Srishti Khanda Extracted Page 196
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-196
Sanskrit Original
मृष्टिखण्ड १७२ \ चेतनत्वं प्रधाने च साधर्म्यमिदमुच्यते । तत्वांतरं च तत्वानां कर्मकारणमेव च॥१८३॥ प्रयोजनं च नैयोज्यमैश्वर्य तत्वसंख्यया। संख्यास्तीत्युच्यते प्राज्ञै विनिश्चित्यार्थचितकैः ॥९८४॥ इति तत्वस्य संभारं तत्व संख्या च तत्वतः । ब्रह्मतत्वाधिकं चापि श्रुत्वा तत्वं विदुर्बुधाः ॥१८५॥ सांख्यकृद्भक्तिरेषा च सद्धिराध्यात्मिकी कृता। योगजामपि भक्तानां श्ृणु भक्तिं पितामहे ॥१८६॥ प्राणायामपरो नित्यं ध्यानवान्नियतेद्रियः। भ्ैक्ष्यभक्षी व्रती वापि सर्वप्रत्याहतेंद्रियः॥१८७॥ धारणं हृदये कुर्याक््यायमानः प्रजेश्वरम् । हत्पद्मकणिकासीनं रक्तवक्त्रं सुलोचनम् ॥१८८॥ परितो द्योतितमुखं ब्रह्मसूत्रकटीतटम् । चतुर्वक्त्रं चतुर्बाहुं वरदाभयहस्तकम्॥१८९॥ योगजा मानसौसिद्धि ब्रह्मभक्ति: परा स्मृता। य एवं भक्तिमान्देवे ब्रह्मभक्तः स॒ उच्यते ॥१९०॥ वृत्तिं च शृणुराजेंद्र या स्मृता क्षेत्रवासिनाम् । स्वयं देवेन विप्राणां विष्ण्वादीनां समागमे ॥१९१॥ कथिता विस्तरात्पूर्व सर्वेषां तत्र सन्निधौ । निर्ममा निरहंकारा निःसंगा निष्परिग्रहाः ॥१९२॥ बंधुवर्गे च निस्रेहास्समलोष्टाश्मकांचनाः । भूतानां कर्मभिर्नित्यै विविधैर भयप्रदाः ॥१९३॥ प्राणायामपरा नित्यं परध्यानपरायणाः । याजिनः शुचयो नित्यं यतिधर्मपरायणाः ॥९९४॥ सांख्ययोगविधिज्ञाश्च॒धर्मज्ञा्रछिन्नसंशयाः । यजंते विधिनानेन ये विप्राः क्षेत्रवासिनः ॥१९५॥ अरण्ये पौष्करे तेषां मृतानां सत्फलं शृणु । व्रजंति ते सुदुष्प्रापं ब्रह्मसायुज्यमक्षयम् ॥१९६॥ ही इन पचीस तत्त्वों से भिन्न हैं, तत्त्वों के स्त्रष्टा होने के कारण वह तत्त्व मी हैं ॥१८३॥ तत्त्वों की संख्या के अनुसार ही प्रयोजन, नैयोज्य तथा ऐश्वर्य होते हैं । इन सबों की संख्या होने के कारण अर्थो का चिन्तन करने वाले प्राज्ञपुरुष इसे संख्या भक्ति कहते हैं ।।१८४।। इस तरह तत्त्वों की सामग्री एवं तत्त्वों की संख्या को तत्त्वत: जानकर तत्त्वज्ञ पुरुष उस भक्ति में ब्रह्म तत्त्व को उन सबों से अधिक (छब्बीसवाँ तत्त्व) तत्त्व बतलाते हैं ॥१८५॥ यह भक्ति सांख्यमतानुसारिणी आध्यात्मिकी भक्ति है । अव आप पितामह (ब्रह्माजी) की योगज भक्ति को सुनें ॥१८६॥ जितेन्द्रिय भक्त को चाहिये वह प्रणायाम परायण रहकर ब्रह्माजी का ध्यान करे, भिक्षा माँग कर भोजन करे और अपनी इन्द्रियां का अन्य विषयों से विमुख बना ले ॥१८७॥ प्रजाओं के स्वामी ब्रह्माजी का ध्यान करते हुए उनको सदा हृदय में धारण करें । ब्रह्माजी हृदय कमल की कर्णिका में बैठे हैं, उनके मुख तथा नेत्र अत्यन्त सुन्दर ६॥१८८॥ उनके मुख की ज्योति चारो ओर प्रकाशित हो रही हे और उनकी कटि पर्यन्त ब्रह्मसूत्र विराजमान है । उनक चार मुख हैं, चार भुजायें हे, उनके हाथ वरद एवं अभय मुद्रा ये युक्त है ॥१८९॥ ब्रह्माजी की योगज मानसी भक्ति सर्वश्रेष्ठ भक्ति बतलायी गयी है । जो ब्रह्माजी की इस प्रकार से भक्ति करता है वह ब्रह्मभक्त कहलाता है॥ १९ ०॥ क्षेत्र वासियों की शास्त्रोक्त वृत्ति को मैं तुम्हें बतलाता हूँ । विष्णु आदि देवताओं के समागम के अवसर पर स्वयं ब्रह्माजी ने ब्राह्मणों की वृत्ति का विस्तार सबों के समक्ष किया है । क्षेत्रवासी ब्राह्मणों को ममता रहित, अहङ्कार रहित सङ्ग (आसक्ति) रहित तथा परिग्रह रहित होना चाहिए ॥१९१-१९२। उनका अपने वन्धू वर्ग में स्नेह नहीं हाना चाहिए; उनकी बुद्धि मिट्टी के ढेले और सुवर्ण दोनों के विषय में एक समान होनी चाहिए । उनको अपने अनेक प्रकार के नित्य कर्मो को जीवों को अभय प्रदान करने वाला होना चाहिए ॥१९३॥ उन्हें सदैव प्राणायाम परायणतथा ध्यान परायण होना चाहिए । यज्ञ करने वाला, पावित्र्य का पालन करने वाला और यतियों (संन्यासियों) के धर्म का पालन करने वाला होना चाहिए ॥१९४॥ उनको सांख्य एवं योग विधि का ज्ञाता होना चाहिए । धर्म के विषय में उनको निर्भ्रान्त ज्ञान होना चाहिए । इस तरह की विधि से जो क्षेत्रवासी ब्राह्मण ब्रह्माजी का यजन करके पोष्कर क्षेत्र
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