Srishti Khanda Extracted Page 187
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-187
Sanskrit Original
त्वं चेद्ससि देवेश वनेस्मिन्विश्वभावन। सर्वात्मना प्रपन्नानां वांछतामुत्तमं वरम् ॥५८॥ वरकोटिभिरन्याभिरलं नो दीयतां वरम् । सन्निधानेन तीर्थेभ्य इदं स्यात्प्रवरं महत् ॥५९॥ ब्रह्मोवाच उत्तमं सर्वक्षेत्राणां पुण्यमेतद्भविष्यति। नित्यं पुष्पफलोपेता नित्यसुस्थिरयौवनाः ॥६ ०॥ कामगाः कामसरूपाश्च कामरूपफलप्रदाः । कामसंदर्शनाः पुंसां तपःसिद््युज्चला नृणाम् ॥६१॥ श्रिया परमया युक्ता मत्प्रसादाद्धविष्यथ । एवं स वरदो ब्रह्मा अनुजग्राह पादपान्॥६२॥ स्थित्वा वर्षसहस्रं तु पुष्करं प्राक्षपद्धुवि । क्षितिर्निपतिता तेन व्यकंपतरसातलम् ॥६३॥ विवशास्तत्यजुर्वेलां सागराः क्षुभितोर्मयः। शक्राशनिहतानीव व्याघ्रव्यालावृतानि च॥६४॥ शिखराण्यप्यशीर्यंत पर्वतानां सहस्रशः | देवसिद्धविमानानि गन्धर्वनगराणि च ॥६५॥ प्रचेलुर्बभ्रमुः पेतुर्विविशुश्च धरातलम्। कपोतमेघा . खात्पेतुः पुटसंघातदर्शिनः ॥६६॥ ज्योतिर्गणांश्छादयंतो बभूवुस्तीव्रभास्कराः। महता तस्य शब्देन मूकांधबधिरीकृतम्॥६७॥ बभूवव्याकुलं सर्व॑ त्रैलोक्यं सचराचरम् । सुरासुराणां सर्वेषां शरीराणि मनांसि च॥६८॥ अवसेदुश्च किमिति किमित्येतन्नजज्ञिरे । धैर्यमालब्य सवेंऽथ ब्रह्माणं चाप्यलोकयन् ॥६९॥ न च ते तमपश्यंत कुत्र ब्रह्मा गतोह्यभूत् । किमर्थं कंपिता भूमिर्निमित्तोत्पातदर्शनम् ॥७०॥ तावद्दिष्णुर्गतस्तत्र यत्र देवा व्यवस्थिताः । प्रणिपत्य इदं वाक्यमुक्तवन्तो दिवौकसः ॥७१॥ आपका नित्य ही इस वन में निवास हो । हे पितामह ! हमलोगों की यही सबसे बड़ी कामना है । आपको नमस्कार है ॥५७॥ हे विश्व का कल्याण करने वाले ब्रह्माजी ! आप यदि यहाँ निवास करते हैं तो शरणागतों द्वारा हर प्रकार से चाहे जाने वाला यह उत्तम वर होगा ॥५८॥ करोड़ों दूसरे वरदानों से भी उत्तम हमलोगों को यह वरदान दीजिये कि आपके सन्निधान के कारण यह तीर्थ सभी तीर्थो से श्रेष्ठ तीर्थ हो जाय ॥५९॥ ब्रह्माजी ने कहा-- यह क्षेत्र सभी क्षेत्रों से उत्तम क्षेत्र हो जायेगा । आप सभी भी मेरी कृपा से, सदैव पुष्पों तथा फलों से युक्त, सदा युवक रहने वाले॥६०।। अपनी इच्छानुसार रूप वाले और इच्छा के अनुसार फल देने वाले, लोगों को देखने में सुन्दर लगने वाले, मनुष्यों द्वारा की जाने वाली तपस्या की सिद्धि में उदार आपलोग होंगे ॥६१॥ तथा परमैश्वर्य से सम्पन्न होंगे । इसतरह से वरदान देने वाले ब्रह्माजी ने उन वृक्षों को अनुगृहीत किया ।।६२॥ हजार वर्ष तक स्थित होकर ब्रह्माजी ने पुष्कर (कमल) को पृथिवी पर डाल दिया । उसके पृथिवी पर गिरने से रसातल पर्यन्त काँप गया ॥६३॥ सागर भी क्षुब्ध हो गये और उनका जल तटबन्थों को पार करके बहने लगा, उसमें बड़ी-बड़ी लहरें उठने लगीं । इन्द्र के द्वारा किए गये वत्र प्रहार के समान व्याघ्रों तथा सर्पो से आवृत पर्वतों के शिखरों के हजारों टुकड़े हो गये । देवताओं तथा सिद्धों के विमान तथा गन्धर्वो के नगर ॥६४-६५॥। हिलने लगे, काँपने लगे और पृथिवी में प्रवेश कर गये । पुट समूह को देखने वाले कपोत वर्ण के मेघ आकाश से गिर पड़े ॥६६॥ ज्योति समूह को आच्छादित करती हुयी सूर्य की किरणें तीब्र प्रकाश वाली हो गयीं । उसके अत्यधिक शब्द से लोग मूक अन्धे एवं बधिर हो गये ॥६७॥ चराचर से युक्त त्रैलोक्य व्याकुल हो गया । सभी सुरों तथा असुरों के शरीर तथा मन ॥६८॥ शून्य हो गये, वे यह नही जान सके कि यह क्या हो गया ? सभी धैर्य धारण करके ब्रह्माजी को देखने लगे ॥६९॥ वे यह नहीं जान सके कि ब्रह्माजी कहाँ गये । वे सोच रहे थे कि उत्पातों को सूचित करने वाला पृथिवी में कंप क्यों उत्पन्न हो गया ॥७०॥ उसी समय भगवान् विष्णु वहाँ आ गये जहाँ पर देवता विद्यमान थे । उनको देखकर देवताओं ने उनको प्रणाम करके
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