Srishti Khanda Extracted Page 186

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-186

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Sanskrit Original

सुष्टिखण्ड १६१ सवल्लीकाः प्रनृत्यंति मानवा इव सप्रिया: । स्वपुष्पनतवल्लीभिः पादपाः क्वचिदावृताः ॥४३॥ भांतितारागणैश्चित्रै शरदीव नभस्तलम् । द्वुमाणामथवाग्रेषु पुष्पितामालतीलता: ॥४४॥ शेखरा इव शोभंते रचिता बुद्धिपूर्वकम् । हरिताः कांचनच्छायाः फलिताः पुष्पिताद्रुमाः ॥४५॥ सौहृदं दर्शयंतीव नराः साधुसमागमे । पुष्पकिंजल्ककपिला गताः सर्वदिशासु च ॥४६॥ कदंबपुष्पस्य जयं घोषयंतीव षट्पदाः। क्वचित्पुष्पासवक्षीबाः संपतंति ततस्ततः ॥४७॥ पुंस्कोकिलगणा वृक्षगहनेष्विव सप्रिया: । शिरीष पुष्पसंकाशाः शुका मिथुनशः क्वचित् ॥४८॥ कीर्तयंति गिरश्चित्राः पूजिता ब्राह्मणा यथा सहचारिसु संयुक्ता मयूराक्षित्रबर्हिणः ॥४९॥ वनातेष्वपि नृत्यांति शोभंत इव नर्तकाः । कूज॑ंतः पक्षिसंघाता नानारुतविराविणः ॥५०॥ कुति रमणीयं वै रमणीयतरं वनम्। नानामृगगणाकीर्णं नित्यं प्रमुदितांडजम् ॥५१॥ तद्दनं नंदनसमं मनोदृष्टि विवर्द्धनम् । पद्मयोनिस्तु भगवांस्तथा रूपं वनोत्तमम्॥५२॥ ददर्शादर्शवद् दृष्ट्या सौम्यया पावयन्निव। तावृक्षपंक्तयः सर्वा दृष्ट्वा देवं तथा गतम् ॥५३॥ निवेद्य ब्रह्मणे भक्तद्या मुमुचुः पुष्यसंपदः । पुष्पप्रतिग्रंं कृत्वा पादपानां पितामहः ॥५४॥ वरंवृणीध्वं भद्रं व: पादपानित्युवाच सः । एवमुक्ताः भगवता तरवो निरवग्रहाः॥५५॥ ऊचुः प्रांजलयः सर्वे नमस्कृत्वा विरिंचनम् ।वरं ददासि चेद्देव प्रपन्नजनवत्सल ॥५६॥ इहैव भगवन्नित्यं वने संनिहितो भव। एष नःपरम: कामः पितामह नमोस्तुते ॥५७॥ दृक्ष पुरुषों से यहाँ स्पर्धा करते हों । शिखा के अग्रभाग में वायु के द्वारा कंपाये गये पुष्पसमूह से युक्त वृक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे माला, अलङ्कार तथा मुकुट से युक्त मनुष्य नृत्य कर रहे हों ॥४१-४२॥ पुष्पों से युक्त झुकी हुयी लताओं से घिर हुए वृक्ष लताओं के साथ प्रियाओं के साथ नृत्य करते हुए मनुष्यों के समान लगते थे ॥४३॥ अनेक प्रकारके तारा समृह से युक्त शरत् कालीन रात्रि के समान वृक्षों के ऊपरि भाग में विकसित मालतीलता सुशोभित होती थी॥४४॥ हरी-हरी कांचन वृक्ष की छाया तथा फले एवं विकसित हुए वृक्ष सावधानी पूर्वक सजाये गये मुकुट से समलङ्कृत के समान शोभते थे ॥४५॥ पुष्पों के पराग से पीली बनी हुयी सभी दिशाओं में सज्जन पुरुषों के आने पर वे दृक्ष मानों सौहार्द को अभिव्यक्त करते थे ॥४६॥ कहीं पर पुष्पों के पराग रूपी मदिरा के पान से मदमत्त बने भोर इधर-उधर गिरते हुए मानों कदम्व पुष्पों का जयघोष कर रहे थे ॥४७॥ कहीं पर पुंष्कोकिलों का समूह घने वृक्षों में अपनी प्रियतमाओं के साथ विद्यमान थे तो कहीं पर शिरीष पुष्प के समान शुक पक्षी के जोड़े विद्यमान थे ॥४८॥ व पूजित व्राह्मण के समान विचित्र ध्वनि कर रहे थे । वहाँ मयूरी के साथ सुन्दर मयूर थे ॥४९॥ वे वन के अन्तिम भाग म॑ भी नृत्य करते हुए नर्तकों के सामन सुशोभित हो रहे थे । वहाँ पर अनेक पक्षियों का समूह, अनेक प्रकार की वोली वोलता था ॥५०॥ वे रमणीय वन को अधिकरमणीव (रमणीयतर) बना रहे थे । अनेक प्रकार के मृगों से व्याप्त उस वन में पक्षियों का समूह सदा प्रमुदित रहता था ॥५१॥ वह वन नन्दन वन के समान मन और दृष्टि को प्रमुदित करने वाला था । ब्रह्माजी उस प्रकार के उत्तम वन को अपनी सौम्य दृष्टि से पवित्र करते हुए के समान देखे। दृक्षा की पंक्तियों ने व्रह्मजी को आये हुए देखकर ॥५३॥ ब्रह्माजी को निवेदित करके उन पर पुष्प रूपी सम्पत्ति की वर्षा की । वृक्षों द्वारा दिए गये उपायन को स्वीकार करके ब्रह्माजी ने वृक्षों से कहा-- आपलोगों का कल्याण हो, आपलोग वरदान माँगिये । भगवान् ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर वृक्षों ने नि:सङ्कोच कहा ॥५४-५५॥ वे सब ब्रह्माजी को हाथ जोड़कर प्रणाम किए और कहे- हे प्रपत्र वत्सल भगवन् ! यदि आप वर देना चाहते हैं तो ॥५६॥

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