Srishti Khanda Extracted Page 202
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-202
Sanskrit Original
कलौ युगे कृतार्थास्ते क्लिश्यंत्यन्ये निरर्थका: । रात्रौ करोति यत्पापं नर:पंचभिरिंद्रिये: ॥२६४॥ कर्मणा मनसा वाचा कामक्रोधवशानुगः । प्रातः सवनमासाद्य पुष्करे तु पितामहम् ॥२६५॥ अभिगम्य शुचिर्भूत्वा तस्मात्पापात्प्रमुच्यते। उदयेर्कस्य चारभ्य यावददर्शनमूर्ध्वगम् ॥२६६॥ मानसाख्ये प्रसंचिंत्य ब्रह्मयोगे हरेदघम् । दृष्टवा विरिंचिं मध्याह्ने नरः पापात्प्रमुच्यते ॥२६७॥ मध्याह्वास्तमयान्तं यदिंद्रियैः पापमाचरेत् । पितामहस्य संध्यायां दर्शनादेव मुच्यते ॥२६८॥ शब्दादीन्विषयान्सर्वान्भुंजानोपि सकामतः । यः पुष्करे ब्रह्मभक्तो निवसेत्तपसि स्थितः ॥२६९॥ पुष्करारण्यमध्यस्थो मिष्टन्नास्वादभोजनः । त्रिकालमपि भुंजानो वायुभक्षसमो मतः ॥२७०॥ वसंति पुष्करे ये तु नराः सुकृतकर्मिणः। ते लभन्ते महाभोगान् क्षेत्रस्यास्य प्रभावतः॥२७१॥ यथा महोदधे स्तुल्यो न चान्योस्ति जलाशयः । तथा वै पुष्करस्यापि समंतीर्थं न विद्यते ॥२७२॥ पुष्करारण्यसदृशं तीर्थ नास्त्यधिकं गुणैः । अथतेन्याऱ्ग्रवक्ष्यामि क्षेत्रे येस्मिन् व्यव स्थिताः॥२७३॥ विष्णुना सहिताः सर्व इंद्राद्याश्च दिवौकसः । गजवक्त्रः कुमारश्च रेवंतः सदिवाकरः॥२७४॥ शिवदूती तथा देवी कन्या क्षेमंकरी सदा । अलं तपोभिर्नियमैः सुक्रियार्चनकारिणाम् ॥२७५॥ ब्रतोपवासकर्माणि कृत्वान्यत्र महांत्यपि । ज्येष्ठे तु पुष्करारण्ये यस्तिष्ठति निरुद्यमः ॥२७६॥ लभते सर्वकामिवं योऽत्रैवास्ते द्विजः सदा । पितामहसमं याति स्थानं परममव्ययम् ॥२७७॥ हो पाती है । किन्तु जो लोग पुष्कर में रहकर ब्रह्माजी की अर्चना करते हैं ॥२६३॥ उनका कलियुग में जीवन सफल हो जाता हे । दूसरे लोग तो व्यर्थ ही क्लेश का अनुभव करते हैं । मनुष्य रात्रि में अपनी पाश्लो इन्द्रियों से जो पाप करते हैं ॥२६४॥ उन कामी तथा क्रोधी मनुष्यों का मन, वाणी तथा कर्म से किए गये प्रातःकाल पवित्र होकर तथा जल लेकर पुष्कर तीर्थ में ब्रह्माजी का दर्शन करने से समस्त पापों से मुक्त हो जाता है । सूर्योदय काल से लेकर दोपहर होने तक ॥२६५-२६६॥ उनके द्वारा किए गये पाप ब्रह्माजी का चिन्तन (ध्यान) करने से विनष्ट हो जाते हैं। दोपहर में ब्रह्माजी का दर्शन करने से भी वे पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥२६७॥ मध्याह्न से लेकर सूर्यास्त पर्यन्त वहअपनी इन्द्रियों से जिन पापों को करता है, वह उन पापों से सायंकाल ब्रह्माजी का दर्शन करने से मुक्त हो जाता है॥२६८॥ कामना पूर्वक शब्दादि विषयों का भोग करने वाला भी व्यक्ति, पुष्कर तीर्थ में ब्रह्माजी की भक्ति से निवास करते हुए तपस्या करता है ॥२६९॥ पुष्करारण्य में रहकर अच्छे स्वाद से युक्त भोज्य पदार्थो का अपने मनोनुकूल मोजन करने वाले पुरुष को वही फल प्राप्त होता है जो फल अन्यत्र वायु पीकर तपस्या करने वाले को प्राप्त होता हे ॥२७०॥ जो पुण्यवान्. व्यक्ति पुष्कर तीर्थ में निवास करते हैं, वे इस क्षेत्र के प्रभाव से महान् भोगों को प्राप्त करतेहैं ॥२७१॥ जिस तरह समुद्र के समान दूसरा कोई जलाशय नहीं है, उसीतरह पुष्कर के समान कोई दूसरा तीर्थ भी नहीं है ॥२७२॥ पुष्कर से बढकर अधिक गुणों वाला कोई दूसरा तीर्थ नहीं है । अब में इस क्षेत्र में रहने वाले देवताओं को बतलाता हूँ ॥२७३॥ यहाँ पर विष्णु भगवान् के साथ इन्द्र आदि समस्त देवताओं का निवास है । गजवक्त्र, कुमार, रेवन्त, सूर्य, शिवदूती तथा कल्याणकारिणी कन्यादेवी (सावित्री देवी) इन देवताओं का यहाँ सदा निवास बना रहता है । अन्य तीर्थो में रहकर तपस्या, नियम का पालन, तथा अर्चना करने से कोई लाभ नहीं है ॥२७४-२७५॥ अन्य तीर्थ में बड़े-से-बड़े व्रत, उपवास आदि कर्मो को करने से जिन फलों की प्राप्ति होती है । उन फलों को सदा पुष्कर तीर्थ में रहकर किसे भी उद्यम को किए बिना भी पुष्करारण्य में रहने वाला ब्राह्मण प्राप्त कर लेता है और मृत्यु के पश्चात् पितामह (ब्रह्माजी) के ही समान अव्यय स्थान को प्राप्त
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know