Srishti Khanda Extracted Page 191
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-191
Sanskrit Original
नमस्कुर्मः सुनियताः क्रतुवेदप्रदायिने । लोकानुकंपिने देवसृष्टिरूपाय वै नमः ॥११६॥ भक्तानुकंपिनेत्यर्थं वेदजाप्यस्ताय च । बहुरूपस्वरूपाय रूपाणां शतधारिणे ॥११७॥ सावित्रीपतये देव गायत्री पतये नमः । पद्मासनाय पद्माय पद्मवक्त्राय ते नमः॥११८॥ वरदाय वरार्हाय कूर्माय च मृगाय च। जटामकुटयुक्ताय खुवख्ुच निर्धारिणे ॥११९॥ मृगांकमृगधर्माय धर्मनेत्राय ते नमः । विश्वनाम्नेऽथ विश्वाय विश्वेशाय नमो नमः ॥१२०॥ धर्मनेत्रत्राणमस्मादधिकं कर्तुमर्हसि । वाङ्मनः कायभावैस्त्वां प्रपन्नास्स्मः पितामह ॥१२१॥ एवं स्तुतस्तदा देवै ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः । प्रदास्यामि स्मृतो बाढममोघं दर्शनं हि वः ॥१२२॥ बरुबन्तु वांछितं पुत्राः प्रदास्यामि वरान्वरान् । एवमुक्ता भगवता देवा वचनमब्रुवन् ॥१२३॥ एष एवाद्य भगवन् सुपर्याप्तो महान्वरः । जनितो नः सुशब्दोयं कमलं क्षिपता त्वया ॥१२४॥ किमर्थ कंपिता भूमिरलोकाश्चाकुलिताः कृताः । नैतन्निरर्थकं देव उच्यतामत्र कारणम् ॥१२५॥ ब्रह्मोवाच युष्मद्धितार्थमेतट्टै पद्मां विनिहितं मया । देवतानां च रक्षार्थ श्रूयतामत्र कारणम् ॥१२६॥ असुरो वञ्जनाभोऽयं बालजीवापहारकः । अवस्थितस्त्ववष्टभ्य रसातलतलाश्रयम् ॥१२७॥ ने षडंग वेदयोग के द्वारा प्रसन्नता पूर्वक अञ्जलि बाँधकर तथा उसे शिर से लगाया करते थे शिर को भूमि से सटाकर देवताओं ने सृष्टि कर्ता, पालन कर्ता तथा नियमन कर्ता ब्रह्माजी की स्तुति की । देवताओं ने कहा-- परंत्रह्मात्मक, ब्रह्मण्य तथा अजितात्मा ब्रह्माजी को नमस्कार है ॥११३-११५॥ हमलोग अत्यन्त सावधान होकर क्रतुवेद (क्रतु तथा वेद) को प्रदान करने वाले ब्रह्माजी को नमस्कार करते हैं । संसारी जीवों पर कृपा करने वाले तथा देव सृष्टि रूप ब्रह्माजी को नमस्कार करते हैं ॥११६॥ भक्तों पर अत्यधिक कृपा करने वाले, तथा वैदिक मन्त्रों से स्तुति किए जाने वाले, अनेक रूप स्वरूप तथा सैकड़ों रूपों को धारण करने वाले, ब्रह्माजी को हम नमस्कार करते हैं ॥११७॥ सावित्री देवी के पति, तथा गायत्री देवी के पति ब्रह्माजी को नमस्कार है । कमल के आसन पर बैठने वाले, पद्मस्वरूप तथा कमल के समान मनोहर मुख वाले ब्रह्माजी को नमस्कार है ॥११८॥ वरदान देने वाले, वर के योग्य, कूर्म स्वरूप तथा मृग स्वरूप ब्रह्माजी को नमस्कार है । जटा तथा मुकुट को धारण करने वाले, खुव तथा खुच को धारण करने वाले ब्रह्माजी को नमस्कार है ॥११९॥ मृगाङ्ग स्वरूप, मृगधर्म स्वरूप, तथा धर्मनेत्र स्वरूप आपको नमस्कार है । सम्पूर्ण नामों वाले, विश्वस्वरूप तथा विश्व के स्वामी ब्रह्माजी को नमस्कार है ॥१२०॥ हे धर्मनेत्र ब्रह्माजी ! आप इससे भी अधिक हमलोगो की रक्षा करें । हे पितामह ! हमलोग वाणी, मन तथा शरीर से भाव पूर्वक आपके शरणागत हैं ॥१२१॥ इस तरह से देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर ब्रहमज्ञानियों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने कहा जब कभी भी आपलोग स्मरण करेंगे तो मैं आपलोगों को अमोघ दर्शन दूँगा ॥१२२॥ हे पुत्रों ! आपलोगों को जो भी अभिप्रेत हो उसे बतलाओं । में आपलोगों को श्रेष्ठ वर प्रदान करूँगा । ब्रह्माजी के द्वारा इस तरह से कहे जाने पर देवताओं ने कहा ॥१२३॥ हे भगवन् ! आपका यही वरदान हमलोगों के लिए पर्याप्त है । आपने जब कमल फेंका उससे बहुत अधिक शब्द उत्पन्न हुआ ॥१२४॥ आपने भूमि को तथा लोकों को क्यों कँपाया? यह निरर्थक तो है नहीं, अतएव आप इसका कारण बतलाएँ ?।।१२५॥ ब्रह्माजी नेकहा-- आपलोगों का कल्याण करने के लिए मैंने कमल को पृथिवी पर फेंका है उसका उद्देश्य देवताओं की रक्षा करना था । इसका कारण आपलोग सुनें ॥१२६॥ यह वज्रनाभ नाम का असुर बालकों को मार देने वाला है । वह रसातल के मार्ग को
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