Srishti Khanda Extracted Page 188
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-188
Sanskrit Original
किमेतद्धगवन्त्रहि निमित्तोत्पातदर्शनम् । त्रैलोक्यं कंपितं येन॒ संयुक्तं कालधर्मणा ॥७२॥ जातकल्पावसानं तु भिन्नमर्यादसागरम् । चत्वारोदिग्गजाः किंतु बभूवुरचलाश्चलाः ॥७३॥ समावृता धरा कस्मातसप्तसागरवारिणा । उत्पत्तिर्नास्ति शब्दस्य भगवन्निः प्रयोजना ॥७४॥ याद्शोवास्मृतः शब्दो न भूतो न भविष्यति । त्रैलोक्यमाकुलं येन चक्रे रौद्रेण चोद्यता ॥७५॥ शुभोऽशुभो वा शब्दोऽयं त्रैलोक्यस्य दिवौकसाम् । भगवन् यदि जानासि किमेतत्कथयस्व नः ॥७६॥ एवमुक्तो ब्रवीद्विष्णुः परमेणानुभावितः। मा भैष्ट मरुतः सर्वे शृणुध्वं चात्र कारणम् ॥७७॥ निश्चयेनानुविज्ञाय वक्ष्याम्येष यथाविधम् । पद्महस्तो हि भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ॥७८॥ भूप्रदेशे पुण्यराशौ यज्ञं कर्तु व्यवस्थितः । अवरोहे पर्वतानां वनेचातीव शोभने ॥७९॥ कमलं तस्य हस्तात्तु पतितं धरणीतले । तस्य शब्दो महानेष येन यूयं प्रकंपिताः ॥८ ०॥ तत्रासौ तरुबृंदेन पुष्पामोदाभिनंदितः । अनुगृह्याथ भगवान्वनं तत् समृगांडजम् ॥८ १॥ जगतोजुग्रहार्थाय वासं तत्रान्वरोचयत्। पुष्करं नाम तत्तीर्थं क्षेत्रं वृषभमेव च॥८२॥ जनितं तद्धगवता लोकानां हितकारिणा । ब्रह्माणं तत्र वै गत्वा तोषयध्वं मया सह॥८३॥ आराध्यमानो भगवान्प्रदास्यति वरान्वरान्। इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः सह तै देंवदानवैः॥८ ४॥ जगाम तद्वनोद्देशं यत्रास्ते स तु कंजजः । प्रहृष्टास्तुष्टमनसः कोकिलालापलापिताः ॥८ ५॥ पुष्पोच्चयोज्ज्वलं शस्तंविविशु ब्रह्मणो वनम् । संप्राप्तं सर्वदेवैस्तु वनं नंदनसंमितम् ॥८६॥ कहा ॥७१॥ भगवन् ! आप यह बतलाइये कि यह क्या है ? उत्पात के कारण रूप से क्या दिख रहा है ? जिस कालधर्म के द्वारा त्रैलोक्य काँप गया है 2॥७२॥ क्या कल्प का अवसान आ गया है कि सागर ने अपनी मर्यादा को त्याग दिया है ? किञ्च अचल चारो दिग्गज भी चझल हो गये हैं ॥७३॥ सातो समुद्र के जल से पृथिवी क्यों आप्लावित हो गयी है ? हे भगवन् ! इस शब्द की उत्पत्ति निष््योजन तो हुयी नहीं है ॥७४॥ जैसा कि यह शब्द हुआ है, वैसा शब्द न तो कभी हुआ और न तो कभी होगा ? इस भयङ्कर शब्द से त्रैलोक्य व्याकुल हो गया हैं॥७५॥ यह त्रैलोक्य देवताओं के लिए शुभ है या अशुभ ? हे भगवन् ! यदि आप जानते हाँ तो उसे आप हमलोगो को बतलाइये ॥७६॥ पखंबह्यम के द्वारा अनुभाषित भगवान् विष्णु ने कहा-- देवताओं डरो मत; आपलोग इसका कारण सुनें ॥७७॥ सारी बातें को जानकर में इसको ठीक-ठीक बतला रहा हुँ । लोकपितामह ब्रह्माजी हाथ में कमल लिए थे ॥७८॥ वे पृथिवी के अत्यन्त पुण्यवान् स्थान पर यज्ञ करना चाहते हैं । वे अत्यन्त मनोहर वन में पर्वतों से उतर रहे थे; उसी समय उनके हाथ से वह कमल पृथिवी पर गिर गया उसी का यह महान शब्द है, जिसके कारण आपलोग काँप गये हैं ॥८०॥ यहाँ पर ब्रह्माजी वृक्ष समूह के पुष्पों की सुगन्धि से अभिनंदित होकर इस मृगों तथा पक्षियों से युक्त वन को अनुगृहीत किए (अपनी कृपा का विषय बनाये) ॥८ १॥ संसार पर कृपा करने के लिए वे यहीं पर रहने का निश्चय किए । पुष्कर नामक यह तीर्थ धर्म का क्षेत्र है ॥८२॥ लोककल्याणकारी ब्रह्माजी ने इस तीर्थ को उत्पन्न किया है । इसलिए मेरे साथ ब्रह्माजी के पास जाकर आप लोग उनको सन्तुष्ट करें ॥८३। आराधितहोकर ब्रह्माजी बहुत से श्रेष्ठ वरों को प्रदान करेंगे । इस तरह से कहकर भगवान् विष्णु उन देवताओं तथा दैत्यों के साथ, वन के उस स्थान पर गये जहाँ पर ब्रह्माजी विद्यमान थे । अत्यन्त प्रसन्न तथा सन्तुष्ट मन वाले देवता एवं दैत्य कोकिलों की ध्वनि से युक्त ॥८४-८५॥ पुष्प समूह से सुशोभित ब्रह्माजी के श्रेष्ठ वन में प्रवेश किए, सभी
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