Srishti Khanda Extracted Page 192

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-192

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

युष्मदागमनं ज्ञात्वा तपस्थान्निहितायुधान् । हंतुकामो दुराचारः सेंद्रानपि दिवौकसः ॥१२८॥ घातः कमलपातेन मया तस्य विनिर्मितः । सराज्यैश्वर्यदर्पिष्ठस्तेनासौ निहतो मया॥१२९॥ लोकेस्मिन्समये भक्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः । मैव ते दुर्गातिं यांतु लभंतां सुगतिं पुनः ॥१३०॥ देवानां दानवानां च मनुष्योरगरक्षसाम्। भूतग्रामस्य सर्वस्य समोस्मि त्रिदिवौकसः ॥१३९॥ युष्मद्धितार्थ पापोऽसौ मया मंत्रेण घातितः । प्राप्तः पुण्यकृतान् लोकान् कमलस्यास्यदर्शनात्।९ ३ २॥ यन्मया पडामुक्तं तेनेदं पुष्करं भुवि । ख्यातं भविष्यते तीर्थपावनं पुण्यदं महत्॥९३३॥ पृथिव्यां सर्वजंतूनां पुण्यदं परिपठ्यते । कृतोह्यनुग्रहो देवा भक्तानां भक्तिमिच्छताम् ॥९३४॥ वनेस्मिन्नित्यवासेन वृक्षेरभ्यार्थितिन च । महाकालो वनेत्रागादागतस्य ममानघाः ॥१३५॥ तपस्यतां च भवतां महज्ज्ञानं प्रदर्शितम्। कुरुध्वं हृदये देवाः स्वार्थ चैवपरार्थकम् ॥९३६॥ भवद्धिर्दर्शनीयं तु नानारूपधरैर्भुवि । द्विषन्वै ज्ञानिनं वित्रं पापेनैवार्दितो नरः॥९३७॥ नविमुच्येत पापेन जन्मकोटिशतैरपि । वेदांगपारगं विप्रं नहन्यान्नचदूषयेत् ॥१३८॥ एकस्मिन्निहते यस्मात्कोटिर्भवतिघातिता । एकं वेदांतगं विप्रं भोजयेच्छुद्धयान्वित: ॥ १ ३ ९॥ तस्य भुक्ता भवेत्कोटिर्विप्राणां नात्र संशयः । यः पात्रपूरणीं भिक्षां यतीनां तु प्रयच्छति ॥९४०॥ विमुक्तः सर्वपापेभ्यो नासौ दुर्गतिमाप्रुयात् । यथाहं सर्वदेवानां ज्येष्ठः श्रेष्ठः पितामहः ॥१४९॥ तथाज्ञानी सदा पूज्यो निर्ममो निःपरिग्रहः। संसारबंधमोक्षार्थं॑ ब्रह्मगुप्तमिदं व्रतम् ॥१४२॥ रोक कर स्थित था ॥१२७॥ तपस्यारत तथा आयुध का त्याग किए हुए आपलोगों के आगमन को जान कर वह दुराचारी इन्द्र सहित समस्त देवताओं को मार देना चाहता था ॥१२८॥ कमल को फेंक कर मैंने उसको मार दिया। वह राज्य और ऐश्वर्य के दर्प से अत्यन्त दृप्त हो गया था, इसीलिए मैने उसे मार दिया ॥१२९॥ इस लोक में इस समय वेद पारंगत ब्राह्मण, दुर्गति को न भोगें अपितु सुन्दर गति को प्राप्त करें ॥१३०॥ हे देवताओं ! मैं देवताओं, दानवों, मनुष्यों, उरगों तथा राक्षसों इत्यादि सम्पूर्ण जीवों के लिए एक समान हुँ । सभी मेरे हैं ॥१३१॥ आपलोगों का ही कल्याण करने के लिए मैंने इस पापी को मन्त्र से मारा है । इस कमल का दर्शन करने के कारण वह पुण्यवानों के लोक में चला गया ॥१३२॥ मैंने जहाँ पर पद्म को छोडा है, उसके कारण लोक में यह स्थान पुष्कर के नाम से विख्यात होगा यह पवित्र तीर्थ महान् पुण्य प्रदान करने वला है ॥१३३॥ यह पृथिवी के समस्त जीवों को पुण्य प्रदान करने वाला कहा जाता है । भक्ति चाहने वाले भक्तों पर मैने यह अनुग्रह किया है ॥१३४॥ हे अनघ ! देवताओं, वृक्षों के द्वारा, प्रार्थना किए जाने के कारण, मेरा यहाँ नित्य निवास होने के कारण मेरे यहाँ आने से इस वन में महाकाल आये ।।१३५।। देवताओं ! तपस्या करने वाले आप लोगों को मैंने महाज्ञान प्रदान किया हैं, हेदेवताओं ! उस ज्ञान को आपलोग अपने लिए तथा दूसरों के लिए अपने हृदय में धारण करें ॥१३६॥ आपलोग अनेक रूप धारण करके पृथिवी पर देखें ज्ञानी विप्र से द्वेष करने वाले पाप के द्वारा पीडित पापी मनुष्य विनष्ट हो जाता है ॥१३७॥ वेदाङ्गो में पारङ्गत ब्राह्मण का न तो वध करें और न उसकी निन्दा करे, क्योंकि ऐसा करने वाला व्यक्ति सैकड़ो करोड़ जन्मों में भी उस पाप से मुक्त नहीं होता हे ॥१३८॥ एक भी वेदान्तज्ञ ब्राह्मण का वध कर देने से करोड़ो ब्राह्मणों के वध का पाप लगता है और एक भी वेदान्त पारङ्गत ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक भोजन कराने से॥१३९॥ करोड़ो ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य मिलता है । इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है । जो व्यक्ति संन्यासी को उनके पात्र में भरकर भिक्षा देता है ॥१४०॥ वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उसकी दुर्गति नहीं

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know