Srishti Khanda Extracted Page 198
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-198
Sanskrit Original
पुष्करारण्यमासाद्य ब्रह्मचर्याश्रमे स्थितः । अभ्यासेन तु वेदानां वसति म्रियतेपि वा ॥२११॥ मृतोऽसौ याति दिव्येन विमानेन स्वतेजसा । पूर्णचंद्रप्रकाशेन शशिवत्प्रियदर्शनः॥ २१ २॥ रुद्रलोकं समासाद्य गुहाकैः सह मोदते। ऐश्वर्य महदाप्रोति सर्वस्य जगतः प्रभुः॥२९३॥ भुक्त्वा युगसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते । प्रच्युतस्तु पुनस्तस्माद्रद्रलोकात्क्रमेण तु॥२१४॥ नित्यं प्रमुदितस्तत्र भुक्त्वा सुखमनामयम् । द्विजानां सदने दिव्ये कुले महति जायते ॥२१५॥ मानुषेषु सधर्मात्मा सुरूपो वाक्यतिर्भवेत्। स्पृहणीयवपुः सत्रीणाम्महा भोगपतिर्वली ॥ २ १ ६॥ बानप्रस्थसमाचारो ग्राम्यौषधिविवर्जितः । सर्वलोकेषु चाप्यस्य गति र्न प्रतिहन्यते ॥२१७॥ शीर्णपर्ण फलाहारः पुष्पमूलांबुभोजनः । कापोतेनाश्मकुट्टेन दंतोलूखलिकेन च॥२१८॥ वृत्युपायेन जीवेत चीरवल्कलवाससा । जटी त्रिषवणस्नायी त्यक्तदोषस्तु दंडवान् ॥२९९॥ कृच्छ्ब्रतपरो यस्तु श्वपचो यदि वा परः । जलशायी पंचतपा वर्षास्वभ्रावगाहकः ॥२२०॥ कीटकंटकपाषाणभूम्यां तु शयनं तथा। स्थानवीरासनरतः संविभागी दृढव्रतः ॥२२९॥ अरण्यौषधिभोक्ता च सर्वभूताभयप्रदः । नित्यं धर्मार्जनरतो जितक्रोधो जितेंद्रियः ॥२२२॥ ब्रह्मभक्तः क्षेत्रवासी पुष्करे वसते मुनिः । सर्वसंगपरित्यागी स्वारामो विगतस्पृहः ॥२२३॥ यश्चात्रवसते भीष्म श्रुणु तस्यापि या गतिः। तरुणार्कप्रकाशेन वेदिकास्तंभ शोभिना ॥२२४॥ ब्रह्मभक्तो विमानेन याति कामप्रचारिणाम् । विराजमानो नभसि द्वितीय इव चंद्रमाः ॥२२५॥ है, ऐसे रहते हुए यदि उसकी मृत्यु भी हो जाती हे तो ॥२१०-२११॥ मरने पर वह पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाश से युक्त, अपने तेज के द्वारा चन्द्रमा के समान देखने में अच्छा लगने वाला, दिव्य विमान से रुद्र के लोक में जाता है और वहाँ पर गुह्यकों के साथ आनन्दानुभव करता है । जगत् का स्वामी वह महान् ऐश्वर्य को प्राप्त करता है॥ २१२-२१३॥ वहाँ हजारों युगों तक आनन्दोपभोग करके वह रुद्र लोक में पूजित होता है, पुन: क्रमश: उस रुद्र लोक से पतन होने पर ॥२१४॥ वहाँ पर नित्य ही प्रमुदित रहते हुए निर्दोष सुख का भोग करके ब्राह्मणों के दिव्य घर में और उनके श्रेष्ठ वंश में जन्म लेता है ॥२१५॥ वह धार्मिक, सुन्दर रूप वाला तथा वाग्मी मनुष्य होता है । वह बलवान, खियों के द्वारा स्पृहणीय शरीर वाला तथा महाभोगों से युक्त होता है ॥२१६।। वह अन्त में वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करते हुए ग्राम्य अन्नों का परित्याग कर देता है । उसकी सभी लोकों में स्वच्छन्द गति होती है।२ १७॥ वह गिरे हुए पत्तों तथा फलों का आहार करता है तथा पुष्पों मूलों तथा जल का भोजन करता है । वह कापोत वृत्ति, अश्मकुट्ट वृत्ति (पत्थर से कूटकर खाने वाली वस्तुओं को खाना) अथवा दन्तोलूखलिक वृत्ति से॥२१८॥ जीवन निर्वाह करता है, तथा चीर एवं वल्कल वश्रों को धारण करता है । वह जटा धारण करता है, तीनों सन्ध्याओं में स्नान करता है एवं दोषों से रहित होकर दण्ड धारण करता है ॥२१९॥ यदि कोई चाण्डाल अथवा दूसरा कोई कृछ व्रत का पालन करता है, जल में सोता है, पञ्चाग्नि तापता है तथा वर्षा के दिन में मेधों के नीचे रहता है ॥२२०॥ कीड़ों, काँटों, पत्थर अथवा भूमि पर शयन करता है, सदा वीरासन से बैठता है, समय का विभाग करके कामों को करता है तथा दृढता पूर्वक अपने नियम का पालन करता है ॥२२१॥ वन्य अन्नों को खाता है, सभी भूतों (जीवों) को अभय प्रदान करता है, सदा धर्मार्जन करने में लगा रहता है, कभी क्रोध नहीं करता है तथा इन्द्रियों को वश में रखता है ॥२२२॥ ब्रह्माजी की भक्ति करता है, क्षेत्र में निवास करता है तथा पुष्कर तीर्थ में निवास करता है । सभी प्रकार के सङ्गों आसक्तियों का त्याग करता है, आत्माराम रहता है तथा किसी भी वस्तु की
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