जा सकता है, उस फल को कलियुग में एक दिन और एक रात्रि तक इस तीर्थ में निवास करके तीर्थवासी प्राप्त करते हैं । इस बात को देवाराध्य ब्रह्माजी ने मुझे बतलाया था ॥२७९॥ भूलोक में इस तीर्थ से बढकर कोई भी दूसरा तीर्थ नहीं है, अतएव हर प्रकार के प्रयत्न के द्वारा इस तीर्थ में निवास करना चाहिए ।॥२८०॥ गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासी, उपर्युक्त प्रकार से इस तीर्थ में रहने वाले सबके सब मोक्ष को प्राप्त करते हैं ॥२८१॥ जो व्यक्ति कामना तथा द्वेष से रहित होकर किसी एक आश्रम में स्थित रहकर उपर्युक्त प्रकार से धर्म का अनुष्ठान करता है, वह परलोक में पूजित होता है ॥२८२॥ यहाँ पर ब्रह्माजी ने श्रेणी रहितचतुष्पथ की स्थापना की है, इस निःश्रेणी को अपना आश्रय बनाने वाला ब्रह्मलोक मे प्रतिष्ठित होता है।२८३॥ ब्रह्मतत्त्व के ज्ञाता पुरुष को चाहिये कि आयु के चतुर्थ भाग तक बिना किसी द्वेष के अपने गुरु अथवा गुरु के पुत्र की सेवा करते हुए ब्रह्मचारी बनकर रहे ॥२८४॥ कर्मों को करने से बचे हुए समय में ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से गुरु से अध्ययन करना चाहिए उसके बाद आचार्य को अभिप्रेत दक्षिणा प्रदान करे और गुरु के द्वारा बुलाये जाने पर उनके सन्रिकट जाना चाहिए ॥२८५॥। वह गुरु के घर में जमीन पर सोये और गुरु से पहले जग जाय; शिष्य के द्वारा किए जाने वाले कार्यो को सम्पादित करे, गुरु की सेवा करे ॥२८६॥ अपने सभी करने योग्य कार्यों को करके वह गुरु के सन्निकट में बैठे, उसे हर प्रकार से गुरु का सेवक होना चाहिए और समस्त धर्मो को करना चाहिए ॥२८७॥ उसे पवित्र, निपुण और गुरु के पूछने पर उचित उत्तर देने वाला होना चाहिए । वह जितेन्द्रिय रहकर अपने नेत्रों से शान्ति पूर्वक गुरु का दर्शन करे ॥२८८॥ गुरु के भोजन करने से पहले न तो भोजन करे और न तो गुरु के जल पीने से पहले पानी पिये । गुरु के बैठे बिना बैठे भी नहीं और न तो गुरु के सोने से पहले सोये ॥२८९॥ वह अपने दोनों हथेली को ऊपर की ओर करके कोमलता पूर्वक गुरु के चरणों का स्पर्श करे । वह दाहिने हाथ से दायें पैर का तथा बायें हाथ से बायें पैर का स्पर्श करे ॥२९०॥ गुरु को प्रणाम करके वह अपना नाम बतलाये और कहे भगवन्
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