Srishti Khanda Extracted Page 201
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-201
Sanskrit Original
भीष्म उवाच आचाराः परमाधर्माः क्षेत्रधर्मपरायणा: ॥२५१॥ स्वधर्माचारनिरता जितक्रोधा जितेंद्रियाः । ब्रह्मलोकं ब्रजंतीति नैतच्चित्रं मतं मम ॥२५२॥ असंशयं च गच्छंति लोकानन्यानपि द्विजाः । विना पद्मोपवासेन तथैव नियमेन च ॥२५३॥ स्तरियोम्लेछाश्च शूद्राश्च पक्षिणः पशवो मृगाः। मूका जडान्धबधिरास्तपोनियमवर्जिताः ॥२५४॥ तेषां वद गति विप्र पुष्करे ये त्ववस्थिताः। पुलस्त्य उवाच स्त्रियो म्लेच्छाश्च शूद्राश्च पशवः पक्षिणो मृगाः ॥२५५॥ पुष्करे तु मृता भीष्म ब्रह्मलोकं ब्रजति ते । शरीरैर्दिव्यरूपैस्तु विमानै रविसप्रभैः ॥२५६॥ दिव्यव्यूहसमायुक्तै: सुवर्णवरकेतनैः । सुवर्णवज्रसोपानमणिस्तंभवि भूषितैः ॥२५७॥ सर्वकामोपभोगाढ्यैः कामगैःकामरूपिभिः । नानारसाढ्यं गच्छति सत्रीसहस्रसमाकुलाः ॥२५८॥ ब्रह्मलोकं महात्मानो लोकानन्यान्यथैप्सितान्। ब्रह्मलोकाच्च्युताश्चापि क्रमाद्वीपेषु यांति ते ॥२५९॥ कुले महित विस्तीर्णे धनी भवति स द्विजः। तिर्यग्योनिगता ये तु सर्पकीटपिपीलिकाः ॥२६०॥ स्थलजा जलाश्चैव स्वेदांडोद्धिज्जरायुजाः । सकामा वाप्यकामा वा पुष्करे तु वने मृताः॥२६९॥ सूर्यप्रभविमानस्था ब्रह्मलोक॑ प्रयांति ते । कलौ युगे महाघोरे प्रजाः पापसमीरिताः ॥२६२॥ नान्येनास्मिन्नुपायेन धर्मः स्वर्गश्चलभ्यते। वसन्ति पुष्करे ये तु ब्रह्मार्चनरता नराः ॥२६३॥ OO OO —— कहा-- क्षत्रधर्म का पालन करने वालों का सबसे बड़ा धर्म सदाचार ही होता है ॥२५१॥ अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले, क्रोध को जीत लेने वाले तथा जितेन्द्रिय पुरुष ब्रह्माजी के लोक में जाते हैं, इसके विषय में मुझे कोई भी आश्चर्य नहीं प्रतीत होता है । वे दूसरे लोकों में जाते हैं, इसके विषय में भी कोई सन्देह नहीं है, किन्तु जो जीव पुष्कर क्षेत्र में रहकर व्रतोपवास नहीं करते हैं, तथा नियमों का पालन नहीं करते हैं, ऐसे स्री, म्लेच्छ, शूद्र, पक्षीगण, पशुगण, मृगगण, मूक, जड, अन्धे, बहरे जीव जो नियमका कभी पालन नहीं करते हैं ॥२५२-२५४॥ पुष्कर क्षेत्र में रहने वाले उन जीवों को प्राप्त होने वाली गति को आप मुझे बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- स्त्रियां, म्लेच्छ, शूद्र, पशु, पक्षी, मृग ॥२५५॥ हे भीष्म ! ऐसे जीव जो पुष्कर क्षेत्र में शरीर त्याग करते हैं वे दिव्य रूप से युक्त शरीर धारण करके, सूर्य के समान देदीप्यमान दिव्य समूहों से सम्पन्न, सुवर्ण रचित पताकाओं से सुशोभित, जिनमें सुवर्ण तथा हीरों से निर्मित सीढियाँ होती हैं, मणि निर्मित स्तम्भ होते हैं, समस्त कमनीय भोगों से युक्त, इच्छानुसार चलने वाले, इच्छा के अनुसार रूप बना लेने वाले, दिव्य विमानों से ब्रह्माजी के लोक में जाते हैं। वे हजारों स्त्रियों के साथ वहाँ अनेक प्रकार से परिपूर्ण ब्रह्माजी के लोक में जाते हैं ॥२५६-२५८॥ वे सब ब्रह्मलोक में तथा अपनी इच्छा के अनुसार दूसरे लोकों में भी जाते हैं जब उनका ब्रह्मलोक से पतन होता है, तब वे क्रमशः द्वीपों में जाकर जन्म लेते हें ॥२५९॥ वहाँ उनका महान् तथा विशाल वंश वाले कुल में जन्म होता है । तिर्यक् योनि के जो सर्प, कीड़े, चींटी इत्यादि जीव हैं ॥२६०॥ भूमि पर उत्पन्न होने वाले, जल में उत्पन्न होने वाले, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज (वृक्ष आदि) जरायुज (मनुष्य आदि) सकाम, अथवा निष्काम जीव जो पुष्कर क्षेत्र में अपने शरीर का परित्याग करते हैं ॥२६१॥ वे सूर्य की कान्ति से युक्त विमान पर बैठकर ब्रह्मलोक में जाते हैं । अत्यन्त भयङ्कर कलियुग में प्रजा पापिनी हो जाती है ॥२६२॥ अतएव इस कलियुग में किसी भी दूसरे उपाय से स्वर्ग की प्राप्ति नहीं
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