Srishti Khanda Extracted Page 200

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-200

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Sanskrit Original

हॅसयुक्तैस्ततो यांति विमानैरर्कसप्रभैः। नानारत्नसुवर्णाढयेईढैर्गधाधिवासिते: ॥२३९॥ अनौपम्यगुणैरन्यैरप्सरोगीतनादितैः । पताकाध्वजविन्यस्तै नाना घण्टा निनादितैः ॥२४०॥ ब्रह्माश्चर्यसमोपेतैः क्रीडाविज्ञानशालिभिः । सुप्रभे गुणसंपन्नै र्मयूरवरवाहिभिः ॥२४९॥ ब्रह्मलोके नरा धीरा रमंतेऽनाशके मृताः । तत्रोषित्वा चिरं कालं भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्।२४२॥ धनी विप्रकुले भोगी जायते मर्त्यमागतः । कारीषीं साश्येद्यस्तु पुष्करे तु वने नरः ॥२४३॥ सर्वलोकान्परित्यज्य ब्रह्मलोकं स॒ गच्छति । ब्रह्मलोके वसेत्तावद्यावत्कल्पक्षयो भवेत् ॥२४४॥ नैव पश्यति मर्त्य॑ हि क्लिश्यमानं स्वकर्मभिः । गतिस्तस्याप्रतिहता तिर्यगूर्ध्वमघस्तथा ॥२४५॥ सपूज्यः सर्वलोकेषु यशोविस्तारयन्वशी । सदाचारविधिप्रज्ञः सर्वेद्रियमनोहरः ॥२४६॥ नृत्यवादित्रगीतज्ञः सुभगः प्रियदर्शनः । नित्यमम्लानकुसुमो दिव्याभरणभूषितः ॥२४७॥ नीलोत्पलदलश्यामो नीलकुंचितमूर्द्दजः । अजघन्याः सुमध्याश्च सर्वसौभाग्यपूरिताः ॥२४८॥ सर्वैश्वर्यगुणोपेता यौवने नातिगर्विताः। स्त्रियः सेवंति तत्रस्थाः शयने रमयंति च ॥२४९॥ वीणवेणुनिनादैश्च॒ सुप्तः संप्रतिबुध्यते । महोत्सवसुखं भुक्ते दुःप्राप्यमकृतात्मभिः॥२५०॥ प्रसादाहेवदेवस्य ब्रह्मणः शुभकारिणः । रुद्र के साथ श्रीत्रह्माजी का साक्षात् दर्शन करते हें ॥२३७॥ पुष्कर तीर्थ के वन में कोई शूद्र भी मनुष्य उपवास करके यदि अपना प्राण त्याग कर देते हैं तो वे अनेक प्रकार के रत्नों तथा सुवर्ण बहुल, अत्यन्त सुगन्धियों से सुगन्धित, दूसरे अनुपमेय गुणों से युक्त, अप्सराओं के गीत ध्वनि से युक्त, ध्वजा एवं पताका से युक्त, विविध घण्टाओं की ध्वनि से ध्वनित, अनेक आश्चर्यो से युक्त, क्रीडा विज्ञान से सुशोभित सुन्दर कान्ति वाले, गुणों से युक्त श्रेष्ठ मयूरों द्वारा वहन किए जाने वाले, हंसों से युक्त विमान के द्वारा वहन किए जाने वाले सूर्य की कान्ति वाले विमान से ब्रह्माजी के लोक में जाते हैं । अनाशक (उपवास ब्रत) से मरने वाले धीर पुरुष ब्रह्मलोक में आनन्दानुभव करते हैं । उस लोक में चिरकाल तक रहकर तथा अपने मनोऽनुकूल भोगो को भोगकर ॥२३८-२४२॥। मर्त्यलोक में आकर धनी ब्राह्मण के वंश में भोगों को भोगने वाले के रूप में जन्म लेते हैं ।पुष्कर वन में जो मनुष्य कारीषी विद्या की साधना करता है ॥२४३॥ वह मृत्यु के पश्चात् सभी लोकों का परित्याग करके ब्रह्मलोक में जाता है । वह ब्रह्मलोक में तब तक निवास करता है, जब तक की कल्प की समाप्ति नहीं हो जाती है ॥२४४॥ वह किसी भी ऐसे मनुष्य को नहीं देखता है जो अपने कर्मो के फलस्वरूप कष्ट का अनुभव कर रहा हो । उसकी गति तिर्यक् (तिरछा) ऊपर तथा नीचे की ओर बिना किसी रोक-टोक के होती है ॥२४५॥ वह जितेन्द्रिय पुरुष अपने यश का विस्तार करते हुए सभी लोकों में पूजित होता है । वह सदाचार विधि का विशेष ज्ञाता होता, उसकी सभी इन्द्रियाँ मनोहर होती हैं ॥२४६॥। वह नृत्य, वाद्य तथा गीत का ज्ञाता हो जाता है; देखने में वह अत्यन्त मनोहर होता है वह कभी भी नहीं कुम्हलाने वाले पुष्पों से रचित दिव्य अलङ्कारं से अलङ्कृत होता हैं ॥२४७॥ उसका शरीर नील कमल दल के समान श्याम वर्ण का होता है । उसके केश काले धुंघराले होते हैं । अत्यन्त सुन्दर शरीर वाली तथा सभी प्रकार के सौभाग्य से सम्पन्न ॥२४८॥ समस्त ऐश्वर्या तथा समस्त गुणों से युक्त, यौवन के गर्व से गर्वीली बनी हुयी, वहाँ पर रहने वाली रमणियाँ उसकी सेवा करती हैं ओर उसको शय्या पर रमण कराती है ॥२४९॥ प्रातःकाल वह वीणा तथा वेणु इत्यादि मङ्गलमय वाद्यों की ध्वनि सुनकर जगता है । वह महापुरुषों के साथ महोत्सव के सुख का अनुभव करता है ॥२५०॥ उसको समस्त सुख कल्याणकारी ब्रह्माजी की कृपा से ही प्राप्त होते हैं । भीष्मजी ने

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