Srishti Khanda Extracted Page 197

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-197

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Sanskrit Original

यत्प्राप्य न पुनर्जन्म लभन्ते मृत्युदायकम् । पुनरावर्तनं हित्वा ब्राह्मी विद्यां समास्थिताः ॥९९७॥ पुनरावृत्तिरन्येषां प्रपंचाश्रमवासिनाम्। गार्हस्थ्यविधिमाश्रित्य षट्कर्मनिरतः सदा ॥१९८॥ जुहोति विधिना सम्यङ् मंत्रैर्यज्े निमंत्रितः। अधिकं फलमाप्रोति सर्वदुः खविवर्जितः ॥१९९॥ सर्वलोकेषु चाप्यस्य गतिर्न प्रतिहन्यते । दिव्येनैश्वर्ययोगेन स्वारूढः सपरिग्रहः ॥२००॥ बालसूर्यप्रकाशेन विमानेन सुवर्चसा । वृतः स्त्रीणां सहस्रैस्तु स्वच्छन्दगमनालयः ॥२०१॥ विचरत्यानिवार्येण सर्वलोकान् यदृच्छया । स्पृहणीयतमः पुंसां सर्वधर्मोत्तमो धनी ॥२०२॥ स्वर्गच्युतः प्रजायेत कुले महति रूपवान् । धर्मज्ञो धर्मभक्तश्च सर्वविद्यार्थपारगः ॥२०३॥ तथैव ब्रह्मचर्येण गुरु शुश्रूषणेन च। वेदाध्ययन संयुक्तो भैक्ष्यवृति जितेन्द्रियः ॥२०४॥ नित्यं सत्यव्रते युक्तः स्वधर्मेष्वप्रमादवान्। सर्वकामसमृद्धेन सर्वकामावलंबिना ॥२.०५॥ सूर्येणेव द्वितीयेन विमानेनानिवारितः। गुह्यका नाम ब्रह्माख्यगणाः परम संमताः ॥२०६॥ अप्रमेयबलैश्वर्या देवदानवपूजिताः । तेषां ससमतां याति तुल्यैश्वर्यसमन्वितः ॥२०७॥ देवदानवमर्त्येषु भवत्यनियतायुधः। वर्षकोटिसहस्राणि वर्षकोटिशतानि च ॥२०८॥ एवमैश्वर्यसंयुक्तो विष्णुलोके महीयते। उषित्वाऽसौ विभूत्यैवं यदा प्रच्यवते पुनः ॥२०९॥ विष्णुलोकात्स्वकृत्येन स्वर्गस्थानेषु जायते ॥२१०॥ में निवास करते हैं ॥१९५॥ वे ब्राह्मण मर कर जिस फल को प्राप्त करते हैं, उसे आप सुनें वे ब्रह्माजी के दुप्माप्य अक्षय सायुज्य को प्राप्त करते हैं ॥१९६॥ उसको प्राप्त करके वे पुन: मृत्युप्रद जन्म को नहीं प्राप्त करते हैं । पुनरावर्तन का परित्याग करके ब्रह्मविद्या में स्थिर रहते है ॥१९७॥ दूसरे प्रपञ्चश्रम में रहने वालों का पुनर्जन्म होता है । जो ब्राह्मण गार्हस्थ्य विधि को अपनाकर सदा षट्कर्म में लगे रहते हैं ॥१९८॥ यज्ञ मे निमन्त्रित होकर विधिपूर्वक मन्त्रों से होम करते हैं, वह सभी दुःखों से रहित होकर अधिक फल को प्राप्त करता है ॥१९९॥ उनकी लोकों में अप्रतिहत रूप से गति होती है । वे अपने दिव्य ऐश्वर्य के बल से सूर्य के समान प्रकाशित होने वाले, देदीप्यमान विमान पर अपने परिग्रह के साथ बैठकर हजारों दिव्य स्त्रियों से घिरे हुए स्वच्छन्दतया अपने आश्रय में जाते है ।।२००-२०१॥ वह ब्राह्मण अपनी इच्छा के अनुसार सभी लोकों में विचरण करता है । सभी धर्मो में उत्तम धन वाला वह लोगों को अत्यधिक प्रिय होता है ॥२०२॥ जब उसा स्वर्ग से पतन होता है तो उसका जन्म महान् वंश में होता हे तथा वह रूपवान् होता है । वह धर्मों को जानने वाला, धर्म का भक्त तथा सभी विद्याओं के अर्थ का ज्ञाता होता हे ॥२०३॥ वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, अपने गुरुओं की सेवा के द्वारा तथा वेदाध्ययन करते हुए जितेन्द्रिय रहकर भैक्ष्य वृत्ति को अपना लेता है ॥२०४॥ वह सदा सत्यव्रत का पालन करता है, अपने धर्म के विषय में कभी भी प्रमाद नही करता है । उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है, तथा सभी कामनाओं को अपनाने वाला वह मृत्यु के पश्चात् दूसरे सूर्य के समान देदीप्यमान विमान के द्वारा निर्निवार्य रूप से (बेरोक-टोक) ब्रह्माजी के जो गुह्यक नामक उनके अत्यन्त प्रिय अप्रमेय बल एवं ऐश्वर्य से सम्पन्न तथा देवताओं एवं दानवों से पूजित जो गण है, उसके समान हो जाता है और उनके सदृश ही ऐश्वर्य से युक्त होता है ॥२०५-२०७॥ करोड़ों हजार वर्ष पर्यन्त इसतरह के ऐश्वर्य से युक्त होकर विष्णुलोक में पूजा प्राप्त करता है । इसतरह से ऐश्वर्य से युक्त होकर रहने के बाद उसका जब विष्णुलोक से पतन होता है तो वह अपने कर्मो के अनुसार स्वर्ग के स्थानों में उत्पन्न होता है ॥२०८-२०९॥ पुनः वह पुष्कर वन में आकर, ब्रहमचर्याश्रम का पालन करता है, और वेदों का अभ्यास करता

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