Srishti Khanda Extracted Page 193
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-193
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण मया प्रणीतं विप्राणामपुनर्भवकारणम् । अग्निहोत्रमुपादाय यस्त्यजेदजितेंद्रियः ॥९४३॥ रौरवं सप्रयात्याशु प्रणीतो यमकिंकरैः । लोकयात्रा वितंडश्च क्षुद्रं कर्म करोति य: ॥९४४॥ सरागचित्तः शृंगारी नारीजनधनप्रियः । एकभोजी सुमिष्टाशी कृषिवाणिज्यसेवकः ॥१४५॥ अवेदो वेदनिंदी च परभार्या च सेवते। इत्यादिदोषदुष्टो यस्तस्य संभाषणादपि॥१४६॥ नरो नरकगामी स्याद्यश्च सदव्रतदूषकः । असंतुष्टं भिन्नचित्तं दुर्मतिं पापकारिणम् ॥१४७॥ नस्पृशेदंगसंगेन स्पृष्ट्वा स्नानेन शुद्धयति। एवमुक्तवा सभगवान् ब्रह्मा तैरमरैः सह ॥१४८॥ ् षेत्रेनिवेशयामास यथावत्कथयामि ते । उत्तरे चंद्रनद्यास्तु प्राची यावत्सरस्वती॥१४९॥ पूर्व॑ तुनंदनात्कृत्स्नं यावत्कल्पं सपुष्करम्। वेदीह्येषा कृता यज्ञे ब्रह्मणा लोककारिणा॥१५०॥ ज्येष्ठं प्रथमं ज्ञेयं तीर्थ त्रैलोक्यपावनम् । ख्यातं तद् ब्रह्मदैवत्यं मध्यमं वैष्णवं तथा॥१५९॥ कनिष्ठं रुद्रदैवत्यं ब्रह्मा पूर्वमकारयत् । आद्यामेतत्परं क्षेत्रं गुह्यं वेदेषु पठ्यते॥१५२॥ अरण्यंपुष्कराख्यं तु ब्रह्मासन्निहितः प्रभुः । अनुग्रहो भूमिभागे कृतो वै ब्रह्मणा स्वयम् ॥१५३॥ अनुग्रहार्थ विप्राणां सर्वेषां भूमिचारिणाम् । सुवर्णवत्रपर्यंता वेदिकांका महीकृता ॥१५४॥ विचित्रकुट्टिमारत्मैः कारिता सर्वशोभना । रमते तत्र भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ॥१५५॥ विष्णुरुद्रौ तथा देवौ वसवोप्यश्नावपि। मरुतश्च महेद्रेण रमंते च दिवौकसः॥१५६॥ होती है । जैसे में सभी देवताओं में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हूँ तथा पितामह हूँ ॥ १४१॥। उसी तरह ममता रहित तथा परिग्रह रहित ज्ञानी की सदा पूजा करनी चाहिए । संसार के बन्धन से मुक्ति दिलाने वाला यह ब्रह्मगुप्त नामक व्रत है।।१४२॥ ब्राह्मणों को जिसके कारण संसार के बन्धन में नहीं पड़ना पड़े, ऐसे साधन का निर्माण मैंने किया है । जो अग्निहोत्र व्रत को अपनाकर अजितेन्द्रिय व्यक्ति उसका फिर परित्याग कर देता है ॥१४३॥ वह यम किंकरों द्वारा निर्मित रौरव नामक नरक में चला जाता है । जो व्यक्ति लोकयात्रा वितण्डा तथा क्षुद्र (अभिचार इत्यादि) कर्मा को करता है ॥१४४॥ एवं रागी, शृङ्गारी तथा खियों को प्रिय लगने वाला, अकेले भोजन करने वाला, अकेले अच्छे भोज्य पदार्थ को खा लेने वाला, कृषि तथा व्यापार करने वाला, वेदज्ञान विहीन, वेदों की निन्दा करने वाले, दूसरे की पत्नी का सेवन करने वाले, इसतरह के दोषों से दूषित व्यक्ति के साथ बातें भी करने से ।।१४५-१४६॥ सद्व्रत का पालन करने वाला मनुष्य नरकगामी होता है । असन्तुष्ट रहने वाला, जिसका चित्त भिन्न प्रकार का होता है दुष्टबुद्धि वाले तथा पापी ॥१४७॥ ऐसे व्यक्ति के अङ्ग का भी स्पर्श नहीं करना चाहिए, यदि स्पर्श हो जाय तो स्नान करने से ही शुद्धि होती है । इसतरह से भगवान् ब्रह्माजी ने उन देवताओं के साथ ॥१५४८॥ जिस तरह उस क्षेत्र को स्थापित किया उसका मैं यथावत् वर्णन करता हूँ । चन्द्र नदी के उत्तर भाग में प्राची सरस्वती पर्यन्त।। १४९॥ उसी तरह से पूर्व दिशा में नन्दन पर्यन्त पुष्कर की कल्पना की गयी है । लोक की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी इस भाग को यज्ञ की वेदी बनाया ॥१५०॥ ज्येष्ठ पुष्कर को प्रथम त्रैलोक्य पावन तीर्थ समझना चाहिए । वह (ज्येष्ठ पुष्कर) ब्रह्म दैवत रूप से प्रसिद्ध है, मध्यम पुष्कर के देवता भगवान् विष्णु हैं ॥१५१॥ और कनिष्ठ पुष्कर को ब्रह्माजी ने रुद्र दैवत बनाया । वेदों में इस पुष्कर क्षेत्र को आद्य तथा गोपनीय क्षेत्र बतलाया गया है ॥१५२॥ पुष्कर नामक वन में ब्रह्माजी का नित्य ही सन्निधान बना रहता है । स्वयं ब्रह्माजी ने पृथिवी पर यह अनुग्रह किया है ॥१५३॥ ब्रह्माजी ने ब्राह्मणों पर कृपा करने के लिए तथा पृथिवी के समस्त जीवों पर कृपा करने के लिए सुवर्णवज़् पर्यन्त की पृथिवी को वेदी बनाया ॥१५४॥ फर्श में लगे हुए रत्नों से सम्पूर्ण वेदी को सुन्दर बनाया । वहाँ पर लोक पितामह ब्रह्माजी
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