Srishti Khanda Extracted Page 199
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-199
Sanskrit Original
हज श्रीपदामहापुराण गीतवादित्रनृत्यज्ञै गंधर्वाप्सरसां गणैः। अप्सरोभिः समायुक्तो वर्षकोटिशतान्यसौ ॥२२६॥ यस्य कस्यापि देवस्य लोकं यात्यनिवारित:। ब्रह्मणोनुग्रहेणैव तत्र तत्र विराजते ॥२२७॥ ब्रह्मलोकाच्च्युतश्चापि विष्णुलोकं स गच्छति । विष्णुलोकात्परिभ्रष्टोरुद्रलोकं स गच्छति ॥२२८॥ तस्मादपि च्युतः स्थानाद्द्वीपेषु स हि जायते ।स्वर्गेषु च तथान्येषु भोगान्भुक्त्वा यथेप्सितान्॥२२९॥ भुक्त्वैश्वर्यं ततस्तेषु पुर्नमर्त्येषु जायते । राजा वा राजपुत्रो वा जायते धनवान्सुखी ॥२३०॥ सुरूपः सुभगः कांतः कोर्तिमान्भक्तिभावितः। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा क्षेत्रवासिनः॥२३९॥ स्वधर्मनिरता राजन् सुवृत्ता श्विरजीविन: । सर्वात्मना ब्रह्मभक्ता भूतानुग्रहकारिणः ॥२३२॥ पुष्करे तु महाक्षेत्रे ये वसंति मुमुक्षवः । मृतास्ते ब्रह्मभवनं धिमानैर्याति शोभनैः ॥२३३॥ अप्सरोगणसंघुष्टैः कामगैः कामरूपिभिः । अथवासर्वदीप्ताम्नौ स्वशरीरं जुहोति यः ॥२३४॥ ब्रह्मध्यायी महासत्वःस ब्रह्मभवनं ब्रजेत् । ब्रह्मलोको क्षयस्तस्य शाश्वतो विभवैः सह ॥२३५॥ सर्वलोकोत्तमो रम्यो भवतीष्टार्थसाधकः । पुष्करे तु महापुण्ये प्राणान्ये सलिलेत्यजन् ॥२३६॥ तेषामप्यक्षयो भीष्म ब्रह्मलोको महात्मनाम् । साक्षात्पश्यंति ते देवं सर्वदुःखविनाशनम् ॥२३७॥ सर्वामरयुतं देवं रुद्रविष्णुगणैर्युतम्। अनाशके मृताशशूद्राः पुष्करे तु वने नराः ॥२३८॥ अभिलाषा नहीं करता है ॥२२३॥ हे भीष्म ! इस नियम से जो पुष्कर तीर्थ में निवास करता है, उसको जो गति प्राप्त होती है, उसे आप सुनें । मध्याह्न के सूर्य के समान प्रकाश वाले वेदिओं तथा स्तम्भों से सुशोभित, विमान से वह ब्रह्माजी का भक्त, अपनी इच्छा के अनुसार जाने वालों के लोक में जाता हैं । वह आकाश में दूसरे चन्द्रमा के समान सुशोभित होता है ॥२२४-२२५॥ गीत, वाद्य तथा नृत्य के अभिज्ञ गन्धर्वो एवं अपसराओं के समूह से तथा अप्सराओं के साथ सैकड़ों वर्षों तक ॥२२६॥ किसी भी देवता के लोक में बिना किसी अवरोध के जाता हे । वह ब्रह्माजी की कृपा का पात्र होने के कारण विभिन्न स्थानों के लोकों में विराजित होता है ॥२२७॥ जब ब्रह्मलोक से उसका पतन होता है तो वह विष्णुलोक में जाता है । जब उसका विष्णुलोक से पतन होता है तो वह रुद्रलोक में जाता है ॥२२८॥ उस स्थान से भी पतित होकर वह विभिन्न द्वीपों में जन्म लेता है । किञ्च अन्य स्वर्गो में अपने मन के अनुसार भोगो को भोगकर ॥२२९॥ उसके बाद उन लोकों के भोगों को भोग कर वह मनुष्य का जन्म प्राप्त करता है । वह राजा अथवा राजकुमार होता है । वह धनी तथा सुखी होता हे ॥२३०॥ वह सुन्दर रूप वाला, सुभग, कमनीय यशस्वी तथा भक्त हाता है । क्षेत्र में रहने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ॥२३१॥ हे राजन्! जो अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हैं तथा सुन्दर आचरण वाले होते हैं वे चिरंजीवी होते हैं, पूर्णरूप से ब्रह्माजी के भक्त वे जीवों पर कृपा करने वाले होते हैं ॥२३२॥ ऐसे जीव मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा से पुष्कर तीर्थ में निवास करते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् अप्सराओं के गीतों से गुञ्जित, स्वेच्छागामी तथा इच्छा के अनुसार रूप बनाने वाले सुन्दर विमान से ब्रह्माजी के लोक में जाते हैं । अथवा जो व्यक्ति जलती हुयी अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे देता है ।२३३-२३४॥ जो वेद का अध्ययन करता है तथा महा सत्त्व सम्पन्न होता है, वह भी अपनी आत्माहुति देकर ब्रह्मजी के लोक में चला जाता है । उसके लिए शाश्वत ऐश्वर्य से युक्त ब्रह्माजी का अक्षय लोक होता है ॥२३५॥ वह लोक सभी लोकों से उत्तम, रमणीय तथा अभिप्रेत अर्थ का साधक होता है । जिन लोगों ने महापुण्यवान् पुष्कर तीर्थ के जल में अपने शरीर का परित्याग कर दिया ॥२३६॥ हे भीष्म ! उन महात्माओं को भी अक्षय ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है । वे जीव सभी दुःखों का विनाश करने वाले सभी देवताओं के तथा विष्णु एवं
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