Srishti Khanda Extracted Page 194
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-194
Sanskrit Original
एतत्ते तथ्यमाख्यातं लोकानुग्रहकारणम्। संहितानुक्रमेणात्र मंत्रैश्च विधिपूर्वकम् ॥१५७॥ वेदान्पठंति ये विप्रा गुरुशुश्रूषणे रताः । वसंति ब्रह्मसामीप्ये सर्वे ते नानुभाविताः ॥९५८॥ भीष्म उवाच भगवन्केन विधिना अरण्ये पुष्करे नरैः । ब्रह्मलोकमभीप्सद्धिर्वस्तव्यं क्षेत्रवासिभिः ॥१५९॥ किं मनुष्यैरुतस्त्रीभिरुतवर्णाश्रमान्वितैः। वसद्भिः किमनुष्टेयमेतत्सर्वं ब्रवीहि मे ॥१६०॥ पुलस्त्य उवाच नरैः स्त्रीभिश्च वस्तव्यं वर्णाश्रमनिवासिभिः । स्वधर्माचारनिरतैर्दभमोहविवर्जितैः ॥१६१॥ कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्मभक्तैर्जितेद्रियैः । अनसूयुभिरक्षुद्रैः सर्वभूतहिते रतैः ॥१६२॥ भीष्म उवाच कि कुर्वाणो नरः कर्म ब्रह्मभक्तस्त्विहोच्यते। कीदृशा ब्रह्मभक्ताश्च स्मृता नृणां वदस्व मे ॥१६३॥ पुलस्त्य उवाच त्रिविधा भक्तिरुहिष्टा मनोवाक्कायसंभवा। लौकिकी वैदिकीं चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा॥९६४॥ घ्यानधारणया बुद्ध्या वेदार्थस्मरणे हि यत् । ब्रह्मप्रीतिकरी चैषा मानसी भक्तिरुच्यते॥१६५॥ मंत्रवेदनमस्कारै रग्रिश्राद्धादिचितनैः । जाप्यैश्चावश्यकैश्चैव वाचिकी भक्तिरिष्यते ॥९६६॥ ब्रतोपवासनियतै श्जितेद्रयनिरोधिभिः। कृच्छ्रः सांतपनैश्चान्यैस्तथा चांद्रायणादिभिंः ॥१६७॥ रमण करते हैं ।। १५५॥ विष्णु, रुद्रगण, वसुगण तथा दोनों अश्विनी कुमार तथा इन्द्र के साथ सभी देवता वहाँ पर निवास करते हैं ॥१५६॥ ब्रह्माजी द्वारा जीवों पर अनुग्रह करने के कारणरूप पुष्कर का मैंने यह ठीक-ठीक वर्णन किया है। जो गुरुसेवी ब्राह्मण संहिता के क्रम से यहाँ पर विधिपूर्वक मन्त्रं द्वारा वेदों का पाठ करते हैं, वे सब ब्रह्माजी की कृपा के पात्र होकर ब्रह्माजी की सन्निधि में निवास करते हें ॥१५७-१५८॥ भीष्मजी ने कहा-- हे भगवन् ! ब्रह्मलोक में निवास करना चाहने वाले क्षेत्रवासी मनुष्यों को पुष्करारण्य में किस विधि से पुष्कर में निवास करना चाहिए ॥१५९॥ वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले पुरुषों द्वारा तथा अथवा स्त्रियों द्वारा जो वहाँ निवास करते हैं, उनके द्वारा क्या किया जाना चाहिए, इस बात को आप मुझे बतलाइये ॥१६०॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले पुरुषों तथा स्नियों को पुष्कर में निवास करना चाहिए । उन सबों को अपने धर्म का पालन करने वाला तथा अभिमान एवं मोह से रहित होना चाहिए ॥१६१॥ उन सबों को मन, वाणी तथा कर्म से, ब्रह्माजी का भक्त, जितेंद्रिय, असूया रहित, क्षुद्रता रहित तथा सभी जीवों का कल्याणकारी होना चाहिए ॥१६२॥ भीष्मजी ने कहा-- आप मुझे यह बतलायें कि यहाँ पर किन कर्मो को करने वाले मनुष्यों को ब्रह्मभक्त कहा गया है ? किस प्रकार के मनुष्यों को ब्रह्मभक्त कहा गया है 2॥१६३॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- मन, वाणी तथा शरीर से उत्पन्न होने वाली भक्ति को तीन प्रकार का बतलाया गया है । वे भक्तियाँ है लौकिकी, वैदिकी तथा आध्यात्मिकी ॥ १६४॥ ध्यान, धारण तथा बुद्धि के द्वारा वेदार्थ का स्मरण करने में जो, ब्रह्माजी में प्रेम को उत्पन्न करती है, उसे मानसी भक्ति कहते हैं ।।१६५॥ मन्त्र, वेद तथा नमस्कार करके, अग्नि तथा श्राद्ध आदि का चिन्तन करने से तथा आवश्यक जाप्यों (मन्त्र जपों) के द्वारा जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे वाचिकी भक्ति कहते हें ॥१६६॥ मन तथा इन्द्रियों को वशीकृत बनाने वाला तथा व्रत एवं उपासक के द्वारा होने वाले, दूसरे सान्तपनकृछों तथा चान्द्रायण इत्यादि व्रतों के द्वारा ।।१६७॥। ब्रह्म विषयक कृछ तथा उपवासों के द्वारा तथा दूसरे शुभ व्रतों के द्वारा उत्पन्न होने
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know