Srishti Khanda Extracted Page 195

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-195

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Sanskrit Original

ब्रह्मकृच्छोपवासैश्च तथा चान्यैः शुभ्रतैः । कायिकी भक्तिराख्याता त्रिविधा तु द्विजन्मनाम्॥९६८॥ गोधृतक्षीरदधिभिः रत्मदीपकुशोदकैः । गंधैर्माल्यैश्च विविधैर्धातुभिश्रो पपादितैः ॥९६९॥ घृतगुगलुधूपैश्च कृष्णागरुसुगंधिभिः । भूषणे हेमरत्नाढ्यैश्चित्राभिः स्नरग्भिरिव च॥१७०॥ जृत्यवादित्रगीतैश्च सर्वरत्मोपहारकैः । भक्ष्यभोज्यान्नपानैश्च या पूजा क्रियते नरैः ॥१७१॥ पितामहं समुद्दिश्य भक्तिस्सा लौकिकी मता। वेदमंत्रहवियोगै र्भक्तियविदिकी मता ॥१७२॥ दर्शे वा पौणीस्यां वा कर्तव्यमभ्निहोत्रकम्। प्रशस्त दक्षिणादानं पुरोडाशं चरुकिया॥१७३॥ इष्टि धृतिः सोमपानां यज्ञीयं कर्मसर्वशः । ऋग्यजुः सामजाप्यानि संहिताध्ययनानि च ॥१७४॥ क्रियंते विधिमुददिश्य साभक्तिर्वैदिकीष्यते । अग्निभूम्यनिलाकाशांबुनिशाकरभास्करम् ॥१७५॥ समुद्दिश्य कृतं कर्म तत्सर्व ब्रह्मदैवतम् । आध्यात्मिकी तु द्विविधा ब्रह्मभक्तिः स्थिता नृप॥१७६॥ सांख्याख्या योगजा चान्या विभागं तत्र मेश्ृणु । चतुर्विशतितत्वानि प्रधानादीनि संख्यया ॥९७७॥ अचेतनानि भोग्यानि पुरुषः पंचविंशकः। चेतनः पुरुषो भोक्ता नकर्ता तस्य कर्मणः ॥९७८॥ आत्मानित्यो व्ययञ्चैव अधिष्ठाता प्रयोजकः । अव्यक्तः पुरुषो नित्यः कारणं च पितामहः ॥१७९॥ तत्वसर्गो भावसर्गो भूतसर्गश्च॒ तत्त्वतः। संख्यया परिसंख्याय प्रधानं च गुणात्मकम् ॥१८०॥ साधर्म्यमानमैश्वर्य प्रधानं च विधर्मि च । कारणत्वं च ब्रह्मत्वं काम्यत्वमिदमुच्यते ॥१८१९॥ प्रयोज्यत्वं प्रधानस्य वैधर्म्यमिदमुच्यते । सर्वत्र कर्तृस्याद्ब्रह्म पुरुषस्याप्यकर्तृता ॥ १८ २॥ वाली भक्ति को कायिकी (शारीरिक) भक्ति कहते हैं । वह भी द्विजों के लिए तीन प्रकार की होती हें ॥१६८॥ ब्रह्माजी की पूजा, गौ के दूध, घी, दधि, रत्न, दीप तथा कुशोदक, चन्दन, गन्ध (चन्दन), अनेक प्रकार के धातुओं से निर्मित मालाएँ ॥१६९॥ घी, गुलाल, धूप तथा कालगरु इत्यादि सुगन्धित पदार्थो से की जाती है । अनेक प्रकार के रत्नजटित सुवर्ण निर्मित मालाओं, सभी प्रकार के रत्नोंपहार पूर्वक नृत्य तथा वाद्यों एवं भक्ष्य भोज्य अन्न एवं पेय पदार्थो से की जाती हैं ॥१७०-१७१॥ वह लौकिकी भक्ति कहलाती है । वेद के मन्त्रों के द्वारा हविष्य प्रदान करना वैदिकी भक्ति कहलाती है ॥१७२॥ अमावस्या अथवा पूर्णिमा के दिन किया जाने वाला अग्निहोत्र, श्रेष्ठ दक्षिणा का दान, पुरोडाश तथा चरु का प्रदान ॥१७३॥ सोमपायी ब्राह्मणों द्वारा की जाने वाली इष्टियाँ इत्यादि, ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के सूक्तों का पाठ, संहिता पाठ ॥१७४। जो ब्रह्माजी की प्रसन्नता के उद्देश्य से किए जाते हैं, वह भी वैदिकी ही भक्ति कहलाती है । अग्नि, प्रथिवी, वायु, आकाश, जल, चन्द्रमा तथा सूर्य की प्रसन्नता के लिए जो कर्म किए जाते हैं, वे ब्रह्मदैवत होते हैं हे नृप ! आध्यात्मिक भक्ति दो प्रकार की होती है ॥१७५-१७६॥ सांख्यभक्ति तथा योगजभक्ति उन दोनों का विभाग आप सुनें । प्रधान (प्रकृति) आदि जो चौबीस तत्त्व (प्रकृति, महान्, अहङ्कार, पञ्ज तन्मात्रायें, पाञ्च कर्मेन्द्रियाँ, पाञ्च ानेन्द्रियाँ, मन और पञ्च महाभूत) हैं ॥१७७॥ ये अचेतन तथा भोग्य हैं पच्चीसवाँ पुरुष तत्त्व है । पुरुष चेतन है, वह भोक्ता, है, किन्तु वह कर्मो को करने वाला नहीं है ।।१७८॥ वही आत्मा है, वह नित्य तथा विकार से रहित है, वह प्राकृतों तथा प्रकृति का अधिष्ठाता तथा प्रयोजक है । अव्यक्त पुरुष ब्रह्माजी ही कारण तत्त्व हैं ॥१७९॥ तत्त्वसर्ग (तत्त्वों की सृष्टि) भावसर्ग तथा भूतसर्ग इन तीनों को संख्यानुसार गणना करके तथा सत्त्वादि गुण प्रधान प्रकृति को ॥१८०॥ सादृश्य प्रयुक्त मान, ऐश्वर्य प्रधान को तथा प्रकृत तत्वों से विधर्मी प्रधान में कारणत्व, ब्रह्मत्व, काम्यत्व तथा प्रयोज्त्व जो बतलाये जाते हैं । वे ही प्रकृति के वैधर्म्य हैं । सर्वत्र कर्ता ब्रह्म ही है, पुरुष भी कर्ता नहीं है ॥१८१-१८२॥ प्रधान में ज्ञानयुक्तता ये सब ही साम्य हैं । वह ब्रह्म | j |] | I 2

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